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फर्जी विश्वविद्यालयों का फैलता जाल, हज़ारों छात्रों का भविष्य दांव पर, शिक्षा माफिया पर सिस्टम की सबसे बड़ी चुनौती

फर्जी विश्वविद्यालयों के खुलासे के बाद शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जहां हजारों छात्र ठगी, मानसिक तनाव और आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं, वहीं मुआवजा, न्याय और जवाबदेही को लेकर सिस्टम की असल परीक्षा शुरू हो चुकी है।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)।बेहतर भविष्य, सम्मानजनक करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा की उम्मीदें जब युवाओं को उच्च शिक्षा की दहलीज़ तक ले आती हैं, तब वे अक्सर जल्दबाज़ी में फैसले कर बैठते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से राजधानी तक पहुँचे छात्र-छात्राएँ भारी-भरकम फीस, आकर्षक विज्ञापन और सुनहरे वादों के भरोसे मनचाहे कोर्स में दाख़िला ले लेते हैं। शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगता है—कक्षाएँ चलती हैं, आईडी कार्ड मिलते हैं, असाइनमेंट दिए जाते हैं और परीक्षाओं की तैयारी होती है। लेकिन कुछ महीनों या एक-दो सेमेस्टर बाद अचानक जब सच्चाई सामने आती है कि जिस संस्थान में उन्होंने प्रवेश लिया है, वह कानूनी रूप से मान्य ही नहीं है, तब उनकी दुनिया उलट जाती है। नींद उड़ जाती है, मन में सवालों का सैलाब उमड़ता है—अब आगे क्या होगा, फीस का क्या बनेगा, पढ़ाई का समय कैसे बचेगा और सबसे बड़ा डर यह कि कहीं हासिल की जा रही डिग्री पूरी तरह बेकार तो नहीं हो जाएगी।

मौजूदा दौर में यह संकट केवल किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं रहा है। देश के हजारों छात्र आज इसी मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं। इसकी वजह है केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से समय-समय पर जारी की जाने वाली फर्जी विश्वविद्यालयों की सूचियाँ, जिनमें हर बार नए-नए नाम जुड़ते जा रहे हैं। हाल ही में जारी सूची ने हायर एजुकेशन सिस्टम की कमजोरियों को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है। दो साल पहले जहां आठ राज्यों में लगभग बीस फर्जी विश्वविद्यालय चिन्हित किए गए थे, वहीं अब बारह राज्यों में इनकी संख्या बढ़कर बत्तीस तक पहुँच चुकी है। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह भी बताता है कि शिक्षा के नाम पर चलने वाला मुनाफे का यह खेल कितनी तेज़ी से फैल रहा है।

ताज़ा सूची के अनुसार राजधानी दिल्ली इस मामले में सबसे ऊपर है। देश की शैक्षणिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर में सबसे अधिक फर्जी विश्वविद्यालय पाए गए हैं। अलीपुर, दरियागंज, राजेंद्र प्लेस, रोहिणी, पीतमपुरा, जनकपुरी और नेहरू प्लेस जैसे इलाकों में संचालित कई संस्थानों को फर्जी घोषित किया गया है। इन संस्थानों के नाम सुनने में इतने प्रभावशाली हैं कि पहली नज़र में कोई भी छात्र भ्रमित हो सकता है। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एंड फिजिकल हेल्थ साइंस, कॉमर्शियल यूनिवर्सिटी लिमिटेड, यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी, वोकेशनल यूनिवर्सिटी, एडीआर सेंट्रिक ज्यूरीडिकल यूनिवर्सिटी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड इंजीनियरिंग और विश्वकर्मा ओपन यूनिवर्सिटी फॉर सेल्फ एम्प्लॉयमेंट जैसे नाम सुनकर यह अंदाज़ा लगाना कठिन हो जाता है कि ये संस्थान वैध नहीं हैं।

दिल्ली के बाद उत्तर प्रदेश का नाम आता है, जहां प्रयागराज, अलीगढ़ और लखनऊ जैसे शैक्षणिक शहरों में भी फर्जी विश्वविद्यालय सक्रिय पाए गए हैं। गांधी हिंदी विद्यापीठ प्रयागराज, महामाया टेक्निकल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस यूनिवर्सिटी अलीगढ़ और भारतीय शिक्षा परिषद भारत भवन लखनऊ जैसे संस्थानों को भी सूची में शामिल किया गया है। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में हर साल लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए दाख़िला लेते हैं। ऐसे में फर्जी संस्थानों का जाल और भी व्यापक हो जाता है।

सूची यहीं तक सीमित नहीं है। पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में भी फर्जी विश्वविद्यालयों के नाम सामने आए हैं। पुडुचेरी की श्री बोधि एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन और उषा लात्चुमनन कॉलेज ऑफ एजुकेशन, आंध्र प्रदेश की क्राइस्ट न्यू टेस्टामेंट डीम्ड यूनिवर्सिटी और बाइबल ओपन यूनिवर्सिटी ऑफ इंडिया, अरुणाचल प्रदेश का इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन और हरियाणा की मैजिक एंड आर्ट यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान वर्षों से छात्रों को भ्रमित करते रहे हैं। दक्षिण भारत और पूर्वी भारत में भी यह समस्या उतनी ही गंभीर है, जितनी उत्तर भारत में।

इन संस्थानों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे खुद को पूरी तरह वैध साबित करने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं। वेबसाइट, ब्रॉशर, एडमिशन काउंटर, काउंसलिंग सेशन—हर जगह यह दावा किया जाता है कि संस्थान सरकारी मान्यता प्राप्त है। कई बार तो फर्जी दस्तावेज और नकली अप्रूवल लेटर भी दिखाए जाते हैं। छात्र और उनके अभिभावक, जो अक्सर शिक्षा नियमों की बारीकियों से अनजान होते हैं, इन दावों पर भरोसा कर लेते हैं। नतीजा यह होता है कि वे अपनी गाढ़ी कमाई इन संस्थानों को सौंप देते हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे खेल के पीछे संगठित शिक्षा माफिया सक्रिय है। ये लोग जानते हैं कि हर साल लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल नहीं हो पाते और प्राइवेट संस्थानों का रुख करते हैं। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर फर्जी विश्वविद्यालयों का जाल बिछाया जाता है। जब तक शिकायतें सामने आती हैं या सरकारी एजेंसियां जांच करती हैं, तब तक ये संस्थान सैकड़ों-हजारों छात्रों से फीस वसूल चुके होते हैं।

सरकारी चेतावनियों के बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि आखिर छात्र इस जाल में फंस ही क्यों जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण जागरूकता की कमी है। बहुत से छात्र यह नहीं जानते कि किसी भी विश्वविद्यालय को डिग्री देने का अधिकार तभी होता है, जब वह संसद या राज्य विधानमंडल के कानून के तहत स्थापित हो या फिर विधिवत डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा प्राप्त हो। इसी अज्ञानता का फायदा उठाकर फर्जी संस्थान ‘यूनिवर्सिटी’ शब्द का खुलेआम इस्तेमाल करते हैं और डिग्री बांटने लगते हैं।

फर्जी विश्वविद्यालयों की इस बढ़ती संख्या ने न केवल छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरे उच्च शिक्षा तंत्र की साख को भी चुनौती दी है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर समय रहते इस पर सख्ती नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराता जाएगा। फिलहाल, जिन छात्रों ने ऐसे संस्थानों में दाख़िला ले लिया है, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने नुकसान की भरपाई कैसे करें और अपने करियर को दोबारा सही दिशा में कैसे लाएं। यही सवाल इस बहस को और भी गंभीर बना देता है।

जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची सार्वजनिक होती है, तब सबसे अधिक असमंजस की स्थिति उन छात्रों के सामने खड़ी हो जाती है, जो पहले से ही इन संस्थानों में पढ़ाई कर रहे होते हैं। अचानक उन्हें यह एहसास होता है कि जिन कक्षाओं में वे रोज़ाना जा रहे थे, जिन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे और जिस डिग्री के सपने उन्होंने देखे थे, वह सब कानूनी रूप से किसी मूल्य की नहीं रह सकती। ऐसे में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि अब आगे का रास्ता क्या है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति में छात्र को घबराने के बजाय ठंडे दिमाग से तथ्यों को समझना चाहिए। सबसे पहले यह पता लगाना जरूरी होता है कि जिस संस्थान को फर्जी घोषित किया गया है, वह किस आधार पर अवैध माना गया है और क्या उसके खिलाफ किसी तरह की कानूनी कार्रवाई शुरू हुई है। कई मामलों में राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन इन संस्थानों को बंद कराने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं, लेकिन छात्रों के भविष्य को लेकर कोई सीधी व्यवस्था नहीं होती।

फर्जी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे छात्रों के सामने दूसरा बड़ा सवाल फीस से जुड़ा होता है। अधिकांश निजी संस्थान एक साल की फीस 50 हजार रुपये से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक वसूलते हैं। अगर किसी विश्वविद्यालय में 500 से लेकर 2000 तक छात्र नामांकित हों, तो आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि एक ही संस्थान करोड़ों रुपये की राशि इकट्ठा कर लेता है। हालिया सूची में शामिल 32 फर्जी विश्वविद्यालयों को देखें तो यह संख्या 50 हजार से अधिक छात्रों तक पहुँच सकती है। इसका मतलब है कि शिक्षा के नाम पर देशभर में करोड़ों रुपये का खेल खेला गया है। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि वर्तमान व्यवस्था में ऐसा कोई स्पष्ट नियम नहीं है, जिसके तहत इन छात्रों को स्वतः मुआवजा मिल सके। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग केवल चेतावनी जारी कर सकता है और संस्थान को नकली घोषित कर सकता है, लेकिन फीस वापस दिलाने की जिम्मेदारी उसके दायरे में नहीं आती।

कानूनी दृष्टि से देखें तो छात्रों के पास कुछ रास्ते जरूर मौजूद हैं, लेकिन वे आसान नहीं हैं। इंडियन पीनल कोड के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक विश्वासघात जैसी धाराओं में फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ केस दर्ज किया जा सकता है। इसके अलावा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत छात्र खुद को उपभोक्ता मानते हुए कंज्यूमर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं। यदि छात्र यह साबित कर दें कि उन्हें जानबूझकर गुमराह किया गया और संस्थान ने गलत जानकारी देकर उनसे फीस वसूली, तो अदालत मुआवजे का आदेश दे सकती है। हालांकि व्यवहारिक सच्चाई यह है कि बहुत से छात्र समय, पैसे और कानूनी प्रक्रिया की जटिलता के कारण इस रास्ते पर जाने से हिचकिचाते हैं। कई बार जब तक फैसला आता है, तब तक संबंधित फर्जी विश्वविद्यालय या तो बंद हो चुका होता है या उसके संचालक फरार हो जाते हैं।

इसी वजह से विशेषज्ञ सामूहिक कानूनी कार्रवाई की सलाह देते हैं। यदि प्रभावित छात्र समूह बनाकर एक साथ केस दर्ज करें, तो न केवल कानूनी खर्च बंट जाता है, बल्कि संबंधित संस्थान और प्रशासन पर दबाव भी बढ़ता है। कुछ राज्यों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां छात्रों ने मिलकर आवाज उठाई और प्रशासन को सख्त कदम उठाने पर मजबूर किया। फिर भी यह मानना होगा कि यह लड़ाई लंबी और थकाऊ होती है। इसलिए सबसे बेहतर विकल्प यही है कि छात्र दाख़िला लेने से पहले पूरी सतर्कता बरतें और किसी भी संस्थान के दावों पर आंख मूंदकर भरोसा न करें।

दाख़िले के समय सावधानी बरतने की बात करें तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की आधिकारिक वेबसाइट सबसे भरोसेमंद स्रोत मानी जाती है। यहां उन सभी विश्वविद्यालयों की अद्यतन सूची उपलब्ध होती है, जिन्हें UGC एक्ट 1956 के तहत मान्यता प्राप्त है। किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने से पहले छात्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसका नाम इस सूची में मौजूद है या नहीं। इसके अलावा यह भी देखना जरूरी है कि विश्वविद्यालय किस कानून के तहत स्थापित हुआ है—क्या वह केंद्रीय विश्वविद्यालय है, राज्य विश्वविद्यालय है या विधिवत डीम्ड यूनिवर्सिटी। केवल नाम में ‘यूनिवर्सिटी’ शब्द होने से कोई संस्थान वैध नहीं हो जाता।

ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग और ऑनलाइन कोर्स के बढ़ते चलन ने भी फर्जी संस्थानों को पनपने का मौका दिया है। कई फर्जी विश्वविद्यालय दूरस्थ शिक्षा के नाम पर आकर्षक विज्ञापन देते हैं और कम समय में डिग्री देने का वादा करते हैं। UGC के अनुसार, किसी भी ODL प्रोग्राम को चलाने के लिए विश्वविद्यालय को अलग से अनुमति लेनी होती है। यदि कोई संस्थान बिना अनुमति ऐसे कोर्स चला रहा है, तो उससे प्राप्त डिग्री पूरी तरह अमान्य मानी जाती है। इसलिए छात्रों को हर साल जारी होने वाली UGC की अधिसूचनाओं पर नज़र रखनी चाहिए और किसी भी तरह के संदेह की स्थिति में सीधे आयोग से जानकारी लेनी चाहिए।

नई यूनिवर्सिटी खोलने के नियम भी काफी सख्त हैं, लेकिन अक्सर इन्हीं नियमों की जानकारी के अभाव में फर्जी संस्थान फलते-फूलते हैं। UGC एक्ट के सेक्शन 3 के तहत केंद्र सरकार केवल उन्हीं प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा देती है, जो सभी मानकों पर खरे उतरते हों। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक नई प्राइवेट यूनिवर्सिटी खोलने के लिए न्यूनतम 20 एकड़ जमीन, पर्याप्त बुनियादी ढांचा, योग्य फैकल्टी और पारदर्शी प्रशासनिक व्यवस्था जरूरी होती है। पहाड़ी और महानगरीय क्षेत्रों में जमीन की शर्तों में कुछ रियायत दी जाती है, लेकिन नियमों का पालन हर हाल में अनिवार्य है।

इन सब तथ्यों के बावजूद फर्जी विश्वविद्यालयों का नेटवर्क लगातार फैल रहा है, जो यह दर्शाता है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके सख्त क्रियान्वयन की भी जरूरत है। जब तक छात्रों और अभिभावकों में जागरूकता नहीं बढ़ेगी और स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र मजबूत नहीं होगा, तब तक शिक्षा के नाम पर होने वाला यह धोखाधड़ी का खेल पूरी तरह बंद नहीं हो पाएगा। भाग–2 का निष्कर्ष यही है कि फर्जी विश्वविद्यालय केवल छात्रों का भविष्य ही नहीं, बल्कि देश की उच्च शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को भी गंभीर चोट पहुँचा रहे हैं।

शिक्षा के नाम पर पनप रही फर्जी विश्वविद्यालयों की पूरी श्रृंखला केवल कुछ संस्थानों की गड़बड़ी नहीं, बल्कि उस निगरानी व्यवस्था की असफलता का भी आईना है, जो समय रहते चेतावनी देने में नाकाम साबित होती रही है। जब तक किसी यूनिवर्सिटी को यूजीसी की ओर से औपचारिक रूप से फर्जी घोषित किया जाता है, तब तक हजारों छात्र वहां पढ़ाई शुरू कर चुके होते हैं, लाखों-करोड़ों रुपये फीस के रूप में जमा हो चुके होते हैं और कई मामलों में डिग्रियां भी बांटी जा चुकी होती हैं। इसके बाद कार्रवाई होती है, लेकिन तब तक नुकसान स्थायी रूप ले चुका होता है। छात्र न तो अपनी पढ़ाई वापस पा सकते हैं और न ही उस समय को, जो उन्होंने एक गैरकानूनी संस्थान में गंवा दिया। यही वजह है कि शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सूची जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि रियल-टाइम निगरानी, स्थानीय स्तर पर सत्यापन और समय-समय पर सार्वजनिक चेतावनी तंत्र विकसित करना अब अनिवार्य हो गया है।

फर्जी विश्वविद्यालयों के खिलाफ कार्रवाई में एक बड़ी चुनौती यह भी सामने आती है कि ऐसे संस्थान अक्सर खुद को ट्रस्ट, सोसाइटी या एजुकेशनल सेंटर के रूप में रजिस्टर कराते हैं और ‘यूनिवर्सिटी’ शब्द का खुलेआम इस्तेमाल करते हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के छात्र, जिनके पास सही जानकारी और मार्गदर्शन का अभाव होता है, आसानी से इनके झांसे में आ जाते हैं। आकर्षक वेबसाइट, बड़े-बड़े दावे, विदेशी नामों से मिलते-जुलते टाइटल और त्वरित डिग्री का लालच छात्रों को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि उन्हें एक सुनहरा अवसर मिल रहा है। जबकि सच्चाई यह होती है कि न तो ऐसे संस्थानों को डिग्री देने का अधिकार होता है और न ही उनकी पढ़ाई किसी भी स्तर पर मान्य होती है। बाद में जब यूजीसी इन्हें फर्जी घोषित करता है, तब छात्र खुद को ठगा हुआ और असहाय महसूस करते हैं।

कानूनी मोर्चे पर भी तस्वीर ज्यादा उम्मीद जगाने वाली नहीं है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत छात्र शिकायत दर्ज करा सकते हैं, लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया, खर्च और समय की कमी के चलते अधिकतर छात्र इस रास्ते पर आगे नहीं बढ़ पाते। सामूहिक शिकायत की संभावना होने के बावजूद समन्वय की कमी और डर के कारण छात्र अलग-अलग होकर पीछे हट जाते हैं। वहीं, आईपीसी की धाराओं के तहत यदि किसी फर्जी विश्वविद्यालय पर मामला दर्ज भी होता है, तो संस्थान के बंद हो जाने या संचालकों के फरार हो जाने की स्थिति में मुआवजा मिलना बेहद कठिन हो जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे कमजोर कड़ी छात्र ही बनता है, जिसे न तो त्वरित न्याय मिलता है और न ही ठोस राहत।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार और नियामक संस्थाओं को मिलकर एक मजबूत पूर्व-सत्यापन प्रणाली विकसित करनी होगी। हर जिले और राज्य स्तर पर यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए कि कौन से विश्वविद्यालय वैध हैं और कौन से नहीं। स्कूलों और कॉलेजों में करियर काउंसलिंग के दौरान छात्रों को यह भी सिखाया जाना चाहिए कि दाखिला लेने से पहले किन बिंदुओं की जांच जरूरी है। डिजिटल युग में एक सेंट्रल पोर्टल, जहां रियल-टाइम अपडेट के साथ सभी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों की जानकारी उपलब्ध हो, छात्रों के लिए बड़ी राहत बन सकता है।

अंततः फर्जी विश्वविद्यालयों का मुद्दा केवल शिक्षा से जुड़ा विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह सामाजिक विश्वास, आर्थिक शोषण और युवाओं के भविष्य से सीधा जुड़ जाता है। जिस देश की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है, वहां अगर यही युवा शिक्षा के नाम पर ठगे जाएं, तो यह पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जरूरत इस बात की है कि चेतावनी सूची जारी करने से आगे बढ़कर ठोस रोकथाम, त्वरित कार्रवाई और पीड़ित छात्रों के लिए प्रभावी राहत तंत्र तैयार किया जाए, ताकि शिक्षा वास्तव में उज्ज्वल भविष्य का माध्यम बन सके, न कि जीवन भर का बोझ।

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