नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। लोकसभा में कल का दिन राजनीतिक इतिहास में दर्ज होने योग्य रहा, जब देश के गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में विवादास्पद शब्द ‘साला’ का प्रयोग किया। यह घटना इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि स्वतंत्र भारत में अब तक कोई गृह मंत्री लोकसभा में इस तरह का भाषा प्रयोग नहीं कर चुका। खास बात यह रही कि इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किसी भी तरह की आपत्ति नहीं जताई, जबकि आम तौर पर विपक्ष के नेताओं की हर टिप्पणी पर तुरंत हस्तक्षेप करते रहे हैं। अमित शाह ने स्वयं यह कहकर अपने शब्द को संसदीय कार्रवाई से हटाने का निर्देश दिया, लेकिन जब विपक्ष ने इसका विरोध किया और सदन में हंगामा मचाया, तभी जाकर उन्होंने यह बयान दिया। इस घटना ने दर्शकों और जनता के बीच चर्चा का नया विषय पैदा कर दिया, क्योंकि यह भारतीय लोकतांत्रिक संसदीय प्रक्रिया के लिए असामान्य था और विपक्ष एवं मीडिया में गहरी प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई। इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि कल का दिन न केवल संसद में बहस के लिए यादगार रहेगा बल्कि राजनीतिक रणनीति और भाषाशैली पर भी बहस को जन्म देगा।
कल के दिन अमित शाह और राहुल गांधी के बीच सदन में सीधे टकराव की भी स्थिति बन गई। राहुल गांधी ने वोट चोरी और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए, जिन्हें गृह मंत्री अमित शाह ने संबोधित करते समय बचाव की मुद्रा में देखा गया। अमित शाह ने तीन प्रेस कॉन्फ्रेंसों को लेकर राहुल गांधी की चुनौती को अस्वीकार किया और कहा कि वे अपनी बात तय करेंगे, जबकि विपक्ष के नेता सदन में उनका क्रम निर्धारित करना चाहते थे। इस बहस में अमित शाह की प्रतिक्रिया पूरी तरह रक्षात्मक रही, जबकि विपक्ष लगातार अपने सवालों के जवाब की मांग कर रहा था। विपक्ष ने अंततः वॉकआउट किया, लेकिन अमित शाह ने इसे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को घुसपैठियों के पक्ष में खड़ा करने वाला मामला बता दिया। इस पूरी घटनाक्रम ने साफ किया कि गृह मंत्री ने संसदीय मर्यादाओं और विपक्षी सवालों के प्रति कितनी संवेदनशीलता दिखाई या नहीं।
गृह मंत्री अमित शाह ने इस दौरान घुसपैठियों के मुद्दे पर लगातार बहस की दिशा मोड़ते हुए विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस देश विरोधी ताकतों के साथ मिलकर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि पिछले 11 सालों में सत्ता में बैठे होने के बावजूद विपक्ष ने घुसपैठ और वोटर अधिकारों पर ध्यान नहीं दिया। अमित शाह ने यह भी दावा किया कि कांग्रेस के वर्कआउट और वोटर अधिकार रैली को भी घुसपैठियों से जोड़कर राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास किया गया। उन्होंने अपने भाषण में यह दोहराया कि भाजपा सरकार ने सीमाओं की सुरक्षा में महत्वपूर्ण कार्य किया, जबकि विपक्षी दल इस मुद्दे को मुद्दा बनाकर अपनी आलोचना जारी रखते रहे। इस पूरे प्रकरण में अमित शाह ने विपक्ष पर घुसपैठियों के मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया और अपने पक्ष में मतदाताओं को भरोसा दिलाने की कोशिश की।
सदन में वोट चोरी के आरोपों और चुनाव प्रक्रिया पर उठे सवालों पर अमित शाह ने कई ऐतिहासिक उदाहरण देकर विपक्ष के आरोपों को खारिज करने की कोशिश की। उन्होंने स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री बनने वाले नेताओं के चयन, इंदिरा गांधी के चुनावों और इलेक्शन कमीशन के प्रावधानों का जिक्र करते हुए कहा कि विपक्ष की शिकायतें राजनीतिक लाभ के लिए की जा रही हैं। अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए अनैतिक तरीके अपनाती है, लेकिन हकीकत यह है कि लोकतंत्र की प्रक्रिया पूरी तरह संविधान के अनुरूप रही है। उन्होंने इस दौरान ईवीएम की सुरक्षा, वोटर सूची की पारदर्शिता और चुनाव आयुक्तों की इम्यूनिटी के मुद्दों पर विपक्ष के सवालों का बचाव किया। अमित शाह की यह बहस दर्शकों और सांसदों के लिए तनावपूर्ण रही, क्योंकि उन्होंने अपने भाषण में लगातार विपक्षी दलों की रणनीति पर सवाल उठाए और अपने पक्ष को मजबूती से पेश किया।
कांग्रेस ने अमित शाह के भाषण को झूठ के पुलिंदा के रूप में पेश किया और आठ प्रमुख बयानों के खिलाफ अपनी स्थिति स्पष्ट की। कांग्रेस का कहना है कि अमित शाह ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता, वोटर सूची की सुरक्षा और ईवीएम की विश्वसनीयता के बारे में गलत बयान दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार ने वोटर सूची में गड़बड़ी दिखाकर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया और घुसपैठियों के मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। कांग्रेस ने यह भी कहा कि अमित शाह की सफाई आरएसएस और प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों पर केंद्रित रही, जबकि वास्तव में बहस का मूल मुद्दा वोट चोरी और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता था। इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि विपक्ष लगातार अपने सवाल उठाते हुए भी गृह मंत्री को जवाबदेह बनाने में सफल नहीं हो सका।
लोकसभा में अमित शाह ने अपनी रणनीति के तहत कांग्रेस के वॉकआउट और घुसपैठियों के मुद्दे को जोड़ते हुए कहा कि विपक्ष ने देश की सुरक्षा और वोटर अधिकारों के सवाल पर गंभीरता नहीं दिखाई। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस लगातार वोट चोरी के आरोप लगाकर राजनीतिक लाभ लेती है, जबकि भाजपा की नीति डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट पर आधारित है। अमित शाह ने इस दौरान विस्तार से बताया कि कैसे सीमाओं की सुरक्षा, वोटर सूची की निगरानी और चुनाव आयोग के सहयोग से मतदाता अधिकार सुनिश्चित किए जाते हैं। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वे इस मुद्दे को नजरअंदाज कर देश में भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
अमित शाह ने इस दौरान राम मंदिर, सीएए और ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों को भी अपने भाषण में जोड़ते हुए कहा कि भाजपा की जीत का कारण केवल सरकार की योजनाएं नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस की विरोधी रणनीतियों का भी परिणाम है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों तक योजनाओं को पहुंचाया, गैस, पानी, शौचालय और मुफ्त अनाज जैसी सुविधाएं प्रदान कीं, जबकि विपक्ष इस योगदान को नजरअंदाज कर रहा है। गृह मंत्री ने यह भी कहा कि वोट चोरी का मुद्दा केवल कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति को चुनौती देने के लिए उठाया गया है, जबकि असल में भाजपा की नीतियों और कामकाज के कारण ही जनता ने उन्हें समर्थन दिया।
लोकसभा में हुई बहस ने यह भी दिखाया कि अमित शाह किस प्रकार से विपक्षी आरोपों का जवाब देने से बचते हुए रक्षात्मक मुद्रा अपनाते हैं। उन्होंने सारा ध्यान घुसपैठियों, आरएसएस और प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों की ओर मोड़ दिया, जबकि राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता वोट चोरी और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठा रहे थे। अमित शाह की यह रणनीति दर्शाती है कि भाजपा के नेता राजनीतिक बहसों में किस तरह से मुद्दों को मोड़कर अपने पक्ष में पेश करते हैं, जबकि वास्तविक सवालों का जवाब देने से बचते हैं।
अंततः कल की लोकसभा की घटना यह स्पष्ट करती है कि भारतीय संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच असमान संवाद होता है। अमित शाह का ‘साला’ शब्द का प्रयोग, ओम बिरला की चुप्पी, और विपक्ष के सवालों का रक्षात्मक जवाब इस बात का प्रमाण है कि संसदीय मर्यादाओं और राजनीतिक दबाव के बीच लोकतांत्रिक प्रक्रिया कितनी जटिल हो सकती है। इस बहस ने देश के सामने यह भी स्पष्ट कर दिया कि विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच संवाद और जवाबदेही की वास्तविकता क्या है। कल का दिन न केवल भाषाशैली के लिए यादगार रहा, बल्कि राजनीतिक रणनीति और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर बहस का नया आयाम भी पेश किया।
इस पूरे घटनाक्रम ने साबित कर दिया कि अमित शाह की रणनीति में राजनीतिक अहंकार, बचाव की मुद्रा और विपक्ष की आलोचना का मिश्रण स्पष्ट रूप से नजर आया। उन्होंने घुसपैठियों, वोटर अधिकार, चुनाव आयोग और पीएम के कार्यक्रमों को जोड़कर बहस की दिशा मोड़ने का प्रयास किया। राहुल गांधी की चुनौती और विपक्ष की लगातार सवाल उठाने की प्रक्रिया के बावजूद अमित शाह ने रक्षात्मक अंदाज अपनाया और विषयों को अपने पक्ष में मोड़ते हुए संसदीय बहस को अपने नियंत्रण में रखा। इस पूरे प्रकरण ने दर्शकों और जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद और जवाबदेही की वास्तविक स्थिति क्या है।
कुल मिलाकर कल का दिन भारतीय संसदीय इतिहास में विवादास्पद, चुनौतीपूर्ण और राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण रहा। अमित शाह द्वारा सदन में ‘साला’ शब्द का प्रयोग, विपक्षी दलों का वॉकआउट, और घुसपैठियों के मुद्दे पर बहस ने साफ कर दिया कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक बहसें कितनी तीव्र, रणनीतिक और जटिल हो सकती हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी दिखाया कि सत्ता पक्ष अपने भाषण और रणनीति के माध्यम से कैसे विपक्षी आरोपों को कमतर दिखाने और जनता के मन में अपने पक्ष को मजबूत करने की कोशिश करता है।



