भारत (सुनील कोठारी)। भारतीय राजनीति और अर्थनीति के मौजूदा परिदृश्य में एक असाधारण मोड़ उस समय सामने आया, जब देश के भीतर कांग्रेस और बीजेपी के बीच टकराव केवल बयानबाजी तक सीमित न रहकर सीधा वैचारिक और नीतिगत संघर्ष बन गया। यह पहली बार है जब अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों और वैश्विक समझौतों के बीच देश की आंतरिक राजनीति इतने खुले तौर पर आमने-सामने खड़ी दिखाई दी। सत्ता पक्ष की ओर से जिस तरह से आर्थिक नीतियों, ट्रेड डील और निजीकरण को भविष्य का रास्ता बताया जा रहा था, उसी के समानांतर विपक्ष ने इसे देश के संसाधनों और संप्रभुता से जोड़कर बड़ा सवाल बना दिया। इस टकराव की सबसे अहम बात यह रही कि लंबे समय बाद कांग्रेस ने न केवल सरकार की नीतियों को चुनौती दी, बल्कि उस चुनौती को युवाओं के कंधों पर रखकर एक नए राजनीतिक प्रयोग की शुरुआत भी कर दी। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहले जहां विरोध को छवि खराब करने वाला कदम माना जाता था, वहीं अब उसी विरोध को लोकतंत्र की ताकत बताकर पेश किया जा रहा है। इस बदले हुए माहौल ने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
पहले के वर्षों में यह देखने को मिलता था कि जब भी अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के दौरान सरकार के खिलाफ किसी प्रकार का विरोध होता, तो सत्ता समर्थित तंत्र तुरंत सक्रिय हो जाता था। मुख्यधारा का मीडिया, सरकार के पक्ष में खड़े प्रभावशाली वर्ग और सत्ता के करीबी बुद्धिजीवी मिलकर एक ऐसा दबाव बनाते थे, जिससे विरोध करने वाले राजनीतिक दल को सफाई देने की स्थिति में ला दिया जाता था। अक्सर यह धारणा गढ़ी जाती थी कि कांग्रेस गलत है, देश की छवि खराब कर रही है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को कमजोर दिखा रही है। नतीजा यह होता था कि कांग्रेस के नेता या तो चुप्पी साध लेते थे या फिर आंतरिक राजनीति में उलझकर रह जाते थे। उस दौर में राहुल गांधी को लेकर भी यही कहा जाता रहा कि वह कभी देश के भीतर नए वोट बैंक तलाश रहे हैं, तो कभी युवा पीढ़ी को समझने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन खुलकर टकराव से बचते दिखाई देते थे। मौजूदा परिस्थिति इस पूरी परंपरा से अलग है, जहां कांग्रेस न केवल खुलकर सामने आई है, बल्कि उसने विरोध को अपनी राजनीतिक रणनीति का केंद्र बना दिया है।
युवा कांग्रेस की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में सबसे निर्णायक बनकर उभरी है। आमतौर पर संगठनात्मक ढांचे के भीतर सीमित मानी जाने वाली इस इकाई ने अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। बताया जाता है कि देशभर में करोड़ों की संख्या में छात्र और युवा किसी न किसी रूप में यूथ कांग्रेस से जुड़े हुए हैं, लेकिन पहले यह संगठन कांग्रेस के बड़े राजनीतिक एजेंडे को जमीन तक पहुंचाने में अपेक्षित असर नहीं दिखा पाता था। इस बार तस्वीर बदली हुई नजर आई। अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान जिस तरह से युवा नेताओं ने विरोध दर्ज कराया, उसने न केवल सरकार को असहज किया, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व को भी यह एहसास कराया कि संगठन के भीतर एक नई ऊर्जा मौजूद है। यही वह क्षण था, जब राहुल गांधी ने खुलकर यूथ कांग्रेस के पक्ष में खड़े होकर संकेत दिया कि अब विरोध की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया जाएगा और उसकी अगुवाई युवा करेंगे।
इस बदले हुए राजनीतिक माहौल में कांग्रेस ने पहली बार सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियों को निशाने पर लिया। ट्रेड डील, निजीकरण और मोनेटाइजेशन जैसे शब्द जो अब तक तकनीकी और नीतिगत बहस तक सीमित थे, उन्हें किसानों, एमएसएमई, व्यापारियों और आम नागरिकों के जीवन से जोड़कर प्रस्तुत किया गया। राहुल गांधी ने यह तर्क सामने रखा कि जिन नीतियों को सरकार विकास का इंजन बता रही है, वे वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी हैं। खास तौर पर कपास उगाने वाले किसानों, टेक्सटाइल उद्योग, छोटे उद्योगों और निर्यात–आयात से जुड़े कारोबारियों के भविष्य पर सवाल खड़े किए गए। यह पहली बार था जब किसी बड़े नेता ने खुलकर कहा कि यदि यह ट्रेड डील लागू होती है, तो इसके परिणाम केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि गांव, कस्बों और उद्योगों की जमीनी हकीकत में दिखाई देंगे। इसी बिंदु से सरकार और विपक्ष के बीच बहस ने तीखा रूप लेना शुरू किया।
भोपाल में दिए गए अपने भाषण में राहुल गांधी ने जिस अंदाज में बात रखी, उसने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी। उन्होंने न केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं और युवा नेताओं को संबोधित किया, बल्कि सीधे बीजेपी के कार्यकर्ताओं को भी यह संदेश दिया कि वे इस सच्चाई को समझें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ट्रेड डील से पीछे नहीं हट सकते। उनके मुताबिक यह डील केवल आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी बन चुकी है, जिसमें प्रधानमंत्री की छवि और भविष्य दोनों उलझ गए हैं। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे अंतरराष्ट्रीय दबाव, कॉर्पोरेट हित और कुछ ऐसे मामले हैं, जिनका असर सरकार के फैसलों पर पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मुद्दा केवल ट्रेड या टैक्स का नहीं है, बल्कि भारत की पूरी आर्थिक दिशा को निजीकरण की ओर मोड़ने का है। इस भाषण के जरिए कांग्रेस ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह अब रक्षात्मक राजनीति नहीं करेगी, बल्कि आक्रामक होकर सवाल उठाएगी।
आर्थिक नीतियों के संदर्भ में सरकार द्वारा घोषित मोनेटाइजेशन के आंकड़े भी विपक्ष के हमले का बड़ा आधार बने। बताया गया कि जहां पिछले वर्षों में मोनेटाइजेशन का आंकड़ा कुछ लाख करोड़ तक सीमित था, वहीं आने वाले वर्षों में इसे कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। हाईवे, पावर सेक्टर, पोर्ट्स, रेलवे, कोल और माइंस जैसे क्षेत्रों में सरकारी हिस्सेदारी को निजी हाथों में सौंपने की योजना को कांग्रेस ने सीधे तौर पर देश की संपत्ति के हस्तांतरण के रूप में पेश किया। राहुल गांधी का तर्क था कि जब सरकार स्वयं यह मानने लगे कि सार्वजनिक उपक्रम काम नहीं कर सकते, तो यह न केवल आर्थिक विफलता का संकेत है, बल्कि राजनीतिक जिम्मेदारी से भी बचने का तरीका है। इस बहस ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या विकास का यही मॉडल देश के हित में है, या फिर इसके पीछे कुछ चुनिंदा कॉर्पोरेट समूहों को लाभ पहुंचाने की मंशा है।
इसी पूरी बहस के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष के नेता राहुल गांधी का आमने-सामने आना भारतीय राजनीति के लिए एक नई स्थिति बन गया। लंबे समय तक जहां व्यक्तिगत टकराव से बचा जाता रहा, वहीं अब दोनों नेताओं के बीच सीधी वैचारिक लड़ाई दिखाई देने लगी है। राहुल गांधी ने यह दावा किया कि सरकार जिन अंतरराष्ट्रीय समझौतों को मजबूरी बताकर आगे बढ़ा रही है, वे वास्तव में भारत की स्वतंत्र आर्थिक नीति को कमजोर कर रहे हैं। इस संदर्भ में अमेरिका के साथ डील, वैश्विक दबाव और विदेशी पूंजी की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। कांग्रेस का कहना है कि यदि इन नीतियों का असर शेयर बाजार, निवेश और रोजगार पर नकारात्मक पड़ता है, तो इसका जवाब सरकार को देना होगा। इसी बिंदु पर यह राजनीतिक संघर्ष अब केवल सत्ता और विपक्ष की लड़ाई नहीं रह गया, बल्कि देश की आर्थिक दिशा तय करने वाली बहस में बदलता दिखाई दे रहा है।
बदलते राजनीतिक परिदृश्य में सबसे बड़ा मोड़ तब देखने को मिला, जब आर्थिक नीतियों से जुड़ी बहस सीधे आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ दी गई। विपक्ष ने यह तर्क आगे बढ़ाया कि ट्रेड डील और बढ़ते टैक्स का असर केवल सरकारी कागजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसान, छोटे कारोबारी, एमएसएमई और निर्यात–आयात से जुड़े उद्योगों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यदि आयात पर टैक्स बढ़ता है और विदेशी कंपनियों को विशेष छूट दी जाती है, तो घरेलू उद्योग प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे। इसी क्रम में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या सरकार वास्तव में देश के छोटे उत्पादकों और कारोबारियों की चिंता कर रही है या फिर बड़ी पूंजी के दबाव में फैसले ले रही है। इस पूरी बहस में राहुल गांधी ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि अर्थव्यवस्था के आंकड़े चाहे जितने भी सकारात्मक दिखाए जाएं, लेकिन अगर जमीनी स्तर पर रोजगार घट रहा है और छोटे उद्योग बंद हो रहे हैं, तो विकास का दावा खोखला साबित होगा।
अमेरिका के साथ प्रस्तावित डील को लेकर भी विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए। राहुल गांधी ने कहा कि इक्कीसवीं सदी डाटा की सदी है और जिस तरह से भारत का डाटा बिना किसी ठोस सुरक्षा के साझा किया जा रहा है, वह भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। उनका आरोप था कि अमेरिका को फ्री ऑफ कॉस्ट डाटा देने का मतलब केवल तकनीकी सहयोग नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल संपदा को गिरवी रखना है। उन्होंने यह भी कहा कि चीन से मुकाबले के नाम पर भारत को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इस बयान ने तकनीक, डाटा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को लेकर एक नई बहस छेड़ दी। कांग्रेस का तर्क है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि डाटा साझा करने से भारत को क्या ठोस लाभ मिलेगा और इसके बदले देश क्या खो रहा है। इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी ने विपक्ष के आरोपों को और धार दी।
शेयर बाजार में आई गिरावट और विदेशी निवेशकों की प्रतिक्रिया को भी इस राजनीतिक संघर्ष से जोड़कर देखा गया। ट्रेड डील को लेकर जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता बढ़ी, तो बाजार में एक झटके में भारी गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों के लाखों करोड़ डूबने की चर्चा ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी। कांग्रेस नेताओं ने इसे इस बात का संकेत बताया कि सरकार की आर्थिक नीतियों पर वैश्विक भरोसा डगमगा रहा है। उनका कहना है कि अगर नीतियां मजबूत होतीं, तो विदेशी पूंजी इतनी तेजी से बाहर नहीं जाती। इस संदर्भ में निफ्टी और अन्य सूचकांकों की गिरावट का हवाला देकर यह सवाल उठाया गया कि क्या सरकार केवल बड़े समझौतों की घोषणाओं से अर्थव्यवस्था संभाल सकती है। विपक्ष का आरोप है कि बाजार की अस्थिरता इस बात का प्रमाण है कि नीति निर्माण में पारदर्शिता और स्थिरता की कमी है।

मोनेटाइजेशन की नीति इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पहलू बनकर उभरी। सरकार ने जिन क्षेत्रों को निजी हाथों में सौंपने की योजना बनाई है, उनमें हाईवे, पावर सेक्टर, पोर्ट्स, रेलवे, कोल और माइंस जैसे रणनीतिक क्षेत्र शामिल हैं। कांग्रेस का कहना है कि यह केवल आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों के नियंत्रण से जुड़ा मामला है। राहुल गांधी ने यह सवाल उठाया कि जब रेलवे, कोल और पावर जैसे क्षेत्र निजी कंपनियों के हवाले कर दिए जाएंगे, तो आम नागरिकों पर इसका बोझ कैसे नहीं बढ़ेगा। किराया, बिजली दरें और परिवहन लागत बढ़ने की आशंका को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरा। इस बहस ने यह धारणा मजबूत की कि मोनेटाइजेशन का मतलब केवल राजस्व जुटाना नहीं, बल्कि सरकारी जिम्मेदारियों से पीछे हटना भी है।
विदेश नीति से जुड़े फैसलों को भी इस आर्थिक बहस से जोड़कर देखा गया। रूस से तेल खरीद, चीन के साथ व्यापार और ईरान के चाबहार पोर्ट जैसे मुद्दों पर राहुल गांधी ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि जब अमेरिका के दबाव में कुछ फैसले बदले जाते हैं, तो यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर प्रश्नचिह्न लगाता है। कांग्रेस का तर्क है कि यदि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और रक्षा आवश्यकताओं के लिए रणनीतिक साझेदारियों को अचानक बदलता है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। इस संदर्भ में यह भी कहा गया कि चीन से बढ़ते आयात के बावजूद सरकार की चुप्पी समझ से परे है। विपक्ष इसे दोहरे मापदंड का उदाहरण बताता है, जहां एक ओर राष्ट्रवाद की बात होती है और दूसरी ओर आर्थिक निर्भरता बढ़ती जाती है।
इन तमाम मुद्दों के बीच यूथ कांग्रेस की भूमिका और अधिक मुखर होती नजर आई। अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान हुए विरोध के बाद जिस तरह से युवा नेताओं की गिरफ्तारी और कार्रवाई हुई, उसे राहुल गांधी ने सरकार की घबराहट का संकेत बताया। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध भारत की लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा है और इसे दबाने की कोशिश करना असंवैधानिक है। सोशल मीडिया पर दिए गए उनके संदेशों ने युवाओं के बीच नई ऊर्जा भर दी। कांग्रेस नेतृत्व ने यह साफ कर दिया कि अब संगठन के भीतर युवा इकाइयों को केवल सहायक भूमिका में नहीं रखा जाएगा, बल्कि उन्हें राजनीतिक संघर्ष की अगली पंक्ति में खड़ा किया जाएगा। यह फैसला पार्टी के भीतर भी एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
मीडिया की भूमिका को लेकर भी कांग्रेस ने खुलकर अपनी असहमति जताई। राहुल गांधी और अन्य नेताओं का कहना है कि मुख्यधारा का मीडिया लंबे समय से सरकार के पक्ष में परसेप्शन बनाने का काम करता रहा है। इस बार कांग्रेस ने यह रणनीति अपनाई कि मीडिया के दबाव से डरने के बजाय सीधे जनता से संवाद किया जाए। सोशल मीडिया, जनसभाओं और युवा संगठनों के माध्यम से अपना पक्ष रखने की नीति ने विपक्ष को नया आत्मविश्वास दिया है। कांग्रेस का मानना है कि यदि मीडिया सवाल नहीं पूछ रहा, तो जनता के बीच जाकर सवाल उठाना और भी जरूरी हो जाता है। इस रवैये ने राजनीतिक संवाद की दिशा बदल दी है।
राजनीतिक विमर्श की इस नई धारा में सबसे निर्णायक क्षण तब सामने आया, जब राहुल गांधी ने खुलकर यह कहा कि अब कांग्रेस केवल प्रतिक्रियात्मक राजनीति नहीं करेगी, बल्कि सत्ता के हर फैसले को सीधे जनता के सामने रखेगी। उनका यह बयान कि “सत्ता के सच का आईना दिखाना अपराध नहीं, देशभक्ति है”, कांग्रेस की बदली हुई रणनीति का स्पष्ट संकेत माना गया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि यूथ कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी हो रही है या शांतिपूर्ण विरोध को दबाने की कोशिश की जा रही है, तो इसका सीधा मतलब है कि सरकार भीतर से असहज और डरी हुई है। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी यह बात दोहराई कि शांतिपूर्ण विरोध भारत की ऐतिहासिक धरोहर है और हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। इस बयान के साथ कांग्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह विरोध को कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत के रूप में पेश करेगी और इसी रास्ते पर आगे बढ़ेगी।
इस पूरे राजनीतिक संघर्ष में एक नया नारा भी उभरकर सामने आया, जिसने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच तेजी से जगह बनाई। “कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम” का नारा अब केवल एक विरोधी टिप्पणी नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस, यूथ कांग्रेस, एनएसयूआई और महिला कांग्रेस के लिए साझा राजनीतिक प्रतीक बनता दिख रहा है। राहुल गांधी ने जिस तरह से यह आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय दबावों के सामने समझौता कर चुके हैं, उसने बहस को और तीखा बना दिया। कांग्रेस का कहना है कि यह नारा केवल व्यक्ति विशेष पर हमला नहीं, बल्कि उन नीतियों की आलोचना है, जो देश की संप्रभुता और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर सवाल खड़े करती हैं। इस नारे के जरिए पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि अब बहस का केंद्र केवल आंकड़े नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित होंगे।
मीडिया की भूमिका पर कांग्रेस का रुख इस चरण में और अधिक स्पष्ट हो गया। लंबे समय तक मुख्यधारा के मीडिया पर परसेप्शन बनाने का आरोप लगाने के बाद अब पार्टी ने खुलकर कहा कि वह मीडिया के बनाए विमर्श का अनुसरण नहीं करेगी। राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं और प्रवक्ताओं से कहा कि अब किसी मुद्दे पर यह साबित करने में समय न गंवाया जाए कि कौन सही है और कौन गलत। पार्टी का फोकस केवल दो सवालों पर रहेगा—क्या प्रधानमंत्री समझौता कर चुके हैं और क्या शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार नहीं है। इस रणनीति का मकसद बहस को सरल लेकिन प्रभावी बनाना है, ताकि आम नागरिक भी इन सवालों से खुद को जोड़ सके। कांग्रेस का मानना है कि जब सवाल सीधे जनता के जीवन और अधिकारों से जुड़े हों, तो मीडिया की मध्यस्थता की जरूरत कम हो जाती है।
आर्थिक मोर्चे पर विपक्ष ने यह तर्क और मजबूती से रखा कि भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति चिंताजनक संकेत दे रही है। कोर सेक्टर में नकारात्मकता, मैन्युफैक्चरिंग में सुस्ती, बढ़ती बेरोजगारी और एमएसएमई के संकट को कांग्रेस ने सरकार की नीतियों की असफलता के रूप में पेश किया। राहुल गांधी का कहना है कि जब देश को बार-बार विदेशी पूंजी और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर निर्भर होना पड़े, तो यह आत्मनिर्भरता के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि विकास का मॉडल ऐसा हो जिसमें सार्वजनिक उपक्रमों को कमजोर कर निजी हाथों में सौंप दिया जाए, तो इसका बोझ अंततः आम नागरिकों पर ही पड़ेगा। यह तर्क उन लोगों के बीच तेजी से फैलता नजर आया, जो बढ़ती महंगाई और रोजगार संकट से जूझ रहे हैं।
विदेश नीति के संदर्भ में भी कांग्रेस ने सरकार से सीधे सवाल पूछे। रूस से तेल खरीद, चीन से बढ़ते आयात, ईरान के चाबहार पोर्ट से पीछे हटने और इजराइल के साथ बढ़ती रक्षा साझेदारी जैसे मुद्दों को जोड़कर यह पूछा गया कि क्या भारत की विदेश नीति स्वतंत्र निर्णयों पर आधारित है या फिर अंतरराष्ट्रीय दबावों के अनुरूप ढल रही है। राहुल गांधी ने यह संकेत दिया कि यदि भारत अपनी ऊर्जा, रक्षा और व्यापार नीतियों में संतुलन नहीं रखता, तो दीर्घकाल में देश की रणनीतिक स्थिति कमजोर हो सकती है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन फैसलों से देश को क्या लाभ मिल रहा है और क्या नुकसान हो रहा है।
इन तमाम सवालों के बीच कांग्रेस के भीतर भी एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन की रूपरेखा उभरती दिखाई दी। यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई को केवल सहायक संगठन नहीं, बल्कि संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में लाने का निर्णय पार्टी की सोच में बदलाव का संकेत है। राहुल गांधी का मानना है कि इक्कीसवीं सदी की राजनीति में युवा ही परिवर्तन के वाहक बन सकते हैं। उन्होंने युवाओं से सीधे कहा कि आने वाले समय की चुनौतियों को समझना और उनके खिलाफ खड़ा होना अब उनकी जिम्मेदारी है। यह संदेश केवल कांग्रेस के कैडर तक सीमित नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए भी है, जो अब तक किसी न किसी रूप में बीजेपी के साथ जुड़े रहे हैं।
समग्र रूप से देखा जाए तो भारत की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां आर्थिक नीतियां, विदेश नीति, मीडिया की भूमिका और युवाओं की भागीदारी एक-दूसरे से जुड़कर नए सवाल खड़े कर रही हैं। कांग्रेस ने इन सवालों को केंद्र में रखकर अपनी राजनीति को पुनर्परिभाषित करने की कोशिश की है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी अब यह संकेत दे रही है कि वह पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर सीधा टकराव करने को तैयार है। यह टकराव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाला संघर्ष बनता जा रहा है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह नई रणनीति कांग्रेस को कितना मजबूत बनाती है और भारतीय राजनीति को किस दिशा में ले जाती है।





