देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में कभी अलग राज्य आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज माने जाने वाले उत्तराखंड क्रांति दल की मौजूदा राजनीतिक स्थिति एक बार फिर गंभीर चर्चा का विषय बन गई है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में संगठन लगातार धरना, प्रदर्शन, जनसभाएं, पदयात्राएं और विभिन्न जनसरोकारों से जुड़े आंदोलन कर अपनी सक्रिय मौजूदगी दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है, लेकिन इन तमाम राजनीतिक गतिविधियों के बावजूद उसकी वास्तविक चुनावी हैसियत अब भी बेहद कमजोर बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी दल की ताकत केवल सड़कों पर किए जाने वाले आंदोलनों से नहीं बल्कि चुनावी प्रदर्शन, मत प्रतिशत और संवैधानिक मान्यता से भी तय होती है। यही कारण है कि आज जब उत्तराखंड की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टियां संगठनात्मक रूप से लगातार विस्तार कर रही हैं, उसी समय उत्तराखंड क्रांति दल अपने अस्तित्व को फिर से मजबूत करने की चुनौती से जूझता दिखाई दे रहा है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उत्तराखंड क्रांति दल चुनाव आयोग में एक पंजीकृत राजनीतिक दल तो है, लेकिन उसे क्षेत्रीय राजनीतिक दल के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है। यही स्थिति उसके संगठनात्मक अधिकारों और चुनावी सुविधाओं पर भी सीधा प्रभाव डालती है। राजनीतिक हलकों में इस विषय पर लगातार चर्चा हो रही है कि आंदोलनों के जरिए जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला दल आखिर चुनावी मान्यता प्राप्त करने में अब तक क्यों सफल नहीं हो पाया और इसके पीछे चुनाव आयोग के निर्धारित नियम किस प्रकार सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने खड़े हैं।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में हाल ही में एक ऐसा तथ्य भी सामने आया जिसने उत्तराखंड क्रांति दल की वर्तमान स्थिति को और अधिक स्पष्ट कर दिया। चुनावी प्रक्रिया के दौरान जब विभिन्न राजनीतिक दलों को अपने बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू हुई तो भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने राज्यभर में ग्यारह हजार से अधिक बीएलए नियुक्त कर अपनी संगठनात्मक मजबूती का प्रदर्शन किया। इसके विपरीत उत्तराखंड क्रांति दल इस प्रक्रिया में अपेक्षित भूमिका निभाने में सफल नहीं हो सका। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इसका प्रमुख कारण केवल संगठनात्मक कमजोरी नहीं बल्कि चुनाव आयोग द्वारा क्षेत्रीय मान्यता का अभाव भी है। यही वजह रही कि जिस प्रकार मान्यता प्राप्त दलों को कई प्रशासनिक और चुनावी अधिकार प्राप्त होते हैं, वैसी सुविधाएं उत्तराखंड क्रांति दल को उपलब्ध नहीं हो सकीं। इस घटनाक्रम के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में यह प्रश्न और अधिक तेजी से उठने लगा कि आखिर ऐसा क्यों है कि उत्तराखंड आंदोलन की विरासत का दावा करने वाला दल आज भी चुनाव आयोग से क्षेत्रीय दल का दर्जा हासिल नहीं कर पाया। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी राजनीतिक दल की सक्रियता और उसके संवैधानिक अधिकारों के बीच सीधा संबंध होता है तथा मान्यता प्राप्त होने पर संगठन को चुनावी प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण सुविधाएं और अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाते हैं, जिनका लाभ फिलहाल उत्तराखंड क्रांति दल को नहीं मिल रहा है।
दरअसल, चुनाव आयोग किसी भी राजनीतिक दल को क्षेत्रीय अथवा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा केवल राजनीतिक दावों या आंदोलनों के आधार पर नहीं देता, बल्कि इसके लिए स्पष्ट और पूर्व निर्धारित नियम लागू होते हैं। इन्हीं मानकों के आधार पर तय किया जाता है कि कोई दल केवल पंजीकृत रहेगा या उसे मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दल का दर्जा भी मिलेगा। चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित पहली महत्वपूर्ण शर्त यह है कि संबंधित राजनीतिक दल को पिछले विधानसभा चुनाव में कम से कम छह प्रतिशत वैध मत प्राप्त हुए हों तथा उसके साथ-साथ विधानसभा में कम से कम दो सीटों पर विजय भी मिली हो। यदि कोई दल इन दोनों शर्तों को एक साथ पूरा कर देता है तो वह क्षेत्रीय दल के दर्जे का पात्र बन सकता है। दूसरी व्यवस्था लोकसभा चुनाव से जुड़ी हुई है। इसके अनुसार यदि किसी दल को संबंधित राज्य में हुए पिछले लोकसभा चुनाव में कम से कम छह प्रतिशत मत प्राप्त हुए हों और साथ ही वह लोकसभा की कम से कम एक सीट जीतने में सफल रहा हो, तब भी उसे क्षेत्रीय दल की मान्यता प्रदान की जा सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन दोनों मानकों का उद्देश्य केवल वोट प्रतिशत देखना नहीं बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि संबंधित दल जनता के बीच वास्तविक जनाधार रखता हो और उसे चुनावी सफलता भी मिली हो।

इतना ही नहीं, चुनाव आयोग ने क्षेत्रीय दल की मान्यता के लिए अन्य वैकल्पिक प्रावधान भी निर्धारित किए हैं। तीसरी महत्वपूर्ण शर्त के अनुसार यदि कोई राजनीतिक दल राज्य विधानसभा की कुल सीटों का कम से कम तीन प्रतिशत जीतने में सफल हो जाता है, अथवा यदि तीन प्रतिशत की गणना तीन से कम बैठती हो तो कम से कम तीन विधानसभा सीटें जीत लेता है, तब भी उसे क्षेत्रीय दल का दर्जा मिल सकता है। इसके अतिरिक्त एक अन्य नियम यह भी कहता है कि जिस राज्य से लोकसभा की जितनी सीटें निर्धारित हैं, वहां प्रत्येक पच्चीस लोकसभा सीटों या उसके हिस्से पर कम से कम एक लोकसभा सीट जीतना भी क्षेत्रीय मान्यता का आधार बन सकता है। यदि कोई दल इन मानकों पर खरा उतरता है तो उसे चुनाव आयोग द्वारा क्षेत्रीय पार्टी के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इसके अलावा चुनाव आयोग ने एक और विकल्प भी रखा है जिसके अनुसार यदि कोई राजनीतिक दल विधानसभा चुनाव में सीट जीतने में सफल नहीं हो पाता, लेकिन उसे पूरे राज्य में कम से कम आठ प्रतिशत मत प्राप्त हो जाते हैं, तब भी वह क्षेत्रीय दल का दर्जा पाने का पात्र बन सकता है। इन सभी प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वही दल मान्यता प्राप्त करें जिनका जनता के बीच व्यापक राजनीतिक आधार और वास्तविक चुनावी प्रभाव मौजूद हो।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि इन सभी निर्धारित मानकों की कसौटी पर उत्तराखंड क्रांति दल की वर्तमान स्थिति का आकलन किया जाए तो तस्वीर उसके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण दिखाई देती है। उपलब्ध चुनावी प्रदर्शन के आधार पर यह दल चुनाव आयोग की उन प्रमुख शर्तों में से किसी एक को भी पूरा करने की स्थिति में नहीं पहुंच पाया है, जो क्षेत्रीय दल की मान्यता के लिए अनिवार्य मानी जाती हैं। यही कारण है कि आज भी उत्तराखंड क्रांति दल चुनाव आयोग के अभिलेखों में केवल एक पंजीकृत राजनीतिक दल के रूप में दर्ज है, जबकि उसे क्षेत्रीय राजनीतिक दल का दर्जा प्राप्त नहीं है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी संगठन पर व्यापक प्रभाव डालती है। मान्यता प्राप्त दलों को चुनाव चिह्न, चुनावी प्रक्रियाओं, संगठनात्मक अधिकारों और कई प्रशासनिक सुविधाओं में जो लाभ मिलता है, उससे उत्तराखंड क्रांति दल फिलहाल वंचित है। यही वजह है कि राज्य में लगातार आंदोलन चलाने, विभिन्न जनमुद्दों को उठाने और राजनीतिक सक्रियता बनाए रखने के बावजूद उसकी चुनावी स्वीकार्यता अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। अब राज्य की राजनीतिक निगाहें आगामी चुनावों पर टिक गई हैं, जहां सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा कि क्या उत्तराखंड क्रांति दल अपने चुनावी प्रदर्शन में ऐसा बदलाव ला पाएगा जिससे वह चुनाव आयोग की निर्धारित शर्तों में से किसी एक को पूरा कर सके, या फिर आंदोलनों तक सीमित रहकर उसकी राजनीतिक पहचान पहले की तरह केवल संघर्षों तक ही सिमटकर रह जाएगी। आने वाला चुनावी मुकाबला इस दल के लिए केवल सीटों की लड़ाई नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता, संगठनात्मक विश्वसनीयता और क्षेत्रीय मान्यता की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा भी साबित हो सकता है।





