कुशीनगर(सुनील कोठारी)। उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को तेजी देने के सपने के साथ जिन हवाई अड्डों की शुरुआत बड़े उत्साह के साथ की गई थी, वे आज बीते वादों की गूंज बनकर रह गए हैं। कई जिलों में एयरपोर्ट परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, उद्घाटन समारोहों में विकास के दावे गूंजे, पर मैदान में हालात इसके बिल्कुल उलट नज़र आ रहे हैं। चित्रकूट एयरपोर्ट जिसे दो हज़ार तेईस में लगभग 146 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया था, दिसंबर दो हज़ार चौबीस तक पहुंचते-पहुंचते पूरी तरह से ताला-बंद स्थिति में आ गया। आज़मगढ़ में बाइस करोड़ रुपये की लागत वाला एयरपोर्ट दो हज़ार तेईस में शुरू हुआ और नवंबर दो हज़ार चौबीस में वह भी निष्क्रिय हो गया। अलीगढ़ का एयरपोर्ट दो हज़ार चौबीस में बन तो गया, मगर आज तक केवल भवन बनकर खड़ा है—उड़ानें शुरू होने की उम्मीद भी धुंधली ही दिखती है। मुरादाबाद में दो हज़ार बाईस में बने एयरपोर्ट पर 22.5 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन नवंबर दो हज़ार तेईस के बाद वहां का माहौल सूना और शांत हो गया। श्रावस्ती में करीब 29 करोड़ की लागत वाला एयरपोर्ट भी दिसंबर दो हज़ार चौबीस में बंद हो गया। कुल मिलाकर आठ सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश आज के समय में किसी उपयोग का नहीं बचा। यह सिर्फ वित्तीय नुकसान नहीं, बल्कि उन स्थानीय लोगों, व्यापारियों, यात्रियों और उन उम्मीदों के लिए भी खोया अवसर है, जिन्होंने इन परियोजनाओं के साथ विकास की तस्वीरें बुनी थीं।
कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की स्थिति सबसे ज्यादा चर्चा में है। इस एयरपोर्ट का उद्घाटन बड़े दावों के साथ हुआ था—पूर्वांचल की अर्थव्यवस्था को नई गति देने, हजारों नौकरियों के अवसर पैदा करने और बौद्ध पर्यटन के लिए वैश्विक प्रवेश द्वार बनाने का सपना दिखाया गया था। मगर आज हकीकत बिल्कुल उलटी दिखाई देती है। यहां बुनियादी कनेक्टिविटी तक मजबूत नहीं है। रेलवे स्टेशन का अभाव सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि कुशीनगर आने-जाने के लिए लोगों के पास केवल बसों का विकल्प रहता है या फिर राष्ट्रीय राजमार्ग 27 पर निजी वाहन से सफर करना पड़ता है। एयरपोर्ट प्राधिकरण का दावा है कि रनवे और टर्मिनल तैयार हैं, लेकिन इसके आसपास सड़क चौड़ीकरण और पैरामीटर वॉल का काम अब भी जारी है। यूपी सरकार ने 30 एकड़ अतिरिक्त भूमि भी विस्तार के लिए दी है, लेकिन फिर भी संचालन की स्थिति में कोई स्पष्टता नहीं दिखती। सवाल यह भी है कि गोरखपुर एयरपोर्ट महज़ 50 किलोमीटर दूर है तो ऐसे में कुशीनगर जैसे अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के लिए पर्याप्त यात्री मिल पाएंगे या नहीं—यही दुविधा एयरलाइंस को भी परेशान करती है।
कुशीनगर को लेकर सबसे बड़ा अफसोस यह है कि यह स्थान वैश्विक आध्यात्मिक पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बुद्धगया, सारनाथ और नेपाल का लुंबिनी—जहां गौतम बुद्ध के जीवन के तीन महत्वपूर्ण अध्याय जुड़े हैं—इनके बीच बिल्कुल मध्य में स्थित कुशीनगर यदि सही तरीके से विकसित और प्रचारित किया जाता, तो यह बौद्ध सर्किट का सबसे महत्वपूर्ण जंक्शन बन सकता था। हर साल आठ से नौ लाख बौद्ध श्रद्धालु भारत आते हैं, परंतु अधिकांश की यात्रा बोधगया या सारनाथ पर ही केन्द्रित रह जाती है क्योंकि सीधी पहुंच कुशीनगर तक उपलब्ध नहीं। यदि यह एयरपोर्ट नियमित रूप से संचालित होता, तो म्यांमार, चीन, थाईलैंड और श्रीलंका जैसे देशों से पर्यटक सीधे यहां उतरते और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलता। लेकिन अपर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर, मार्गों की खराब स्थिति, और ग्रामीण क्षेत्रों की प्रमुखता के कारण यात्री संख्या बेहद कम रही। एयरलाइंस द्वारा रूट को आर्थिक रूप से अव्यवहारिक मानते हुए इसे बंद करना पड़ा, और रात के समय तो सड़कें इतनी वीरान रहती हैं कि स्ट्रीट लाइट होने के बावजूद उनमें उजाला न दिखने की शिकायत आम है।
एयरपोर्ट की विफलता का एक बड़ा कारण तकनीकी तैयारी में देरी भी रही। अक्टूबर दो हज़ार इक्कीस में इसका भव्य उद्घाटन कर दिया गया, जबकि आवश्यक ILS और IFR प्रणाली—जो कोहरे में विमानों की सुरक्षित लैंडिंग के लिए अनिवार्य होती है—दो हज़ार पच्चीस तक पूरी तरह तैयार ही नहीं हो सकी। इससे सर्दियों में संचालन लगभग असंभव हो गया। हवाई अड्डे की भौगोलिक स्थिति भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह इलाका लगभग 95 प्रतिशत ग्रामीण है। एयरलाइंस के लिए किसी रूट को सफल बनाए रखने के लिए यात्री भार बेहद महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जब आसपास के क्षेत्र में आबादी कम आय वर्ग से संबंधित हो और यात्रा की प्राथमिकताएँ हवाई मार्ग की बजाय सड़क पर आधारित हों, तो अपने आप ही यह रूट आर्थिक रूप से अस्थिर हो जाता है। यही वजह रही कि मात्र दो वर्षों के भीतर ही यहां से संचालित उड़ानें बंद हो गईं। सात नवंबर दो हज़ार तेईस को अंतिम वाणिज्यिक उड़ान चली, इसके बाद से हवाई अड्डे पर केवल वीआईपी यात्राओं के दौरान ही गतिविधि दिखाई दी।
इसके साथ ही भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवादों ने स्थानीय माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है। कई गांवों की बड़ी-बड़ी हिस्सेदारी एयरपोर्ट परिसर में शामिल की गई। राम जन्म गुप्ता जैसे ग्रामीण बताते हैं कि केवल उनके गांव साफ़पुर की पचास एकड़ ज़मीन चली गई। कुल चौदह गांव इस अधिग्रहण से प्रभावित हुए, जिनमें अनेक घरों का भी विध्वंस हुआ। दो सौ से अधिक लोगों ने सिर्फ एक ही गांव से अपनी भूमि दी, लेकिन किसी को नौकरी, रोज़गार या किसी तरह का स्थायी लाभ नहीं मिला। ग्रामीणों का आरोप है कि वादे बहुत किए गए—राशन कार्ड, बच्चों की शिक्षा में मदद, रोजगार—पर किसी भी वादे का धरातल पर परिणाम नहीं दिखता। कई परिवारों का कहना है कि खेती चली गई, पर बदले में कोई स्थायी सहारा नहीं मिला। आज भी गांवों में लोग इस चिंता में जी रहे हैं कि जब वीआईपी मूवमेंट होता है तो रास्ते तक बंद कर दिए जाते हैं और सामान्य लोगों का आना-जाना तक मुश्किल हो जाता है।
कुल मिलाकर यह पूरी कहानी केवल एक एयरपोर्ट की असफलता भर नहीं है, बल्कि नियोजन की कमी, जमीनी आवश्यकताओं के गलत आकलन, तकनीकी तैयारी की देरी और स्थानीय समाज की उपेक्षा का बड़ा उदाहरण बन चुकी है। कुशीनगर एयरपोर्ट का ढांचा भले ही खड़ा है, रनवे चमक रहा है और टर्मिनल भवन आकर्षक दिखाई देता है, पर संचालन न होने के कारण यह पूर्वांचल की उम्मीदों के बीच एक अधूरी तस्वीर बन चुका है। हालांकि सरकार ने हाल ही में कहा है कि एयरपोर्ट के पुनरुद्धार पर काम चल रहा है और नई एयरलाइंस को जोड़ने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन जब तक यात्री संख्या, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढाँचा मजबूत नहीं होंगे, तब तक विकास के दावे सिर्फ घोषणाओं में ही रह जाएंगे। जो सपना इसे “पूर्वांचल की अर्थव्यवस्था का इंजन” बताकर दिखाया गया था, वह आज भी जमीन पर ईंधन का इंतजार कर रहा है।



