- सत्ता की बहसें भटकीं और देश संकटों में डूबा जनता जवाब तलाश रही
- चारों ओर संकट बढ़ता गया और सियासत दूसरी राह चली जनता हैरान
- जनता संकट झेलती रही और सत्ता मांद में सिमटी देश में बढ़ी तड़प
- हवा ज़हरीली, अर्थव्यवस्था लड़खड़ाई, सिस्टम चरमराया और बहसें भटकती रहीं
- देश संकटों से जूझा और सियासत ने मुद्दों से नज़र फेर ली
- जनता की चीखें दबती रहीं और सत्ता दूसरी लड़ाइयाँ लड़ती रही
- संकट गहराए और संसद में बहसों ने दिशा बदल ली देश परेशान
रामनगर(सुनील कोठारी)। भीड़भाड़ वाले एयरपोर्ट, सांस में घुलता ज़हरीला धुआँ, ढहते सार्वजनिक सिस्टम और लगातार बिगड़ते हालात इन सबके बीच देश एक ऐसी उलझन में खड़ा दिखाई देता है, जहाँ आम नागरिक का धैर्य टूट रहा है और सत्ता गलियारों में बहसें किसी दूसरी दिशा में भटकती प्रतीत होती हैं। बीते दिनों की घटनाओं ने आम लोगों में बेचैनी बढ़ाई है। दिल्ली के एक संवेदनशील इलाके में हुए धमाके के बाद उठे सवालों, राजधानी के प्रदूषण संकट, रुपये के गिरते मूल्य और गोवा की एक आग दुर्घटना में हुई मौतों ने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया है जहाँ जनता को लग रहा है कि देश जिन वास्तविक चुनौतियों से जूझ रहा है, उन्हें लेकर राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं की गंभीरता उनके दर्द के अनुपात में दिखाई नहीं दे रही। एयरपोर्ट पर हजारों यात्रियों की फंसी लंबी कतारों से लेकर सोशल मीडिया पर फैलते गुस्से तक हर तरफ एक ही भावना दिख रही है कि समस्याएँ बढ़ रही हैं, पर प्राथमिकताएँ कहीं और खिसक रही हैं।
दिल्ली में हुए धमाके ने लोगों के मन में सुरक्षा को लेकर चिंताएँ गहरा दी थीं। घटना के बाद शहर में फैली अफरा-तफरी के बीच नागरिक उम्मीद कर रहे थे कि संसद में इस पर तुरंत चर्चा होगी, पर राजनीतिक बहसों का रुख अचानक ही राष्ट्रगीत और इतिहास से जुड़े मुद्दों की ओर मुड़ गया। कई नागरिकों ने सवाल उठाया कि क्या राजधानी की सुरक्षा स्थिति संसद की बहसों का पहला विषय नहीं होना चाहिए था। दूसरी ओर, दिल्ली का हवा संकट एक बार फिर चरम पर पहुँच चुका है। विश्व भर में प्रदूषण पर निगाह रखने वाली संस्थाएँ जब दिल्ली को “गैस चैंबर” की संज्ञा दे रही हैं, तब शहर के लोग साफ हवा की तलाश में मास्क और एयर फ़िल्टर के सहारे दिन काट रहे हैं। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग यह शिकायत कर रहे थे कि जब हालात गंभीर हैं, तब यह जानने की ज़रूरत है कि सरकारें किस ढंग से समाधान तक पहुँचेंगी, न कि यह बहस कि हवा क्यों खराब है या इसके लिए मौसम को जिम्मेदार ठहराया जाए।
इस बीच, आर्थिक मोर्चे पर रुपये की गिरावट ने भी लोगों की जेब और मन दोनों पर असर डाला है। डॉलर के मुकाबले घरेलू मुद्रा के ऐतिहासिक गिरावट की खबरें सामने आईं, तो आम लोगों में यह चिंता गहरी हो गई कि इसका असर रोजमर्रा की महँगाई और आयात के खर्चों पर पड़ेगा। आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक बाज़ार की परिस्थितियाँ कठिन हैं, पर घरेलू नीतिगत स्पष्टता की कमी भी जनता के संशय बढ़ा रही है। सोशल मीडिया पर कई वीडियो और बयान वायरल हुए, जिनमें यह सवाल पूछा गया कि क्या बढ़ती महँगाई और गिरते रुपये जैसे मुद्दों पर व्यापक पारदर्शिता और संवाद ज़रूरी नहीं? इसी बीच गोवा की एक बड़ी आग दुर्घटना में कई लोगों की मृत्यु और घायल होने की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया। समुद्र तटीय राज्य की एक इमारत में लगी आग ने सुरक्षा मानकों पर भी बहस छेड़ दी है। लोगों का कहना था कि जब बार-बार ऐसी घटनाएँ लोगों की जान ले रही हैं, तब यह जानना स्वाभाविक है कि सुरक्षा ढांचे को मज़बूत करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

इधर, इंडिगो एयरलाइन में आई भारी तकनीकी और परिचालन अव्यवस्था ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया। एक सप्ताह में हजारों उड़ानें रद्द होने से लाखों यात्री देशभर के एयरपोर्टों पर फंसे रहे। बुज़ुर्ग, बच्चे, नौकरीपेशा लोग और विदेश जाने वाले छात्र सभी इस अचानक आई अव्यवस्था से परेशान नज़र आए। एयरपोर्ट पर कई घंटे की लाइनों में खड़े लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें स्पष्ट और समय पर जानकारी क्यों नहीं मिल रही। सोशल मीडिया पर यात्रियों के वीडियो में गुस्सा साफ झलक रहा था कि स्वास्थ्य, सुरक्षा और यात्रा तीनों मोर्चों पर लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। इस बीच जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा इस मामले में जल्द सुनवाई की आवश्यकता कम आँकने वाली टिप्पणी सामने आई, तो कई नागरिकों ने इसे लेकर आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या इतना बड़ा व्यवधान “तत्काल” श्रेणी में नहीं आता?
इन सबके समानांतर संसद में चल रही बहसों का रुख लोगों के ध्यान का बड़ा केंद्र बन गया। राजनीतिक दलों के बीच राष्ट्रगीत, इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर तीखी नोकझोंक जारी रही। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत की चर्चा और राष्ट्र की जरूरतों में अंतर समझना महत्वपूर्ण है, ने भी बहस को नया मोड़ दिया। इसी तरह सुप्रिया श्रीनेत के बयान कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का नाम लिए बिना राजनीतिक दलों के पास संवाद का आधार ही नहीं बचेगा ने भी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोरी। दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर उठी बहसों में भी नागरिक पक्ष अपनी राय सामने लाते रहे। कई लोगों का कहना था कि इतिहास को लेकर चलती इन तीखी बहसों के बीच मौजूदा समस्याओं की गंभीरता कहीं पीछे छूट जाती है।

देश के सामने मौजूद इन जमीनी संकटों ने एक सवाल को और प्रबल बना दिया है क्या प्राथमिकताओं की दिशा बदल गई है? नागरिकों का मानना है कि व्यवस्था को चाहिए कि वह सुरक्षा, वायु गुणवत्ता, आर्थिक स्थिरता और सार्वजनिक सेवाओं जैसे मुख्य विषयों पर ठोस योजना और त्वरित संवाद स्थापित करे। विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार और विपक्ष दोनों का दायित्व है कि जनता की जरूरतों पर ध्यान देकर नीतियों का बहाव उसी दिशा में मोड़े। वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का भी कहना है कि जब समस्याएँ एक साथ बढ़ती जा रही हों, तब संसद और संस्थाओं का दायित्व है कि वे जनता के विश्वास को प्राथमिकता दें। वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा सोशल मीडिया पर लिखे गए तीखे टिप्पणियाँ इस बात को दर्शाती हैं कि लोगों में यह भावना गहराती जा रही है कि सार्वजनिक संवाद का केंद्र वास्तविक मुद्दों पर होना चाहिए।
इन हालातों के बीच देश की जनता चाहे वह दिल्ली की जहरीली हवा में जूझती हो, एयरपोर्ट पर फंसी हो, गोवा की घटना को लेकर दुखी हो या महँगाई के बोझ से दबी हो अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद में है। हर तरफ यही सवाल उठ रहा है कि क्या समस्याओं से निपटने का तरीका बदलेगा और क्या जीवन से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखकर निर्णय लिए जाएंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि भरोसा तभी लौटता है जब संवाद स्पष्ट, नीति पारदर्शी और प्राथमिकताएँ जनता-केंद्रित हों। इस समय देश को सबसे बड़ी जरूरत यही है कि समाधान तलाशने की दिशा में सभी पक्ष एकजुट होकर आगे बढ़ें। जनता यह देखना चाहती है कि जब संकट सामने हों, तो बहसें उन रास्तों की हों जिनसे समस्याएँ हल हों इतिहास में कौन क्या था, इस पर नहीं।



