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कॉर्बेट प्रशासन की पहल से ढेला की महिलाओं को मिला हुनर और आत्मनिर्भरता का नया अवसर

कॉर्बेट प्रशासन और पुष्कर सोसाइटी की पहल से 11 ग्रामीण महिलाओं ने जूट बैग निर्माण का हुनर सीखा, प्रमाण पत्र पाकर बढ़ा आत्मविश्वास, अब स्वरोजगार से जुड़कर आर्थिक मजबूती और जंगल पर निर्भरता घटाने की उम्मीद।

रामनगर। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व प्रशासन की पहल ने ढेला गांव की ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और स्वरोजगार की दिशा में उम्मीद की एक नई राह खोल दी है। वन क्षेत्र से जुड़े ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और उन्हें आय के वैकल्पिक साधनों से जोड़ने के उद्देश्य से ढेला रेंज के अंतर्गत ग्राम ढेला में 9 अगस्त से 15 अगस्त 2026 तक विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व रामनगर के सौजन्य से आयोजित इस ‘महिला प्रशिक्षण वेलफेयर डेवलपमेंट’ कार्यक्रम में ग्रामीण महिलाओं को जूट के बैग तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। कार्यक्रम का आयोजन पुष्कर सोसाइटी रामनगर की ओर से पूनम गुप्ता द्वारा किया गया। पहल का मूल उद्देश्य महिलाओं को ऐसा हुनर उपलब्ध कराना रहा, जिसके सहारे वे घर और गांव से ही रोजगार का रास्ता तलाश सकें तथा अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकें। प्रशिक्षण ने महिलाओं के भीतर नई संभावनाओं के प्रति विश्वास जगाने के साथ उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर भी दिया।

सात दिनों तक चले इस प्रशिक्षण में महिलाओं को केवल जूट के बैग बनाने की तकनीक ही नहीं सिखाई गई, बल्कि हस्तनिर्मित उत्पादों के माध्यम से स्वरोजगार की संभावनाओं से भी परिचित कराया गया। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को जूट सामग्री के उपयोग, बैग निर्माण की प्रक्रिया और उपयोगी उत्पाद तैयार करने की बारीकियों से अवगत कराया गया, ताकि प्रशिक्षण के बाद वे इस हुनर को अपने स्तर पर आगे बढ़ा सकें। ग्रामीण महिलाओं के लिए इस तरह का कौशल आधारित कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सीमित रोजगार अवसरों वाले क्षेत्रों में घरेलू स्तर पर किए जा सकने वाले कार्य आर्थिक मजबूती का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। कार्यक्रम के जरिए महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ाने, अपनी क्षमताओं को पहचानने, नेतृत्व क्षमता विकसित करने और उद्यमिता की ओर कदम बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। प्रशिक्षण का लक्ष्य महिलाओं को केवल किसी गतिविधि में दक्ष बनाना नहीं, बल्कि उन्हें अपने हुनर को आय के साधन में बदलने के लिए प्रेरित करना भी रहा। इससे महिलाओं को परिवार की आर्थिक स्थिति में योगदान देने के साथ अपने भविष्य को लेकर स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने का अवसर मिल सकता है।

वन्यजीव संरक्षण के नजरिए से भी कॉर्बेट प्रशासन की इस पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों की आजीविका कई बार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जंगल और उसके संसाधनों पर निर्भर रहती है। ऐसे में यदि स्थानीय महिलाओं को गांव में ही रोजगार अथवा स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं तो जंगल पर उनकी आर्थिक निर्भरता को कम करने में सहायता मिल सकती है। इसी सोच के साथ ढेला गांव में आयोजित प्रशिक्षण को महिला कल्याण और संरक्षण के बीच एक उपयोगी कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। जूट के बैग तैयार करने का प्रशिक्षण पर्यावरण के लिहाज से भी उपयोगी विकल्प प्रस्तुत करता है, क्योंकि इससे महिलाओं को हस्तनिर्मित और उपयोगी उत्पाद तैयार करने का अवसर मिलता है। कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश भी सामने आया कि संरक्षण की जिम्मेदारी केवल वन विभाग या वनकर्मियों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी से ही वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण को लंबे समय तक मजबूत बनाया जा सकता है। ग्रामीण महिलाओं को आय का साधन उपलब्ध कराना इसी सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

कार्यक्रम के अंतर्गत ढेला गांव की 11 महिलाओं को जूट के बैग निर्माण का प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद प्रतिभागी महिलाओं को प्रमाण पत्र भी वितरित किए गए, जिससे उनके द्वारा अर्जित कौशल को औपचारिक पहचान मिली। प्रमाण पत्र वितरण कार्यक्रम में उप प्रभागीय वनाधिकारी कालाढूंगी बिन्दर पाल ने महिलाओं का उत्साह बढ़ाया और प्रशिक्षण को ग्रामीण स्तर पर आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ने वाली पहल के रूप में आगे बढ़ाने का संदेश दिया। प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली महिलाओं में सीमा देवी, राधा देवी, नीता गिरी, कंचन बिष्ट, तनुजा रौतेला, ममता बगारी, सविता देवी और रजनी देवी शामिल रहीं। उपलब्ध विवरण में इन आठ महिलाओं के नाम दर्ज हैं, जबकि कार्यक्रम के तहत कुल 11 महिलाओं को प्रशिक्षण दिए जाने की जानकारी दी गई है। प्रशिक्षण के समापन पर महिलाओं के चेहरों पर अपने नए हुनर को लेकर उत्साह देखने को मिला। स्थानीय स्तर पर इस प्रयास से यह उम्मीद जगी है कि प्रशिक्षण प्राप्त महिलाएं भविष्य में जूट बैग निर्माण को छोटे स्तर के घरेलू कारोबार के रूप में विकसित कर सकती हैं और जरूरत के अनुसार अन्य महिलाओं को भी इससे जोड़ सकती हैं।

समापन अवसर पर ग्राम प्रधान ढेला ने कॉर्बेट टाइगर रिजर्व प्रशासन की इस पहल के लिए आभार व्यक्त किया और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने वाले ऐसे कार्यक्रम लगातार आयोजित किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में भी ग्रामीण महिलाओं की जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग प्रकार के कौशल विकास प्रशिक्षण आयोजित किए जाएंगे, जिससे महिलाओं को रोजगार के नए विकल्प मिल सकें। कार्यक्रम में उप प्रभागीय वनाधिकारी कालाढूंगी बिन्दर पाल, वन क्षेत्राधिकारी ढेला नवीन चन्द्र पाण्डे, ग्राम प्रधान श्रीमती आशा रावत, प्रताप रावत, पुष्कर सोसाइटी रामनगर की डायरेक्टर श्रीमती पूनम गुप्ता, सहायक नीतू चौहान, भावना जोशी और बुशरा सहित प्रशिक्षक, पुष्कर सोसाइटी रामनगर के प्रतिनिधि तथा वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे। अधिकारियों और संस्था के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने कार्यक्रम के महत्व को भी रेखांकित किया। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को प्रोत्साहित करने के साथ उन्हें यह भरोसा दिलाने का प्रयास किया गया कि उनके पास मौजूद स्थानीय संसाधनों और सीखे गए कौशल को भविष्य में आजीविका के अवसरों में बदला जा सकता है।

ढेला गांव में आयोजित यह प्रशिक्षण केवल सात दिनों की गतिविधि तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की व्यापक सोच का हिस्सा माना जा रहा है। महिलाओं के लिए स्वरोजगार की संभावनाएं बढ़ने से उनके परिवारों की आय में अतिरिक्त सहयोग मिल सकता है और आर्थिक निर्णयों में उनकी भूमिका भी मजबूत हो सकती है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के पास हुनर होने के बावजूद बाजार, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन का अभाव कई बार उन्हें उस हुनर को व्यवसाय में बदलने से रोकता है। ऐसे में प्रशिक्षण कार्यक्रम उन्हें कौशल के साथ आगे बढ़ने का प्रारंभिक मंच प्रदान करते हैं। जूट बैग निर्माण जैसे काम को स्थानीय स्तर पर छोटे समूह, महिला समूह या घरेलू इकाई के रूप में आगे बढ़ाया जा सकता है। इससे महिलाओं को अपने समय और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ काम करने का अवसर मिल सकता है। यदि भविष्य में तैयार उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने, बिक्री के अवसर विकसित करने और निरंतर मार्गदर्शन जैसी व्यवस्थाएं भी जुड़ती हैं, तो इस पहल का प्रभाव और व्यापक हो सकता है। इस लिहाज से ढेला की महिलाओं के लिए आयोजित प्रशिक्षण को एक शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है, जो आगे चलकर स्थानीय महिला उद्यमिता को नई दिशा दे सकती है।

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व प्रशासन और पुष्कर सोसाइटी रामनगर की इस संयुक्त पहल ने यह भी स्पष्ट किया है कि वन्यजीव संरक्षण और ग्रामीण विकास को साथ लेकर चलने वाली योजनाएं स्थानीय समुदायों में सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं। जब वन क्षेत्र से लगे गांवों के लोगों को सम्मानजनक आजीविका के विकल्प मिलते हैं, तो संरक्षण की भावना को भी मजबूती मिलती है। महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना इस प्रक्रिया में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि ग्रामीण परिवारों में महिलाएं घरेलू अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारशिला होती हैं। ढेला में जूट बैग निर्माण का प्रशिक्षण इसी सोच को जमीन पर उतारने का प्रयास है। इस पहल से महिलाओं को कौशल, आत्मविश्वास और संभावित रोजगार का रास्ता मिला है, वहीं कॉर्बेट क्षेत्र में समुदाय आधारित संरक्षण की अवधारणा को भी मजबूती मिल सकती है। आने वाले समय में यदि ऐसे प्रशिक्षणों को निरंतरता दी जाती है और प्रशिक्षित महिलाओं को उत्पादों की बिक्री, बाजार से जुड़ाव तथा आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराया जाता है, तो यह मॉडल अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणादायक बन सकता है। फिलहाल ढेला की महिलाओं के लिए यह प्रशिक्षण उनके सपनों को नई उड़ान देने वाला ऐसा अवसर बनकर सामने आया है, जिसमें हुनर के साथ आत्मसम्मान, आय और आत्मनिर्भर भविष्य की उम्मीद भी जुड़ी हुई है।

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