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अंकिता भंडारी न्याय संघर्ष में महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने सरकार पर दबाव और चुप्पी को उजागर किया

"हिंदी दैनिक सहर प्रजातंत्र" से बातचीत में काशीपुर कांग्रेस नेता ने अभिव्यक्ति की आज़ादी, दबाए गए सबूत, सीबीआई जांच की मजबूरी और जनता के जनसैलाब से घिरी भाजपा सरकार की सच्चाई को बेबाकी से सामने रखा।

काशीपुर। कांग्रेस की महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने ‘‘हिंदी दैनिक ‘सहर प्रजातंत्र’’’ से विशेष बातचीत में मौजूदा राजनीतिक हालात, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अंकिता भंडारी प्रकरण को लेकर सरकार के रवैये पर तीखा हमला बोला। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि जिस तरह से असहमति की आवाज़ों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है, वह सीधे-सीधे लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार है। उनके अनुसार भाजपा सरकार के कार्यकाल में केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता की आवाज़ भी कुचली जा रही है। अलका पाल ने यह भी स्पष्ट किया कि अंकिता भंडारी मामला केवल एक अपराध का विषय नहीं रहा, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड की अस्मिता और भावनाओं से जुड़ चुका है। जब एक उत्तराखंड की बेटी के साथ अन्याय हुआ, तब समाज का हर वर्ग भीतर तक आहत हुआ और यही कारण रहा कि सड़कों पर जनसैलाब उमड़ा। उन्होंने कहा कि जनता ने स्वतः आगे आकर यह दिखा दिया कि न्याय की लड़ाई किसी एक पार्टी की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की है।

अपने वक्तव्य में अलका पाल ने बताया कि अंकिता भंडारी मामले ने जिस तरह लोगों के दिलों को झकझोर दिया, उसने सरकार की कथनी और करनी के अंतर को उजागर कर दिया। उनके मुताबिक, जब इस घटना ने तूल पकड़ा, तब राज्यभर में आक्रोश देखने को मिला और आम नागरिकों से लेकर तमाम विपक्षी दलों तक ने एकजुट होकर न्याय की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी शुरू से ही यह चाहती रही है कि इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आ सके। अलका पाल का कहना था कि जनता की भावना केवल सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि वह यह भी जानना चाहती है कि साजिश के पीछे कौन-कौन लोग थे और किन ताकतों ने इस पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया। इसी वजह से सड़कों पर उतरी भीड़ केवल विरोध नहीं कर रही थी, बल्कि न्याय की पुकार लगा रही थी।

बातचीत के दौरान उन्होंने सीबीआई जांच को लेकर सरकार की घोषणा पर भी सवाल उठाए। अलका पाल के अनुसार, जिस तरह से सीबीआई जांच की घोषणा की गई, उससे यह स्पष्ट नहीं होता कि सरकार पूरी तरह संतुष्ट या ईमानदार है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और अंकिता भंडारी के माता-पिता की मांग शुरू से रही है कि जांच सीबीआई से हो, लेकिन वह भी सर्वाेच्च न्यायालय के सिटिंग जज की निगरानी में, ताकि किसी भी तरह की लीपापोती की गुंजाइश न रहे। उनका कहना था कि केवल जांच सौंप देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी दबाव में न हो। अलका पाल ने जोर देकर कहा कि जब तक जांच की हर परत जनता के सामने नहीं आती, तब तक भरोसा बहाल नहीं हो सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि इस पूरे प्रकरण में वीआईपी नामों की भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े हो चुके हैं। अलका पाल के मुताबिक, सीबीआई जांच का सबसे अहम पहलू यही होना चाहिए कि जिन प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आ रहे हैं, उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से उजागर किया जाए। उन्होंने दावा किया कि इस मामले से जुड़े कई ऑडियो और वीडियो साक्ष्य पहले ही सार्वजनिक हो चुके हैं, जो सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। उर्मिला सरोवर जैसे स्थानों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन सभी बिंदुओं पर निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। उनका कहना था कि जब इतने सारे प्रमाण जनता के सामने मौजूद हैं, तब जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे बिना किसी दबाव के सच्चाई सामने लाएं।

अलका पाल ने सरकार पर सबूतों को नष्ट करने का गंभीर आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि जिस तरह से इस मामले से जुड़े स्थानों पर बुलडोजर चलाए गए, उसने कई अहम सबूतों को खत्म कर दिया। उनके अनुसार, यह केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इससे जांच की दिशा और दशा दोनों प्रभावित हुईं। उन्होंने यह सवाल उठाया कि अगर सरकार सच में न्याय दिलाना चाहती थी, तो फिर सबूतों को सुरक्षित रखने के बजाय उन्हें नष्ट क्यों किया गया। अलका पाल ने कहा कि अब सरकार की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि सीबीआई जांच पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से कराई जाए, ताकि यह संदेह दूर हो सके कि कहीं कुछ छिपाने की कोशिश तो नहीं की गई।

साक्षात्कार के दौरान जब उनसे यह पूछा गया कि सरकार ने अचानक सीबीआई जांच की मांग क्यों मानी, तो उन्होंने इसे जनता और विपक्ष के दबाव का परिणाम बताया। अलका पाल के अनुसार, तमाम विपक्षी दलों और विशेषकर कांग्रेस पार्टी के निरंतर दबाव के चलते सरकार को पीछे हटना पड़ा। उन्होंने कहा कि अगर सरकार अपने आप में ईमानदार होती, तो उसे तीन साल पहले ही सीबीआई जांच स्वीकार कर लेनी चाहिए थी, क्योंकि यह मांग पहले दिन से उठाई जा रही थी। उनका कहना था कि जनता को बेवकूफ समझना सरकार की भूल है, क्योंकि जब लोग सड़कों पर उतर आते हैं, तो किसी भी सत्ता को झुकना ही पड़ता है।

अपने बयान में अलका पाल ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारों पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि अगर सरकार वास्तव में इन नारों को आत्मसात करती, तो अंकिता भंडारी जैसे मामले में इतनी देरी और चुप्पी देखने को नहीं मिलती। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र करते हुए कहा कि उनके उत्तराखंड दौरे के दौरान इस मुद्दे पर चुप्पी साधी गई, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अलका पाल के मुताबिक, राज्य को केवल धार्मिक पर्यटन के रूप में देखना और सामाजिक मुद्दों से मुंह मोड़ लेना जनता के साथ अन्याय है। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अगर प्रदेश सरकार शुरुआत से ही गंभीर होती, तो हालात इतने नहीं बिगड़ते।

उन्होंने यह भी कहा कि जनता का आक्रोश किसी राजनीतिक साजिश का नतीजा नहीं, बल्कि गहरे दर्द की अभिव्यक्ति है। अलका पाल के अनुसार, जब लोग सैलाब की तरह सड़कों पर उतरे, तब सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। उन्होंने कहा कि आनन-फानन में लिया गया सीबीआई जांच का फैसला सरकार की मजबूरी को दर्शाता है। उनका मानना है कि अगर समय रहते सही कदम उठाए जाते, तो सरकार को इतनी आलोचना का सामना नहीं करना पड़ता। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जनता अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होने वाली, बल्कि ठोस नतीजे देखना चाहती है।

अलका पाल ने दो टूक शब्दों में कहा कि आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को लगातार उठाती रहेगी। उनके अनुसार, यह लड़ाई किसी एक परिवार या पार्टी की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की बेटियों के सम्मान से जुड़ी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं होती, तब तक आंदोलन और दबाव जारी रहेगा। उनका कहना था कि न्याय की प्रक्रिया में किसी भी तरह की ढिलाई या समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने जनता से भी अपील की कि वे सच और न्याय के लिए एकजुट रहें और दबाव बनाए रखें।

बातचीत के अंतिम हिस्से में अलका पाल ने कहा कि सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में सत्ता जनता से बड़ी नहीं होती। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनता की आवाज़ को दबाने के प्रयास अंततः सत्ता के लिए ही नुकसानदेह साबित होते हैं। उनके अनुसार, अंकिता भंडारी मामला सरकार के लिए एक कसौटी है, जिसमें यह तय होगा कि वह न्याय के साथ खड़ी है या सत्ता के अहंकार के साथ। अलका पाल ने उम्मीद जताई कि सीबीआई जांच सच्चाई सामने लाएगी और दोषियों को सजा मिलेगी, ताकि भविष्य में किसी बेटी के साथ ऐसा अन्याय न हो और समाज में भरोसा बहाल हो सके।

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