देहरादून(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड रोडवेज़ की बसें अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हैं, जहां हर पहिया दिल्ली की हवा के फैसले पर टिका हुआ है। लंबे समय से उत्तराखंड की जनता देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार से दिल्ली तक रोज़ाना सफर करती आई है। यही रोडवेज़ वो भरोसे का नाम है, जिस पर रोज़ हज़ारों लोग अपने घर और मंज़िल के बीच की कड़ी जोड़ते हैं। लेकिन अब यह भरोसा खतरे में है। दिल्ली की हवा एक बार फिर ज़हरीली हो चुकी है, वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एअर क्वालिटी इंडेक्स खतरनाक स्तर पार कर गया है। इस जहरीली हवा ने अब उत्तराखंड रोडवेज़ की रफ़्तार पर ब्रेक लगाने की स्थिति पैदा कर दी है। दिल्ली सरकार ने आदेश जारी करते हुए साफ कहा है कि राजधानी की सीमाओं में अब सिर्फ बीएस-6 (BS6) और सीएनजी (CNG) बसें ही प्रवेश कर पाएंगी। इसका सीधा मतलब है कि डीज़ल से चलने वाली साधारण बसें अब दिल्ली में दाखिल नहीं हो सकेंगी।
रोज़ाना दिल्ली मार्ग पर उत्तराखंड परिवहन निगम की लगभग चार सौ बसें दौड़ती हैं, जिनमें वोल्वो, सीएनजी और साधारण डीज़ल बसें शामिल हैं। लेकिन नए नियम लागू होने के बाद सिर्फ डेढ़ सौ सीएनजी और नौ वोल्वो बीएस-6 बसें ही चल पाएंगी, बाकी तीन सौ से अधिक बसें डिपो में खड़ी रह जाएंगी। इस प्रतिबंध का सबसे बड़ा असर रोडवेज़ की आय पर पड़ेगा, क्योंकि दिल्ली मार्ग से रोज़ाना करीब बहत्तर लाख रुपये की कमाई होती है। अगर साधारण बसों का संचालन बंद हुआ तो यह आय लगभग साठ प्रतिशत तक घट सकती है, यानी करोड़ों रुपये का नुकसान तय है। यात्रियों के लिए यह परेशानी दोगुनी होगी क्योंकि त्योहारों और नौकरी के सीज़न में दिल्ली जाने वाली बसों की मांग सबसे ज़्यादा रहती है।
दिल्ली सरकार पहले भी कई बार चेतावनी दे चुकी है कि राज्य अपनी बसों को बीएस-6 और सीएनजी में परिवर्तित करें, वरना एंट्री रोक दी जाएगी। समयसीमा दो बार बढ़ाई गई, लेकिन अब हालात इतने गंभीर हैं कि राजधानी की सीमाओं पर जांच अभियान और सख्त हो गया है। गाज़ीपुर बॉर्डर पर हल्द्वानी से आने वाली बसों की पोल्यूशन जांच सख्ती से की जा रही है। हल्द्वानी डिपो के आरएम संजय पांडे का कहना है कि निगम की सभी बसों के दस्तावेज़ पूरे हैं, लेकिन दिल्ली में चेकिंग अब बेहद कठोर हो गई है। यदि किसी वाहन का प्रदूषण प्रमाणपत्र एक्सपायर पाया गया, तो उसे बॉर्डर पर ही रोक लिया जाएगा। यह सख्ती न केवल निगम की कमाई पर असर डालेगी, बल्कि आम यात्रियों के लिए दिल्ली पहुंचना भी चुनौती बन जाएगा।
देहरादून के आईएसबीटी से रोज़ाना सौ बसें दिल्ली रवाना होती हैं, जिनमें अठारह वोल्वो, चालीस सीएनजी और बाकी साधारण बसें शामिल हैं। प्रतिबंध लागू होते ही केवल आधी बसें ही दिल्ली पहुंच पाएंगी। बाकी यात्रियों को या तो इंतज़ार करना पड़ेगा या निजी साधनों का सहारा लेना होगा। इस स्थिति में रोडवेज़ के सामने दोहरी चुनौती है—पहली, यात्रियों का भरोसा बनाए रखना और दूसरी, अपने वित्तीय घाटे की भरपाई करना। निगम ने पिछले कुछ वर्षों में कई नई बसें खरीदी थीं, लेकिन उनमें ज़्यादातर पहाड़ी मार्गों के लिए थीं। दिल्ली रूट, जो निगम की आय का प्रमुख स्रोत माना जाता है, वहीं पर बीएस-6 और इलेक्ट्रिक बसों की भारी कमी है। अब वही कमी सबसे बड़ा संकट बनकर उभरी है।
यह कहानी केवल बसों और आंकड़ों की नहीं, बल्कि उन लोगों की है जो रोज़ाना इन बसों से अपने सपनों और जिम्मेदारियों का सफर तय करते हैं। देहरादून के युवा जो दिल्ली में रोजगार करते हैं, हरिद्वार की महिलाएं जो इलाज के लिए राजधानी जाती हैं, और पर्वों पर अपने बच्चों से मिलने निकलने वाले परिवार—सबका जीवन अब इस फैसले से प्रभावित होगा। भाई दूज के बाद दिल्ली रूट पर यात्रियों की भारी भीड़ है। हल्द्वानी डिपो ने गुरुवार को तेईस अतिरिक्त बसें भेजीं, लेकिन अगर प्रतिबंध सख्त हुआ तो यही भीड़ बस स्टैंड पर वापस लौट जाएगी और इंतज़ार और लंबा हो जाएगा।
दिल्ली सरकार ने फिलहाल बीएस-6 और सीएनजी बसों को दो हजार छब्बीस तक संचालन की अनुमति दी है, लेकिन यदि प्रदूषण का स्तर और बढ़ा तो पुराने वाहनों पर किसी भी समय अस्थाई रोक लग सकती है। रोडवेज़ अधिकारियों का कहना है कि सभी बसों के कागज़ात दुरुस्त हैं, परंतु दिल्ली की वायु गुणवत्ता के अनुसार नीतियों का मूड बदलता रहता है। इस परिस्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दिल्ली की हवा बचाने की कोशिश में उत्तराखंड की बसों को कुर्बानी देनी पड़ेगी?
आने वाले दिनों में फैसला इस पर निर्भर करेगा कि प्रदूषण का स्तर घटता है या नहीं। अगर हवा सुधरी तो रोडवेज़ की रफ़्तार जारी रहेगी, लेकिन हालात बिगड़े तो बसों के पहिए थम सकते हैं। यह समय उत्तराखंड सरकार के लिए भी सोचने का है कि अब ई-बसों और बीएस-6 मॉडल में निवेश को प्राथमिकता दी जाए। यह न सिर्फ पर्यावरण के हित में होगा, बल्कि रोडवेज़ के अस्तित्व को भी सुरक्षित रखेगा। सवाल यह नहीं कि बसें चलेंगी या नहीं, बल्कि यह है कि उत्तराखंड का सार्वजनिक परिवहन अपनी पहचान और भरोसे को किस रूप में बचा पाएगा। क्योंकि जब दिल्ली की हवा का रंग बदलता है, तब उत्तराखंड रोडवेज़ की रफ़्तार भी थम जाती है।



