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सरकारी योजनाओं की चमकदार तस्वीर के पीछे छिपी सच्चाई बेनकाब जनता के हक पर गहरा वार

सरकारी योजनाओं के चमकदार दावों के पीछे छिपी खामियों ने आम नागरिकों की उम्मीदों को चोट पहुंचाई है, जहाँ बजट बढ़ता गया लेकिन लाभार्थियों की जिंदगी में सुधार के नाम पर वास्तविकता लगातार सवालों के घेरे में घिरती गई।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। देश में चल रही सरकारी योजनाओं की लंबी कतार को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन योजनाओं की वास्तविकता क्या है। 140 करोड़ की आबादी वाले भारत में शायद ही कोई ऐसा नागरिक होगा जिसके लिए केंद्र सरकार ने कोई न कोई योजना पेश न की हो। बीते 11 वर्षों में केंद्र ने योजनाओं की फेहरिस्त को इतने विस्तार से फैलाया है कि सरकार के अपने आँकड़ों में ही 225 से अधिक लाभार्थी योजनाएँ दर्ज हैं। हर योजना के साथ भारी-भरकम बजट जुड़ा हुआ है, जिसमें लाखों करोड़ रुपये का दावा किया जाता है। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर योजनाएँ चलने के बावजूद ज़मीनी सच्चाई क्या है—यह बात अब आम जनता के बीच अधिक तीखे सवालों को जन्म दे रही है। सबका खाता बैंक में खोल देना, सबको बीमा देना, हर किसान को सम्मान निधि देना, मजदूरों को मनरेगा में काम देना… सुनने में यह तस्वीर बहुत चमकदार लगती है, लेकिन जब इन्हीं योजनाओं के आधिकारिक आँकड़े खुद सरकार की वेबसाइटों पर उलझे दिखाई देते हैं, तब भरोसा हिलने लगता है। योजनाओं का ढांचा जितना विशाल है, उतना ही बड़ा भ्रम भी इसमें छिपा नजर आने लगा है।

इसी क्रम में जनधन योजना का उदाहरण लेते हैं, जिसे सरकार ने बैंकिंग व्यवस्था तक हर व्यक्ति को पहुँचाने का महाअभियान बताया था। सरकार के मुताबिक 57 करोड़ 11 लाख बैंक खाते जनधन योजना के तहत खोले गए और इनमें कुल जमा राशि ₹7433 करोड़ है। औसत निकालें तो प्रति खाते में लगभग चार हज़ार सात सौ रुपये से कम की राशि बैठती है। लेकिन संसद के भीतर सरकार स्वीकार कर चुकी है कि इन खातों में से लगभग 15 करोड़ खाते निष्क्रिय हो गए, जिनमें ₹500 तक नहीं था और जिनका लेनदेन महीनों से बंद था। आरबीआई के आँकड़े बताते हैं कि इन खातों को बंद करना पड़ा क्योंकि खातों में धन का प्रवाह न के बराबर था। दूसरी ओर जनधन खाते खोलने के समय सरकार ने ओवरड्राफ्ट, दुर्घटना बीमा, जीवन बीमा और डायरेक्ट ट्रांसफर जैसी कई सुविधाओं का प्रचार किया था। लेकिन जब करीब 15 करोड़ खाते ही निष्क्रिय हो जाएँ, तो यह प्रश्न उठना लाज़िमी है कि आखिर इन खातों के जरिए वादा किए गए लाभ कितने लोगों तक पहुंचे और कितना पैसा वास्तव में ग्रामीण परिवारों या गरीब नागरिकों की जिंदगी में सुधार ला सका।

उधर मनरेगा की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। यह योजना उस दौर का सहारा थी जब रोजगार की कमी को देखते हुए ग्रामीण इलाकों में मजदूरों को साल में 100 दिन रोजगार देने की गारंटी दी गई थी। आज हालत यह है कि देशभर में लगभग 28 करोड़ लोग मनरेगा में काम की उम्मीद से आवेदन करते हैं, लेकिन सक्रिय मजदूरों के रूप में केवल 12 करोड़ 17 लाख लोगों को दर्ज किया गया है, जबकि इसी वित्त वर्ष में उनके खातों में 25 करोड़ 71 लाख डायरेक्ट ट्रांसफर हुए। इसका मतलब यह हुआ कि औसतन एक मजदूर के हिस्से में मात्र कुछ रुपये ही पहुँच पाए। सरकार खुद कहती है कि लगभग 4 करोड़ 65 लाख घरों को लाभ मिला और करीब 1 करोड़ 90 लाख से अधिक मजदूर व्यक्तिगत रूप से योजना से जुड़े। लेकिन इन आँकड़ों को जोड़कर देखें तो प्रति सक्रिय मजदूर औसतन नौकरी या मजदूरी का वास्तविक लाभ बेहद सूक्ष्म रह जाता है। यह स्थिति बताती है कि मनरेगा अब सिर्फ कागजी ढांचे का हिस्सा बनकर रह गया है।

उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में तो मनरेगा की हालत और भी चिंताजनक है। उत्तर प्रदेश में कुल 2 करोड़ 38 लाख मजदूर पंजीकृत हैं, लेकिन 100 दिन का पूरा काम केवल 77,000 से कुछ अधिक परिवारों को मिल पाया। बजट लगातार घटता गया और मजदूरों की तादाद बढ़ती रही। पिछले वर्षों में यूपी को 34 करोड़ रुपये से अधिक का बजट मिलता रहा, जो अब घटकर केवल 20 करोड़ तक सीमित हो गया है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की स्थिति सबसे खराब है जहां 18 लाख से अधिक सक्रिय मजदूर होने के बावजूद बजट शून्य कर दिया गया है। कोविड के बाद से बंगाल को एक भी रुपये की रिलीज नहीं हुई। संसद परिसर में बंगाल के सांसद खुले तौर पर 52,000 करोड़ रुपये के बकाये की मांग करते दिखाई दिए। यह विडंबना है कि जिस योजना का मूल उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को रोजगार देना था, उसी योजना का बजट अब देशभर में कटकर आधा से भी कम रह गया है और काम मिलने वालों की संख्या भी पहले से लगभग आधी हो चुकी है।

सरकार की योजनाओं में धनराशि के भारी दावों और जमीन पर दिखती बदहाली का विरोधाभास मुद्रा योजना के आँकड़ों में भी साफ दिखाई देता है। सरकार का दावा है कि हर वर्ष लगभग 6 करोड़ लोगों को मुद्रा योजना के तहत ऋण मिलता है और अब तक लगभग 53 करोड़ खातों में 33 लाख करोड़ रुपये से अधिक जारी किए जा चुके हैं। इसे समझने पर औसत निकलता है कि 2024-25 में प्रत्येक लाभार्थी के खाते में लगभग ₹99,000 से ज्यादा पहुँचे। यह राशि पिछले वर्षों की तुलना में अधिक है, जबकि रोजगार की स्थिति या छोटे कारोबारों की हालत में इतना बड़ा सुधार कहीं नजर नहीं आता। सरकार के ही आँकड़े बताते हैं कि 2023-24 में लगभग 79,000 रुपये प्रति खाते, 2022-23 में लगभग 72,000 रुपये प्रति खाते और इससे पहले लगभग 61,000 रुपये प्रति खाते दिए गए थे। इतना बड़ा वितरण देखकर सामान्य व्यक्ति यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर ये लाभार्थी हैं कौन, और उनके गाँव-मोहल्लों में ये सफल कारोबार किस जमीन पर दिखाई दे रहे हैं।

किसान सम्मान निधि का परिदृश्य भी उलझन पैदा करता है। सरकार का दावा है कि हर साल 75,000 करोड़ रुपये किसानों को दिए जाते हैं और हर चार महीने पर दो-दो हजार रुपये किसानों को भेजे जाते हैं। लेकिन लाभार्थियों की संख्या जिस तेजी से बदलती है, वह हैरान करने वाली है। शुरुआत में 3 करोड़ 16 लाख किसानों को राशि मिली थी, फिर यह बढ़कर 10 करोड़ 41 लाख तक पहुँच गई। फिर अचानक अगली ही वर्ष यह संख्या 8 करोड़ से थोड़ा ऊपर रह गई, और फिर अगले वर्ष दुबारा लगभग 10 करोड़ तक लौट आई। यह उतार-चढ़ाव यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर किसान संख्या अचानक घटती और बढ़ती क्यों है। उत्तर प्रदेश में यह संख्या सबसे अधिक है—2 करोड़ 25 लाख लाभार्थी। महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में भी लाखों किसान इस सूची में शामिल हैं। लेकिन रिकॉर्ड में दर्ज किसानों की यह बदलती हुई संख्या यह संकेत देती है कि लाभार्थियों की पहचान के मानकों में निरंतर अस्पष्टता बनी हुई है।

सरकार का अपना बयान है कि बैंकों में 78,000 करोड़ रुपये अनक्लेम पड़े हैं, बीमा कंपनियों में 14,000 करोड़, म्यूचुअल फंडों में 3000 करोड़ और डिविडेंड में 9000 करोड़। यानी 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक राशि ऐसी है जिसका कोई दावेदार नहीं मिला। प्रधानमंत्री ने खुद एक बड़े कार्यक्रम में यह बात कही और बताया कि सरकार इस धन की तलाश में जुटी है। लेकिन सवाल यह है कि जब देश की आम जनता के खाते खाली हैं, योजना का पैसा ठीक से पहुँच नहीं रहा, तब इतनी बड़ी रकम आखिर कैसे अनक्लेम बैठी रह जाती है।

इन सभी योजनाओं—जनधन, मनरेगा, मुद्रा, किसान सम्मान निधि—को जोड़कर देखें तो तस्वीर और भयावह लगती है। कुछ योजनाओं में खाते बंद हो रहे हैं, कुछ में बजट खत्म हो रहा है, कुछ में फर्जी या संदिग्ध लाभार्थी दिख रहे हैं, और कुछ में हर साल बढ़ते हुए खर्च का कोई सामाजिक-आर्थिक असर दिखाई नहीं देता। सवाल यह है कि इतनी विशाल रकम आखिर कहाँ जा रही है? क्या यह पैसा जनता की जेब तक पहुँच पा रहा है या किसी दूसरी आर्थिक संरचना में समा रहा है, जिसे आम नागरिक समझ भी नहीं सकता? योजनाओं के भारी-भरकम दावों और जमीन पर बिखरी हकीकत के बीच का यह अंतर अब देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।

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