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डॉलर मांग उछलते ही भारतीय रुपया टूटा, इतिहास के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंचा

रामनगर(सुनील कोठारी)। वैश्विक बाजारों में चल रही उथल-पुथल और घरेलू आर्थिक संकेतकों के दबाव के बीच भारतीय मुद्रा ने इस सप्ताह ऐसी गिरावट दर्ज की जिसने वित्तीय जगत को चौंका दिया। लगातार कई महीनों से रुपये में कमजोरी का सिलसिला जारी था, लेकिन इस बार की गिरावट इतनी तीव्र रही कि रुपया इतिहास के अपने सबसे निचले स्तर पर जा पहुँचा। घरेलू फॉरेक्स मार्केट में अचानक डॉलर की मांग बढ़ने, विदेशी निवेशकों द्वारा तेज बिकवाली करने और ट्रेडिंग माहौल में अनिश्चितता गहराने से भारतीय करेंसी बुरी तरह प्रभावित हुई। यह गिरावट महज़ मामूली उतारदृचढ़ाव नहीं बल्कि एक ऐसा आर्थिक संकेत माना जा रहा है जो आने वाले दिनों में बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है। बाजार बंद होते-होते रुपया 89.66 तक लुढ़क गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है और निवेश जगत इस स्थिति को बेहद गंभीरता से देख रहा है।

इस गहरी गिरावट पर जब विदेशी मुद्रा विश्लेषकों ने नजर डाली तो उन्होंने इसे वैश्विक वित्तीय संकट का परिणाम मानने से इनकार किया। उनका कहना है कि इस बार रुपये की कमजोरी किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनाव या वैश्विक आर्थिक दुर्घटना से नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर अचानक बढ़े डॉलर के दबाव से हुई। फॉरेक्स विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में डॉलर की मांग एकाएक जिस गति से बढ़ी, उसने रुपये की स्थिरता को कमजोर कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि डॉलर इंडेक्स, कच्चे तेल की कीमतें, सोने के भाव, और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी में कोई बड़ा उतारदृचढ़ाव नहीं दिखा, इससे साफ जाहिर हो गया कि यह गिरावट भारत के आंतरिक वित्तीय समीकरणों का प्रभाव है। विश्लेषकों के अनुसार यह स्थिति अल्पकालिक भी हो सकती है, लेकिन इसे हल्के में लेना सही नहीं होगा क्योंकि घरेलू बाजार की संवेदनशीलता बढ़ती दिखाई दे रही है।

वित्तीय विशेषज्ञों के मुताबिक रुपये में आई इस भारी गिरावट की एक अहम वजह विदेशी फंडों का लगातार बाहर निकलना भी है। विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी थ्प्प् द्वारा पिछले दिनों ₹1,766 करोड़ की बिकवाली की गई, जिसने भारतीय बाजारों पर गहरा असर डाला। सेंसेक्स में 400.76 अंकों की तेज गिरावट और निफ्टी का 124 अंक टूटकर 26,068.15 के स्तर पर आ जाना दर्शाता है कि निवेशकों का विश्वास कमजोर हुआ है। ब्रेंट क्रूड की कीमत भले ही 2.18 प्रतिशत गिरकर 62 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हो, फिर भी रुपये को इससे कोई राहत नहीं मिली। डॉलर इंडेक्स में मात्र 0.09 प्रतिशत की हल्की मजबूती के बाद भी रुपये ने जिस तेजी से जमीन खोई, उसने अर्थशास्त्रियों को हैरान कर दिया और संकेत दिया कि घरेलू स्तर पर कहीं न कहीं दबाव असामान्य रूप से बढ़ चुका है।

बाजार में चर्चा का विषय यह भी बना कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े टेक स्टॉक्स में आई गिरावट ने निवेशकों के मन में एक नया डर पैदा किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ।प् सेक्टर में तेजी से बढ़ती कंपनियों के वैल्यूएशन को लेकर पहले ही बबल बनने की आशंका जताई जा रही थी और अब जब क्रिप्टोकरेंसी में भी भारी गिरावट आई, तो वैश्विक बाजार श्रिस्क-ऑफ मोडश् में चले गए। इसका सीधा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ा और भारतीय रुपया भी इससे अछूता नहीं रहा। जब निवेशक जोखिम वाले संपत्तियों से पैसा निकालने लगते हैं, तो वे सबसे पहले उन बाजारों से निकलते हैं जो विकासशील हैं और जहां अस्थिरता का खतरा थोड़ा अधिक होता है। यही वजह रही कि भारतीय रुपये पर इस मनोवैज्ञानिक दबाव ने भी असर डाला और स्थिति और बिगड़ती चली गई।

व्यापारिक मोर्चे पर भारत और अमेरिका के बीच चल रही अनिश्चितता ने भी रुपया को स्थिर होने नहीं दिया। हाल ही में दोनों देशों के बीच संभावित व्यापार समझौतों को लेकर स्थितियां स्पष्ट नहीं हैं, जिससे निवेशकों की चिंता और बढ़ गई है। यदि किसी बड़े व्यापारिक करार में रुकावट आती है या आयातदृनिर्यात नियमों को लेकर तनाव बढ़ता है, तो इसका असर सीधे रूप से मुद्रा की स्थिरता पर पड़ता है। इसीलिए विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में जब तक व्यापारिक दिशाएं स्पष्ट नहीं होंगी, तब तक रुपये पर दबाव जारी रह सकता है। देश की आर्थिक रणनीति के लिए यह समय बेहद संवेदनशील है और किसी बड़े विदेशी साझेदार से जुड़े तनाव का प्रभाव तुरंत बाजार पर दिखाई देता है।

फॉरेक्स मार्केट में सक्रिय खिलाड़ियों का कहना है कि रुपये की यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि एक चेतावनी है। यह बताती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को अभी भी कुछ मोर्चों पर मजबूती की जरूरत है। जब घरेलू फॉरेक्स मांग अचानक बढ़ती है, तो इसका सबसे तेज असर मुद्रा पर ही पड़ता है। इस दौरान निवेशक अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखने के लिए डॉलर की ओर भागते हैं और बाजार में डॉलर की मांग तेज हो जाती है। ठीक यही स्थिति इस बार भी देखने को मिली। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी कह रहे हैं कि यदि सरकार और केंद्रीय बैंक सही समय पर दखल देते हैं, तो स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन जब तक बाजार में स्थिरता नहीं आती और विदेशी फंडों का रुख सकारात्मक नहीं होता, तब तक उथलदृपुथल की संभावना बनी रहेगी।

भारतीय रुपये की यह अभूतपूर्व गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण संकेत है, लेकिन इससे उबरने की संभावनाएं भी कम नहीं हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों का विश्वास वापस लाने, विदेशी फंडों को आकर्षित करने, और घरेलू वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए मजबूत कदम उठाए जाने जरूरी हैं। मौजूदा परिस्थितियों ने आर्थिक नीतिदृनिर्माताओं के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि कैसे वे रुपये को मजबूत बनाते हुए बाजार का मनोबल ऊँचा रखें। फिलहाल तो इतना साफ है कि यह गिरावट भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सिर्फ एक आंकड़ा नहीं बल्कि एक गंभीर संकेत है, जिसे समय रहते समझना होगा।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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