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सरकारी सुस्ती में फंसा एक करोड़ का सोलर प्रोजेक्ट युवा उद्यमीयों पर मंडराया दिवालिया होने का संकट

मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत स्थापित 200 किलोवाट सोलर प्लांट सब्सिडी, यूपीसीएल शटडाउन, बैंक ब्याज और विभागीय लापरवाही के बोझ तले जूझ रहा है, जिससे स्वरोजगार के सरकारी दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

उत्तराखंड। प्रदेश में स्वरोजगार की सुनहरी इबारत लिखने का दम भरने वाली सरकारी योजनाएं प्रशासनिक बेरुखी और विभागीय सुस्ती के कारण किस कदर दम तोड़ रही हैं, इसका एक बेहद चौंकाने वाला और आंखें खोलने वाला जीता-जागता उदाहरण नैनीताल जिले के पर्वतीय क्षेत्र में देखने को मिला है। सरकार राज्य से पलायन रोकने और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिस मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना का जोर-शोर से ढिंढोरा पीट रही है, उसकी जमीनी हकीकत को उजागर करने और जनता को प्रशासनिक तंत्र की कड़वी सच्चाई से रूबरू कराने के लिए स्थानीय उद्यमी ने बड़ा खुलासा किया है। स्थानीय उद्यमी ने पर्वतीय क्षेत्र जैसे ग्रामीण इलाके में एक विशाल और महत्वाकांक्षी कमर्शियल सोलर पावर प्लांट स्थापित किया है, जो पूरी तरह से ऑन-ग्रिड प्रणाली पर आधारित है। इस पूरे प्रोजेक्ट को लेकर युवाओं में कई तरह की भ्रांतियां और जिज्ञासाएं थीं, जिन्हें शांत करने और इस व्यवसाय के नफे-नुकसान से आम जनता को अवगत कराने के उद्देश्य से जब जमीनी पड़ताल की गई, तो पता चला कि यह प्लांट कोई छोटा-मोटा घरेलू ढांचा नहीं बल्कि पूरे दो सौ किलोवाट की भारी-भरकम क्षमता वाला एक बड़ा प्रोजेक्ट है, जिसे स्थानीय उद्यमी ने अपने अथक प्रयासों से खड़ा तो कर दिया है, लेकिन अब वे विभागीय भूलभुलैया में फंसकर अपनी पूंजी बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

इस पूरे व्यवसाय के वित्तीय ताने-बाने और आर्थिक निवेश पर नजर डालें तो पर्वतीय क्षेत्र का यह विशाल सोलर प्रोजेक्ट कुल मिलाकर लगभग एक करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार हुआ है। इस एक करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने के लिए सरकार की नीति के अनुसार वित्तीय ढांचे को दो हिस्सों में विभाजित किया गया था, जिसमें पचहत्तर प्रतिशत हिस्सेदारी बैंक ऋण के माध्यम से और पच्चीस प्रतिशत उद्यमी का अपना अंशदान यानी मार्जिन मनी के रूप में तय की गई थी। स्थानीय उद्यमी ने इस उद्योग को शुरू करने के लिए अपने स्तर से पच्चीस लाख रुपये की मोटी मार्जिन मनी की व्यवस्था की, जबकि शेष पचहत्तर लाख रुपये का भारी-भरकम लोन उन्होंने उत्तराखण्ड ग्रामीण बैक नामक वित्तीय संस्थान से स्वीकृत करवाया। स्वरोजगार को बढ़ावा देने और विशेष रूप से महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के सरकारी दावों के तहत इस प्लांट को एक उच्च शिक्षित पोस्ट ग्रेजुएट महिला के नाम पर पंजीकृत किया गया था, क्योंकि सरकारी नियमों के मुताबिक इस योजना के अंतर्गत महिला उद्यमियों को पच्चीस लाख रुपये और पुरुष आवेदकों को बीस लाख रुपये की भारी सब्सिडी यानी अनुदान राशि देने का प्रावधान तय किया गया था, ताकि शिक्षित लोग महानगरों की ओर भागने के बजाय अपने ही गांव-घर में कारोबार स्थापित कर सकें।

कागजी दावों में बेहद आकर्षक और मुनाफे का सौदा दिखने वाली यह मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना जिला उद्योग केंद्र की लचर और निराशाजनक कार्यप्रणाली के कारण अब एक बड़े आर्थिक संकट में तब्दील होती जा रही है। स्थानीय उद्यमी ने बेहद निराशा व्यक्त करते हुए बताया कि प्लांट पूरी तरह चालू होने के बावजूद उनकी सब्सिडी की फाइलें पिछले कई महीनों से जिला उद्योग केंद्र के दफ्तरों में धूल फांक रही हैं और सरकारी बाबुओं की हीलाहवाली के कारण अनुदान राशि जारी नहीं की जा रही है। विभागीय अधिकारियों द्वारा इस सब्सिडी को रोकने के पीछे भूमि उपयोग परिवर्तन यानी धारा एक सौ तैंतालीस (143) की अनिवार्यता का अजीबोगरीब बहाना बनाया गया, जिसका इस योजना के शुरुआती दिशा-निर्देशों में कहीं कोई स्पष्ट उल्लेख तक नहीं था। उद्यमी ने भारी मानसिक और आर्थिक परेशानी झेलते हुए जैसे-तैसे अपनी जमीन का धारा एक सौ तैंतालीस का प्रमाणीकरण भी करवाकर विभाग को सौंप दिया, लेकिन इसके बावजूद उनकी फाइल को एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर में घुमाया जा रहा है और सब्सिडी की रकम अटके होने के कारण उन्हें बैंक के भारी ब्याज का भुगतान अपनी जेब से करना पड़ रहा है, जिससे यह पूरा प्रोजेक्ट दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया है।

जिला उद्योग केंद्र की प्रशासनिक लापरवाहियों के साथ-साथ ऊर्जा विभाग यानी उत्तराखंड पावर कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) की तकनीकी खामियों ने इस सोलर प्लांट के संचालन को पूरी तरह से घाटे का सौदा बना दिया है। स्थानीय उद्यमी ने तकनीकी दिक्कतों को साझा करते हुए बताया कि यूपीसीएल की तरफ से आए दिन बिजली का बड़ा ब्रेकडाउन होना या अकारण ही ग्रिड का पूरी तरह से शटडाउन कर दिया जाना अब एक रोजमर्रा की आदत बन चुकी है, जिसके कारण सोलर प्लांट में बिजली का उत्पादन उम्मीद के मुताबिक और सुचारू रूप से बिल्कुल नहीं हो पा रहा है। सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति तब पैदा होती है जब दोपहर के समय सूर्य देव अपनी पूरी तपिश पर होते हैं और बिजली उत्पादन का सबसे बेहतरीन यानी पीक टाइम होता है, ठीक उसी समय यूपीसीएल के कर्मचारी अपनी लाइनों के रख-रखाव या मरम्मत कार्य का बहाना बनाकर घंटों का शटडाउन ले लेते हैं। सूर्य की प्राकृतिक रोशनी के समय को तो इंसानी तौर पर बदला नहीं जा सकता, लेकिन विभागीय कर्मचारी अगर चाहें तो अपने रख-रखाव के कार्य के समय में थोड़ा बदलाव करके इस भारी नुकसान को रोक सकते थे, परंतु इस आपसी समन्वय की घोर कमी के चलते सौर ऊर्जा का समुचित जेनरेशन नहीं हो पा रहा है।

इस सौर ऊर्जा संयंत्र की आंतरिक कार्यप्रणाली और ग्रिड मैपिंग की तकनीकी बारीकियों को समझाते हुए स्थानीय उद्यमी ने आम जनता के बीच फैली उन तमाम भ्रांतियों को भी दूर किया जो इस प्रकार के बड़े प्लांटों से पैदा होने वाली बिजली के उपभोग को लेकर अक्सर समाज में बनी रहती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से एक कमर्शियल और ऑन-ग्रिड प्लांट है, जिसका अर्थ यह है कि इस प्लांट से उत्पादित होने वाली बिजली का कोई भी हिस्सा वे अपने व्यक्तिगत या घरेलू उपयोग में बिल्कुल नहीं ला सकते हैं। इस प्लांट में स्थापित आधुनिक सोलर पैनलों के माध्यम से जो बिजली बनती है, वह सीधे इनवर्टर के जरिए होकर उनके अपने निजी सब-स्टेशन तक पहुंचती है, जहां पर मानकों के अनुसार एक बड़ा ट्रांसफार्मर लगाया गया है। यह ट्रांसफार्मर उत्पादित बिजली को अपग्रेड करके सीधे यूपीसीएल की ग्यारह हजार वोल्ट (11 KV) की मुख्य लाइन में मर्जी यानी समाहित कर देता है, और जिस प्रकार ग्रिड से बिजली ऑटोमैटिक तरीके से घरों में आती है, ठीक उसी तरह यहां से उत्पन्न बिजली मीटरिंग की रीडिंग के हिसाब से सीधे सरकार के खाते में ट्रांसफर हो जाती है, जिसके लिए यूपीसीएल के साथ पूरे पच्चीस वर्षों का एक दीर्घकालिक एग्रीमेंट हुआ है।

यूपीसीएल और उत्तराखंड सरकार के बीच हुए इस दीर्घकालिक अनुबंध के तहत वर्तमान में सोलर प्लांट से मिलने वाली बिजली के लिए चार रुपये चौंसठ पैसे प्रति यूनिट की दर निर्धारित की गई है, जो सुनने में तो काफी आकर्षक लगती है लेकिन व्यावहारिक धरातल पर नाकाफी साबित हो रही है। स्थानीय उद्यमीयों का कहना है कि कागजों पर और सरकारी विज्ञापनों में तो चार रुपये चौंसठ पैसे की यह दर और पूरी योजना बहुत ही सुंदर और लाभदायक प्रतीत होती है, परंतु जब कोई उद्यमी इसे प्रैक्टिकली जमीन पर चलाता है, तो सच्चाई बिल्कुल उलट नजर आती है। इतने बड़े क्षेत्रफल में फेले हुए सोलर प्लांट को व्यवस्थित रखने, उसकी दैनिक साफ-सफाई करने, सोलर पैनलों पर जमने वाली धूल को हटाने और पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर की देखरेख के लिए भारी-भरकम लेबर और मेंटेनेंस का खर्च उठाना पड़ता है। स्थानीय उद्यमीयांें ने सीधे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कोई युवा केवल और केवल इसी सरकारी योजना के भरोसे अपनी आजीविका चलाने की सोच रहा है, तो सरकारी विभागों की इस लचर व्यवस्था के कारण उसे एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) होने या पूरी तरह दिवालिया होकर सड़क पर आने में जरा सा भी वक्त नहीं लगेगा।

इस व्यावसायिक संकट को और अधिक भयावह बनाने में सोलर उपकरण बेचने वाले वेंडरों की गैर-जिम्मेदाराना भूमिका भी पूरी तरह से जिम्मेदार है, जो माल बेचने के बाद उद्यमियों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं। स्थानीय उद्यमीयों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि वेंडर स्तर पर किसी भी प्रकार की आपातकालीन या स्टैंडबाय व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई गई है, जो कि इतने बड़े निवेश वाले प्रोजेक्ट के लिए बेहद जरूरी होती है। यदि प्लांट का कोई कीमती उपकरण या इनवर्टर की कोई मशीनरी तकनीकी खराबी के कारण अचानक बंद हो जाती है, तो वेंडर के पास तुरंत बदलने के लिए कोई अतिरिक्त स्पेयर पार्ट या बैकअप मशीन नहीं होती है। नतीजतन, उस खराब उपकरण की शिकायत दर्ज कराने से लेकर कंपनी से नया पुर्जा आने और उसके दोबारा इंस्टॉल होने की पूरी प्रक्रिया में दो से तीन महीने का एक लंबा समय बर्बाद हो जाता है, जिससे उद्यमी को लाखों रुपये का सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। यह बेबसी की स्थिति किसी भी छोटे व्यवसायी के लिए जीवन और मरण के सवाल जैसी बन जाती है, क्योंकि प्लांट बंद रहने के दौरान भी बैंक के लोन की मासिक किस्त और उसका भारी ब्याज लगातार मीटर की तरह बढ़ता रहता है।

इन तमाम विषम और विपरीत परिस्थितियों के बीच मानसून यानी बारिश के मौसम में इस सोलर प्लांट के भीतर होने वाले बिजली उत्पादन के पैटर्न को लेकर भी स्थानीय उद्यमी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण और दिलचस्प तकनीकी पहलू साझा किया है। आम तौर पर लोग यह सोचते हैं कि बरसात के महीनों में धूप न निकलने के कारण सोलर प्लांट पूरी तरह बेकार हो जाते हैं, लेकिन स्थानीय उद्यमीयों के अनुसार बारिश का मौसम इस प्लांट के लिए एक तरह से वरदान भी साबित होता है क्योंकि तेज बारिश से सोलर प्लेटों पर जमी धूल और गंदगी पूरी तरह साफ हो जाती है। यदि मानसून के दौरान सुबह के समय चार घंटे लगातार मूसलाधार बारिश होती है और उसके बाद अचानक मौसम साफ होकर तेज धूप खिल जाती है, तो साफ सुथरी प्लेटें अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करती हैं और एक ही दिन में सात सौ, आठ सौ और कभी-कभी तो एक हजार यूनिट तक बिजली का बेहतरीन जेनरेशन करके पिछले नुकसान की भरपाई कर देती हैं। हां, यह बात जरूर है कि यदि आसमान में पूरे दिन काले घने बादल छाए रहें और सूरज की एक भी किरण धरती तक न पहुंचे, तो जेनरेशन पूरी तरह शून्य हो जाता है, लेकिन मौसम खुलते ही उत्पादन फिर से रफ्तार पकड़ लेता है, बशर्ते सरकारी विभाग अपनी कमियों को सुधारें और युवाओं के इस स्वरोजगार को सचमुच बर्बादी से बचाएं।

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