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आखिर नीले वस्त्र तलवार भाले और स्टील खूंटियों वाली पगड़ी वाले निहंग सिख कौन हैं

नीले वस्त्र, चमकती तलवारें और स्टील की खूंटियों से सजी पगड़ी वाले निहंग सिखों की अनोखी परंपरा, वीरता, खालसा इतिहास और आध्यात्मिक शौर्य की रहस्यमयी दुनिया को समझने की पूरी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कहानी।

उत्तराखंड।उत्तराखंड के पवित्र गुरुद्वारे की छत पर कुछ लोगों के अचानक चढ़ने और उसके बाद कानून व्यवस्था संभाल रही पुलिस टीम के साथ हुई तीखी धक्का-मुक्की की हालिया घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान एक विशेष समुदाय की ओर खींच लिया है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में नीले रंग के लंबे वस्त्र धारण किए, हाथों में चमचमाती तलवारें, नुकीले भाले और सिर पर चक्र तथा स्टील की खूंटियों से सजी भारी-भरकम अनूठी पगड़ी पहने निहंग सिख मौजूद हैं, जो अपनी विशिष्ट जीवनशैली के कारण इस समय मीडिया से लेकर आम जनता के बीच भारी चर्चा का विषय बने हुए हैं। आम लोगों के मन में यह कौतूहल लगातार गहराता जा रहा है कि आखिर सर्वधर्म समभाव की धरती पर अपनी अलग पहचान रखने वाले ये जांबाज योद्धा कौन हैं और इनका गौरवशाली इतिहास क्या है। यदि हम सिख धर्म के महान और प्रामाणिक विद्वान माने जाने वाले भाई कहान सिंह की कालजयी रचना ‘महान कोष’ के पन्नों को पलटकर देखें, तो उसमें ‘निहंग’ शब्द का सीधा और स्पष्ट शाब्दिक अर्थ ‘तलवार’ के रूप में परिभाषित किया गया है। विद्वान लेखक आगे विस्तार से समझाते हुए लिखते हैं कि वास्तविक रूप में निहंग केवल वही अनन्य साधक है जिसने अपने मन से मौत के खौफ को हमेशा के लिए निकाल फेंका है, जो कौम और धर्म की आन-बान-शान के लिए किसी भी क्षण हंसते-हंसते शहादत का जाम पीने को तैयार रहता है और सांसारिक मोह-माया के बंधनों से कोसों दूर एक फकीर की तरह अपना जीवन व्यतीत करता है।

इस समूची ऐतिहासिक और आध्यात्मिक व्यवस्था को बेहद गहराई से समझने के लिए हमें आज से सदियों पीछे इतिहास के उस स्वर्णिम कालखंड में जाना होगा जब साल 1699 में दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने पावन आनंदपुर साहिब की धरती पर ऐतिहासिक खालसा पंथ की स्थापना करके एक क्रांतिकारी युग की शुरुआत की थी। यह मूल रूप से एक ऐसा विशिष्ट और अनुशासित सैन्य-धार्मिक संगठन है जिसमें कोई भी निष्ठावान सिख व्यक्ति अपने धर्म, संस्कृति और मानवता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने के लिए स्वेच्छा से शामिल हो सकता है। भाषाई दृष्टिकोण से ‘खालसा’ शब्द की उत्पत्ति मूल रूप से ‘खालिस’ से मानी जाती है जिसका शुद्ध और सरल अर्थ पूर्णतः पवित्र, पावन या बिना किसी मिलावट के शुद्ध होता है। सिख परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं में इस अलौकिक शब्द का सीधा तात्पर्य गुरु के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर देने वाले और बाकायदा दीक्षा ग्रहण करने वाले अमृतधारी सिखों के एक विशाल सामूहिक और अखंड समुदाय से जोड़ा जाता है। समकालीन इतिहासकार बताते हैं कि एक विशेष अवसर पर गुरु गोबिंद सिंह ने भारी जनसमूह के बीच अपनी म्यान से तलवार निकालकर अत्यंत ओजस्वी आवाज में ऐलान किया था कि इस विकट परिस्थिति में धर्म, राष्ट्र और मानवता की रक्षा के लिए पांच जांबाज लोग अपने प्राणों की आहुति देने के लिए आगे आएं।

गुरु के इस अभूतपूर्व और अग्निपरीक्षा जैसे आह्वान को सुनकर उस भरी सभा में से जो पांच अत्यंत साहसी और निष्ठावान अनुयायी बिना किसी संकोच के अपने सिर का बलिदान देने के लिए आगे बढ़े, उन्हें इतिहास में हमेशा के लिए ‘पंच प्यारे’ के नाम से संबोधित किया गया। अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करने तथा सिख धर्म की रक्षा के लिए स्वयं को पूरी तरह से होम कर देने वाली इसी महान और निश्वार्थ वैचारिक सोच व क्रांतिकारी धारा को आगे चलकर ‘खालसा पंथ’ के नाम से जाना गया। अब यदि हम इस व्यवस्था के भीतर निहंग सिखों की विशेष स्थिति और उनकी भूमिका की बात करें, तो समृद्ध सिख इतिहास के पन्नों में निहंगों की उत्पत्ति, उनके अदम्य साहस और अस्तित्व को लेकर कई तरह की लोककथाएं और ऐतिहासिक संस्मरण प्रमुखता से प्रचलित हैं। वर्तमान समय में निहंगों के एक पारंपरिक दल से सक्रिय रूप से जुड़े लखविंदर सिंह निहंग का इस विषय पर अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट तौर पर कहना है कि खालसा पंथ के निर्माण के पावन समय पर गुरु साहिब ने जिस परम आदर्श, नैतिकता और सर्वोच्च मानवीय गुणों से युक्त महामानव की कल्पना की थी, वह वास्तव में एक निहंग सिंह का ही साक्षात स्वरूप था। इसका सीधा और सरल अर्थ यह निकाला जा सकता है कि जो व्यक्ति खालसा पंथ के कड़े नियमों और मर्यादाओं का पूरी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और कड़ाई से पालन करता है, वही सही मायनों में सच्चा निहंग है।

इसी महान और पराक्रमी परंपरा के इतिहास में एक अत्यंत वीर, निडर और अद्वितीय योद्धा हुए थे जिन्हें इतिहास फुला सिंह अकाली के नाम से जानता है, जिन्होंने अपनी बहादुरी के दम पर सिखों की विशाल फौज के जनरल के रूप में एक लंबा और गौरवशाली समय बिताया था। अपने बेदाग सैन्य करियर और अदम्य साहस के साथ-साथ उन्होंने सिखों के सर्वोच्च धार्मिक केंद्र अकाल तख्त साहिब के मुख्य जत्थेदार के तौर पर भी अपनी सेवाएं दी थीं और समाज को एक नई दिशा दिखाई थी। अमृतसर के जगप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर परिसर के ठीक सामने स्थित पवित्र अकाल तख्त को पूरे विश्व के सिखों के सर्वोच्च तख्त यानी धार्मिक और आध्यात्मिक सिंहासन के रूप में स्वीकार किया जाता है और इस सर्वोच्च पीठ के प्रमुख को पारंपरिक तौर पर जत्थेदार कहा जाता है। एस पी न्यूज़ ने इस संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय की बारीकियों को समझने के लिए प्रोफेसर बल्कार सिंह से एक अत्यंत विस्तृत और ज्ञानवर्धक बातचीत की थी। प्रोफेसर बल्कार सिंह अपनी विद्वत्ता के लिए जाने जाते हैं और वे पंजाब की प्रतिष्ठित पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में ‘गुरु ग्रंथ साहिब स्टडीज’ विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष (हेड) के रूप में अपनी लंबी सेवाएं दे चुके हैं।

वरिष्ठ विद्वान प्रोफेसर बल्कार सिंह निहंगों के इतिहास पर और अधिक प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि उस दौर में फुला सिंह की अपनी एक विशाल, अनुशासित और बेहद खतरनाक निहंग सेना हुआ करती थी जो युद्ध कला में पूरी तरह निपुण थी। वह वीर सेनापति अपनी इस जांबाज लड़ाकू सेना के साथ तत्कालीन सिख साम्राज्य के प्रतापी महाराजा रणजीत सिंह के सैन्य अभियानों में मदद करने और दुश्मनों को धूल चटाने के लिए युद्ध के मैदान में पूरी ताकत से लड़ने जाते थे। फुला सिंह के महाराजा रणजीत सिंह के साथ बेहद घनिष्ठ, सम्मानजनक और विशेष रणनीतिक रिश्ते थे क्योंकि फुला सिंह स्वभाव से अत्यंत साहसी, रणकौशल में माहिर और अपनी बात के पक्के बेहद बहादुर योद्धा थे। समय के चक्र के साथ जब संगठन का विस्तार हुआ, तो साल 1734 में प्रशासनिक और रणनीतिक सहूलियत के लिहाज से इन निहंग योद्धाओं को मुख्य रूप से दो अलग-अलग सक्रिय गुटों में विभाजित कर दिया गया, जिन्हें क्रमशः ‘बुड्ढा दल’ और ‘तरना दल’ के नाम से पुकारा गया। इस सांगठनिक विभाजन के कड़े नियमों के तहत चालीस साल या उससे अधिक आयु के अनुभवी और परिपक्व निहंगों को बुड्ढा दल का सम्मानित सदस्य मनोनीत किया गया। वहीं दूसरी तरफ, युवा ऊर्जा का सही इस्तेमाल करने के लिए चालीस साल से कम उम्र के जोशीले और फुर्तीले निहंगों को तरना दल का हिस्सा बनाया गया।

इन दोनों गुटों की कार्यप्रणाली और समाज के प्रति जिम्मेदारियां भी उनकी आयु और अनुभव के आधार पर पूरी तरह से अलग और स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई थीं। बुड्ढा दल के कंधों पर मुख्य रूप से विभिन्न ऐतिहासिक गुरुद्वारों की देखरेख करना, उनकी पवित्र सेवा का प्रबंधन संभालना और देश-विदेश में सिख धर्म के शांतिपूर्ण सिद्धांतों का व्यापक प्रचार-प्रसार करने की अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके ठीक विपरीत, युवाओं से सजे तरना दल के जांबाज सदस्यों का प्राथमिक और मुख्य काम धर्म के दुश्मनों के खिलाफ समय आने पर हथियार उठाना, सीमाओं की रक्षा करना और खालसा पंथ की चहुंमुखी उन्नति व प्रगति के लिए निरंतर काम करना था। उस ऐतिहासिक दौर में इन दोनों गुटों की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक गुट में लगभग 1300 से लेकर 5000 तक पूरी तरह से प्रशिक्षित और आधुनिक व पारंपरिक हथियारों से लैस निहंग सैनिक हमेशा तैनात रहते थे। इन निहंगों का अपना एक बेहद अनूठा और विशिष्ट पारंपरिक पहनावा होता है जो उन्हें दूर से ही एक अलग और सम्मानित पहचान देता है, जिसमें गहरे नीले रंग के पोशाक, कमर में लटकती तलवार, हाथों में लंबा भाला और चक्र व स्टील की नुकीली खूंटियों से कलात्मक रूप से सजाई गई भारी पगड़ी शामिल है।

सिख इतिहास, संस्कृति और धार्मिक मामलों के गहरे जानकार डॉक्टर गुरदर्शन सिंह ढिल्लों इस अनूठी शस्त्र परंपरा के पीछे के वास्तविक दर्शन को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि हर समय अपने पास हथियार रखना सिखों की एक बेहद प्राचीन और गौरवशाली धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। इस महान शस्त्र परंपरा की विधिवत शुरुआत सदियों पहले गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना करने के साथ ही हो गई थी और इसे धर्म का अनिवार्य अंग माना गया था। इस कड़े नियम के पीछे गुरु साहिब का मुख्य तर्क और दर्शन यह था कि शारीरिक और सैन्य शक्ति का इस्तेमाल हमेशा केवल सही, न्यायसंगत और मानवीय मकसदों के लिए ही किया जाना चाहिए। शस्त्र का उपयोग किसी भी परिस्थिति में कमजोरों को डराने के लिए नहीं, बल्कि समाज के गरीब, असहाय और मजलूम लोगों पर होने वाले अत्याचार व जुल्म को रोकने तथा किसी भी व्यक्ति के साथ होने वाले अन्याय को समूल नष्ट करने के लिए होना चाहिए। सदियों से शक्तिशाली और वफादार घोड़े तथा प्राचीन काल के पारंपरिक धारदार हथियार इन निहंग सिखों की सबसे बड़ी पहचान और शान रहे हैं जिसके बिना उनके अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

आधुनिक दौर में इस समुदाय की वर्तमान स्थिति पर बात करते हुए डॉक्टर गुरदर्शन सिंह ढिल्लों अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य साझा करते हुए बताते हैं कि आज के समय में पंजाब या देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले निहंगों की सटीक मौजूदा संख्या का सरकार या किसी संस्था के पास कोई आधिकारिक लिखित रिकॉर्ड या अलग से डेटा मौजूद नहीं है। इसके पीछे का मुख्य तकनीकी कारण यह है कि देश में होने वाली आधिकारिक राष्ट्रीय जनगणना की प्रक्रिया के दौरान निहंगों को किसी अलग संप्रदाय के बजाय मूल रूप से सिख आबादी के भीतर ही गिना और शामिल किया जाता है। यही कारण है कि आज भी यह जांबाज समुदाय अपने गौरवशाली इतिहास, अदम्य साहस, अनूठी युद्ध कला और सख्त धार्मिक मर्यादाओं को संजोए हुए आधुनिक समाज के बीच अपनी एक बेहद खास, रहस्यमयी और बेहद आकर्षक पहचान बनाए हुए है, जो समय-समय पर अपने विशिष्ट कारनामों और अटूट धार्मिक निष्ठा के कारण देश की मुख्यधारा की चर्चाओं में शीर्ष पर आ जाता है।

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