काशीपुर। काफी लंबे समय से उपेक्षा और असमानताओं का सामना कर रहे सफाई कर्मचारियों ने आखिरकार अपनी पीड़ा को मुखर कर दिया है और अब उनकी आवाज़ सीधे प्रदेश के मुखिया तक पहुंच चुकी है। काशीपुर में देवभूमि उत्तराखंड सफाई कर्मचारी संघ की शाखा ने सोमवार को अपनी गंभीर समस्याओं और भविष्य को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नाम एक विस्तृत पांच सूत्रीय मांगपत्र नगर आयुक्त के माध्यम से भेजा। कर्मचारियों ने साफ शब्दों में यह जताया कि अब उनके धैर्य की सीमा समाप्त हो रही है और अगर सरकार ने उनकी बातों पर गौर नहीं किया तो वे सड़कों पर उतरकर और भी उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे। जिस दृढ़ स्वर और चेतावनी भरे लहजे में यह ज्ञापन सौंपा गया है, उससे यह साफ जाहिर होता है कि सफाई कर्मियों का सब्र अब टूटने की कगार पर पहुंच गया है और वे अब अपनी स्थिति में वास्तविक बदलाव देखना चाहते हैं।
मुख्यमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में रखी गई मांगें कर्मचारियों की लंबे समय से चली आ रही परेशानियों को उजागर करती हैं। सबसे पहली और सबसे अहम मांग यह रखी गई कि पूरे उत्तराखंड प्रदेश में सफाई कार्य में लागू ठेका प्रथा को खत्म किया जाए। कर्मचारियों का कहना है कि इस व्यवस्था के चलते न केवल शोषण बढ़ा है बल्कि स्थायी कर्मचारियों और ठेके पर कार्यरत कर्मचारियों के बीच असमानताएं लगातार गहराती चली गई हैं। इसी के साथ दूसरी प्रमुख मांग यह रखी गई कि स्थानीय निकायों, मेडिकल कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में पांच वर्ष से अधिक समय से संविदा, मोहल्ला स्वच्छता समिति, उपनल और आउटसोर्सिंग के माध्यम से कार्यरत सफाई कर्मचारियों को नियमित किया जाए और उन्हें स्थायी कर्मचारियों के बराबर वेतन दिया जाए। कर्मचारियों का मानना है कि वर्षों से लगातार सफाई व्यवस्था को संभालते हुए भी उन्हें अस्थिरता और असुरक्षा में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जो उनके साथ नाइंसाफी है और सरकार को इसे तुरंत समाप्त करना चाहिए।
तीसरी बड़ी मांग में पुरानी पेंशन बहाल करने की बात रखी गई है। सफाई कर्मियों का कहना है कि भविष्य की सुरक्षा हर कर्मचारी का मौलिक अधिकार है, लेकिन पेंशन व्यवस्था समाप्त होने के बाद से उनका बुढ़ापा असुरक्षित हो गया है। वे चाहते हैं कि सरकार उनके योगदान और त्याग को देखते हुए पुरानी पेंशन को फिर से लागू करे, ताकि उनकी सेवा के बाद का जीवन सुरक्षित और सम्मानजनक बन सके। चौथी मांग में यह कहा गया है कि नजूल भूमि पर वर्षों से बसे हुए सफाई कर्मचारियों को मालिकाना हक दिया जाए। कर्मचारियों का मानना है कि पीढ़ियों से जिन जगहों पर वे रह रहे हैं, वहां का स्थायी हक मिलना ही चाहिए ताकि उनके परिवारों को बेदखली और असुरक्षा की चिंता से मुक्त किया जा सके। यह मांग उनके जीवन और भविष्य को स्थिर करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताई गई है।
इसके अतिरिक्त पांचवें बिंदु में यह रखा गया है कि वर्षों से प्रभारी पर्यावरण पर्यवेक्षक और प्रभारी लिपिक के पदों पर कार्यरत सफाई कर्मचारियों की पदोन्नति की जाए। कर्मचारियों का कहना है कि लगातार जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद उन्हें पदोन्नति और मान्यता नहीं दी गई, जिससे उनका मनोबल टूटता जा रहा है। अब वे चाहते हैं कि उन्हें उनके कार्य के अनुसार पद और सम्मान मिले ताकि वे और अधिक निष्ठा और लगन से काम कर सकें। इन मांगों के जरिए कर्मचारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब वे किसी भी तरह की टालमटोल नहीं चाहते और समाधान चाहते हैं।
इस पूरे आंदोलन में प्रदेश सचिव जितेंद्र देवान्तक, शाखा अध्यक्ष सुरेश सौदा और महासचिव राजीव कुमार (सुपरवाइजर) ने संयुक्त रूप से कर्मचारियों की आवाज़ को बुलंद किया। उन्होंने कहा कि सफाई कर्मचारी नगर निकायों की रीढ़ हैं, लेकिन दुर्भाग्य से उनकी मांगों को लगातार अनसुना किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है जब सरकार को कर्मचारियों की समस्याओं को गंभीरता से समझना होगा और त्वरित समाधान निकालना होगा। उनका कहना है कि सफाई कर्मियों की मेहनत और समर्पण से ही शहरों की स्वच्छता और व्यवस्था कायम रहती है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सम्मान और सुरक्षा से वंचित रखा जा रहा है।
नगर आयुक्त के माध्यम से भेजे गये ज्ञापन ने यह संदेश पूरे प्रदेश में पहुंचा दिया है कि सफाई कर्मचारी अब किसी भी तरह की अनदेखी को बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह तथ्य भी स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक सीधे पहुंच चुकी यह आवाज़ अब सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। यदि कर्मचारियों की बातों को अनसुना किया गया तो यह असंतोष प्रदेश में व्यापक आंदोलन का रूप ले सकता है। साफ है कि सफाई कर्मियों की पुकार अब केवल स्थानीय स्तर पर सीमित नहीं रही बल्कि सीधे सत्ता के उच्चतम स्तर तक पहुंच चुकी है और यह देखना होगा कि सरकार इस पर कितनी गंभीरता से कदम उठाती है।



