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संकटों में घिरी जनता और सत्ता की भटकती प्राथमिकताएँ देश का मौन सवाल कौन सुनेगा

रामनगर(सुनील कोठारी)। भीड़भाड़ वाले एयरपोर्ट, सांस में घुलता ज़हरीला धुआँ, ढहते सार्वजनिक सिस्टम और लगातार बिगड़ते हालात इन सबके बीच देश एक ऐसी उलझन में खड़ा दिखाई देता है, जहाँ आम नागरिक का धैर्य टूट रहा है और सत्ता गलियारों में बहसें किसी दूसरी दिशा में भटकती प्रतीत होती हैं। बीते दिनों की घटनाओं ने आम लोगों में बेचैनी बढ़ाई है। दिल्ली के एक संवेदनशील इलाके में हुए धमाके के बाद उठे सवालों, राजधानी के प्रदूषण संकट, रुपये के गिरते मूल्य और गोवा की एक आग दुर्घटना में हुई मौतों ने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया है जहाँ जनता को लग रहा है कि देश जिन वास्तविक चुनौतियों से जूझ रहा है, उन्हें लेकर राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं की गंभीरता उनके दर्द के अनुपात में दिखाई नहीं दे रही। एयरपोर्ट पर हजारों यात्रियों की फंसी लंबी कतारों से लेकर सोशल मीडिया पर फैलते गुस्से तक हर तरफ एक ही भावना दिख रही है कि समस्याएँ बढ़ रही हैं, पर प्राथमिकताएँ कहीं और खिसक रही हैं।

दिल्ली में हुए धमाके ने लोगों के मन में सुरक्षा को लेकर चिंताएँ गहरा दी थीं। घटना के बाद शहर में फैली अफरा-तफरी के बीच नागरिक उम्मीद कर रहे थे कि संसद में इस पर तुरंत चर्चा होगी, पर राजनीतिक बहसों का रुख अचानक ही राष्ट्रगीत और इतिहास से जुड़े मुद्दों की ओर मुड़ गया। कई नागरिकों ने सवाल उठाया कि क्या राजधानी की सुरक्षा स्थिति संसद की बहसों का पहला विषय नहीं होना चाहिए था। दूसरी ओर, दिल्ली का हवा संकट एक बार फिर चरम पर पहुँच चुका है। विश्व भर में प्रदूषण पर निगाह रखने वाली संस्थाएँ जब दिल्ली को “गैस चैंबर” की संज्ञा दे रही हैं, तब शहर के लोग साफ हवा की तलाश में मास्क और एयर फ़िल्टर के सहारे दिन काट रहे हैं। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग यह शिकायत कर रहे थे कि जब हालात गंभीर हैं, तब यह जानने की ज़रूरत है कि सरकारें किस ढंग से समाधान तक पहुँचेंगी, न कि यह बहस कि हवा क्यों खराब है या इसके लिए मौसम को जिम्मेदार ठहराया जाए।

इस बीच, आर्थिक मोर्चे पर रुपये की गिरावट ने भी लोगों की जेब और मन दोनों पर असर डाला है। डॉलर के मुकाबले घरेलू मुद्रा के ऐतिहासिक गिरावट की खबरें सामने आईं, तो आम लोगों में यह चिंता गहरी हो गई कि इसका असर रोजमर्रा की महँगाई और आयात के खर्चों पर पड़ेगा। आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक बाज़ार की परिस्थितियाँ कठिन हैं, पर घरेलू नीतिगत स्पष्टता की कमी भी जनता के संशय बढ़ा रही है। सोशल मीडिया पर कई वीडियो और बयान वायरल हुए, जिनमें यह सवाल पूछा गया कि क्या बढ़ती महँगाई और गिरते रुपये जैसे मुद्दों पर व्यापक पारदर्शिता और संवाद ज़रूरी नहीं? इसी बीच गोवा की एक बड़ी आग दुर्घटना में कई लोगों की मृत्यु और घायल होने की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया। समुद्र तटीय राज्य की एक इमारत में लगी आग ने सुरक्षा मानकों पर भी बहस छेड़ दी है। लोगों का कहना था कि जब बार-बार ऐसी घटनाएँ लोगों की जान ले रही हैं, तब यह जानना स्वाभाविक है कि सुरक्षा ढांचे को मज़बूत करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

इधर, इंडिगो एयरलाइन में आई भारी तकनीकी और परिचालन अव्यवस्था ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया। एक सप्ताह में हजारों उड़ानें रद्द होने से लाखों यात्री देशभर के एयरपोर्टों पर फंसे रहे। बुज़ुर्ग, बच्चे, नौकरीपेशा लोग और विदेश जाने वाले छात्र सभी इस अचानक आई अव्यवस्था से परेशान नज़र आए। एयरपोर्ट पर कई घंटे की लाइनों में खड़े लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें स्पष्ट और समय पर जानकारी क्यों नहीं मिल रही। सोशल मीडिया पर यात्रियों के वीडियो में गुस्सा साफ झलक रहा था कि स्वास्थ्य, सुरक्षा और यात्रा तीनों मोर्चों पर लोगों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। इस बीच जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा इस मामले में जल्द सुनवाई की आवश्यकता कम आँकने वाली टिप्पणी सामने आई, तो कई नागरिकों ने इसे लेकर आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या इतना बड़ा व्यवधान “तत्काल” श्रेणी में नहीं आता?

इन सबके समानांतर संसद में चल रही बहसों का रुख लोगों के ध्यान का बड़ा केंद्र बन गया। राजनीतिक दलों के बीच राष्ट्रगीत, इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर तीखी नोकझोंक जारी रही। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत की चर्चा और राष्ट्र की जरूरतों में अंतर समझना महत्वपूर्ण है, ने भी बहस को नया मोड़ दिया। इसी तरह सुप्रिया श्रीनेत के बयान कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का नाम लिए बिना राजनीतिक दलों के पास संवाद का आधार ही नहीं बचेगा ने भी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोरी। दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर उठी बहसों में भी नागरिक पक्ष अपनी राय सामने लाते रहे। कई लोगों का कहना था कि इतिहास को लेकर चलती इन तीखी बहसों के बीच मौजूदा समस्याओं की गंभीरता कहीं पीछे छूट जाती है।

देश के सामने मौजूद इन जमीनी संकटों ने एक सवाल को और प्रबल बना दिया है क्या प्राथमिकताओं की दिशा बदल गई है? नागरिकों का मानना है कि व्यवस्था को चाहिए कि वह सुरक्षा, वायु गुणवत्ता, आर्थिक स्थिरता और सार्वजनिक सेवाओं जैसे मुख्य विषयों पर ठोस योजना और त्वरित संवाद स्थापित करे। विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार और विपक्ष दोनों का दायित्व है कि जनता की जरूरतों पर ध्यान देकर नीतियों का बहाव उसी दिशा में मोड़े। वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का भी कहना है कि जब समस्याएँ एक साथ बढ़ती जा रही हों, तब संसद और संस्थाओं का दायित्व है कि वे जनता के विश्वास को प्राथमिकता दें। वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा सोशल मीडिया पर लिखे गए तीखे टिप्पणियाँ इस बात को दर्शाती हैं कि लोगों में यह भावना गहराती जा रही है कि सार्वजनिक संवाद का केंद्र वास्तविक मुद्दों पर होना चाहिए।

इन हालातों के बीच देश की जनता चाहे वह दिल्ली की जहरीली हवा में जूझती हो, एयरपोर्ट पर फंसी हो, गोवा की घटना को लेकर दुखी हो या महँगाई के बोझ से दबी हो अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद में है। हर तरफ यही सवाल उठ रहा है कि क्या समस्याओं से निपटने का तरीका बदलेगा और क्या जीवन से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखकर निर्णय लिए जाएंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि भरोसा तभी लौटता है जब संवाद स्पष्ट, नीति पारदर्शी और प्राथमिकताएँ जनता-केंद्रित हों। इस समय देश को सबसे बड़ी जरूरत यही है कि समाधान तलाशने की दिशा में सभी पक्ष एकजुट होकर आगे बढ़ें। जनता यह देखना चाहती है कि जब संकट सामने हों, तो बहसें उन रास्तों की हों जिनसे समस्याएँ हल हों इतिहास में कौन क्या था, इस पर नहीं।

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शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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