भारत। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे काले अध्याय यानी आपातकाल के पूरे पचास वर्ष बीत जाने के बाद आज देश के भीतर एक बेहद गंभीर, तीखी और विचारणीय बहस छिड़ गई है कि वर्तमान समय में हमारी मुख्यधारा की मीडिया, चुनी हुई सरकार और देश के आम नागरिक आखिर किन मुद्दों और अंतर्विरोधों में बुरी तरह उलझे हुए हैं। इस जलते हुए और बेहद संवेदनशील विषय पर देश की सुप्रसिद्ध और वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर ने अपनी बेबाक और अत्यंत निष्पक्ष राय खुलकर सामने रखी है, जिन्होंने वर्ष एक हज़ार नौ सौ पिचहत्तर (1975) में देश पर थोपे गए उस भयावह और दमनकारी दौर को बहुत ही करीब से और प्रत्यक्ष रूप से देखा तथा महसूस किया था। उन्होंने देश के वर्तमान परिदृश्य और खासकर आधुनिक टेलीविजन पत्रकारिता की रीढ़हीन कार्यशैली पर तीखा प्रहार करते हुए साफ तौर पर कहा कि आज के अधिकांश टीवी चौनल अपनी पत्रकारिता का सबसे कीमती और अधिकांश समय केवल और केवल सरकारी विमर्श तथा सत्ता पक्ष के नैरेटिव को अंधाधुंध तरीके से आगे बढ़ाने में ही बर्बाद कर रहे हैं। चैनलों पर प्राइम टाइम के दौरान होने वाली कथित चर्चाएं केवल बीजेपी प्रवक्ताओं और सरकार के बेहद करीबी समझे जाने वाले चुनिंदा लोगों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई हैं, जहां बहस और जवाबदेही के नाम पर महज एक औपचारिकता निभाई जाती है, जिससे समाज में ज्ञान की रोशनी और तार्किकता कम पैदा होती है, बल्कि शोर-शराबा, चीख-पुकार और वैचारिक अराजकता बहुत ज्यादा दिखाई देती है।
वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर ने अपनी गहरी राजनीतिक और सामाजिक समझ का हवाला देते हुए लिखा है कि आज के दौर में भारतीय मीडिया पर जो अघोषित पाबंदियां और अदृश्य दबाव दिखाई दे रहे हैं, वे निश्चित रूप से वर्ष एक हज़ार नौ सौ पिचहत्तर से सतहत्तर (1975-1977) के उस क्रूर दौर जितने प्रत्यक्ष और कानूनी रूप से सख्त तो नहीं हैं, क्योंकि उस खौफनाक दौर में बकायदा लिखित सेंसरशिप लागू थी। उस समय सरकार से असहमति जताने वाले निर्भीक पत्रकारों और विपक्षी राजनेताओं को बिना किसी कानूनी मुकदमे और बिना किसी तय मियाद के अनिश्चितकाल के लिए जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जाता था, यहाँ तक कि अदालतों के सामने पेश होने और अपनी बेगुनाही साबित करने जैसे परम पावन संवैधानिक अधिकारों को भी कुछ समय के लिए पूरी तरह से छीन लिया गया था। परंतु इसके बावजूद, कु. कपूर का मानना है कि हमें आज के इस बदले हुए खतरनाक समय पर भी बहुत ही संजीदगी और गहराई से विचार करना होगा, क्योंकि आज पाबंदियों का स्वरूप बदल चुका है। वर्तमान दौर में जिन जमीनी पत्रकारों को निडरता से फील्ड में जाकर सच्ची खबरों की पड़ताल करनी चाहिए, वे खुद पर ही एक मानसिक सेंसर लगाने लगे हैं, क्योंकि उनके भीतर हमेशा यह छुपा हुआ डर हावी रहता है कि कहीं उनकी बेबाक रिपोर्टिंग से सत्ता के गलियारों में बैठे ताकतवर लोग नाराज न हो जाएं और उनके जरूरी सोर्सेस तथा सूचनाओं के सरकारी स्रोत हमेशा के लिए बंद न हो जाएं।
मीडिया की इसी चाटुकारिता और सत्ता के प्रति बढ़ते झुकाव की वैश्विक धारणा को पिछले दिनों अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपने एक बयान से बहुत ज्यादा मजबूती दे दी थी, जब उन्होंने फ्रांस के भीतर भारतीय प्रधानमंत्री पीएम मोदी के साथ आयोजित एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सरेआम मुस्कुराते हुए कहा था कि आपके देश के पत्रकार, मेरे देश के अमेरिकी पत्रकारों की तुलना में कहीं ज्यादा अच्छे, शालीन और मददगार हैं। आज के इस दौर में बीते जमाने की उस कठोर सेंसरशिप की जगह अब सत्ता में बैठी पार्टियों और सरकारों के वे चतुर ‘मीडिया मैनेजर्स’ आ गए हैं, जो मूल रूप से कॉरपोरेट जगत के पेशेवर कम्युनिकेशन एक्सपर्ट होते हैं और जिनका दार्शनिक जॉन मिल जैसी महान और स्वतंत्र सोच से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं होता। दार्शनिक जॉन मिल का यह अटूट मानना था कि समाज में हमेशा विचारों का एक पूरी तरह खुला बाजार होना चाहिए, जहां हर नागरिक को अपनी व्यक्तिगत राय और असहमति को पूरी आजादी के साथ व्यक्त करने का हक मिले, लेकिन आज के दौर के ये आधुनिक मीडिया सलाहकार बस दिन-रात सरकार की छवि चमकाने के लिए एक मनगढ़ंत कहानी और छद्म राष्ट्रवाद का ताना-बाना बुनने में लगे रहते हैं, मानो पूरे देश के मीडिया जगत को संभालना कोई पत्रकारिता न होकर महज़ एक ब्रांड का विज्ञापन या कोई पब्लिक रिलेशन (पीआर) का कॉर्पाेरेट काम हो।

आज के इस डिजिटल और आधुनिक युग में सेंसरशिप के पारंपरिक औजार पूरी तरह से बदल चुके हैं, जहां अब सीधे अखबार बंद करने की बजाय सोशल मीडिया के विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सरकार से अलग या विपरीत राय रखने वाले स्वतंत्र पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की बेहद संगठित, अश्लील और जहरीली ट्रोलिंग करवाई जाती है। इतना ही नहीं, विभिन्न सरकारी जांच एजेंसियों का मनमाना इस्तेमाल करके सरकार से असहमति जताने वाले निर्भीक पत्रकारों और राजनीतिक विरोधियों को मानसिक, आर्थिक और कानूनी रूप से बुरी तरह प्रताड़ित और परेशान किया जाता है। देश के आम नागरिकों के बुनियादी लोकतांत्रिक हक और अभिव्यक्ति की आजादी को धीरे-धीरे छीनने के लिए अक्सर श्राष्ट्रीय सुरक्षाश् का एक बड़ा हौवा खड़ा कर दिया जाता है और इसी कथित सुरक्षा का हवाला देकर हाल ही में आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) नियमों में ऐसे बड़े और विवादास्पद बदलाव किए गए हैं, ताकि सरकार इंटरनेट पर होने वाली नागरिकों की किसी भी कथित गैरकानूनी बातचीत और निजी संवाद तक अपनी सीधी पहुंच बना सके। इस गंभीर और चिंताजनक स्थिति को देखते हुए कु. कपूर आज के दौर के इन अहंकारी मीडिया मैनेजरों को एक अमूल्य और व्यावहारिक सलाह देती हैं कि उन्हें बीते दौर के उन बेहद कामयाब, दूरदर्शी और विनम्र सलाहकारों के जीवन से व्यावहारिकता, शालीनता और विनम्रता के गुण सीखने चाहिए, जिनमें जेपी माथुर, शारदा प्रसाद, बिजी वर्गीज, गोविंदाचार्य, अशोक टंडन, हरीश खरे और अरुण जेटली जैसे महान नाम शामिल हैं।
इन तमाम ऐतिहासिक और दिग्गज शख्सियतों ने अपने कार्यकाल के दौरान धुर विरोधी विचारधारा वाले पत्रकारों के साथ भी हमेशा एक स्वस्थ संवाद बनाए रखा, अलग राय और तीखी आलोचनाओं पर भी बहुत ही सौहार्दपूर्ण माहौल में बातचीत की, कभी भी खबरों के स्रोतों को प्रतिशोध की भावना से बंद नहीं किया और विपरीत राय होने पर भी हमेशा बेहद शाइस्ता, मर्यादित और लोकतांत्रिक ढंग से संवाद स्थापित किया, जिसके कारण ही उन्होंने तत्कालीन सरकारों के लिए बेहतर और सकारात्मक नतीजे हासिल किए थे, न कि आज के मैनेजरों की तरह विरोध की आवाज सुनते ही डराने-धमकाने या खबर के स्रोत काट देने का तानाशाही रवैया अपनाया था। भारत जैसे अत्यंत विशाल और सांस्कृतिक रूप से विविधता से भरे देश में अनादि काल से ही खुलकर बोलने, स्वस्थ बहस करने और अकाट्य तर्क-वितर्क करने की एक बहुत ही समृद्ध संस्कृति रही है, इसलिए देश के इस मूल स्वभाव और परम सत्य को ज्यादा समय तक सत्ता के बल पर दबाया नहीं जा सकता, खासकर सोशल मीडिया के इस आधुनिक और बेकाबू दौर में तो यह बिल्कुल भी मुमकिन नहीं है। कु. कपूर सवाल उठाती हैं कि जब इतिहास गवाह है, तो फिर आज का नेतृत्व वही भयंकर भूल दोबारा क्यों दोहराने पर आमादा है, जो ठीक पचास साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने अहंकार में आकर की थी, जिन्होंने यह गलत मान लिया था कि सत्ता की हनक और दमन के जरिए जनता के विरोध की आवाज को हमेशा के लिए कुचला जा सकता है।
देश के वर्तमान राजनीतिक हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए वह लिखती हैं कि आज खुद सत्ताधारी बीजेपी के भीतर भी आंतरिक लोकतंत्र और स्वतंत्र संवाद की भारी कमी साफ दिखाई देती है, जो बेहद परेशान करने वाली बात है। उनके मुताबिक, बीजेपी का सर्वाेच्च नीति-निर्धारक संसदीय बोर्ड अब बहुत ही कम बैठता है और जब कभी उसकी बैठक होती भी है, तो वह केवल कहीं और यानी शीर्ष स्तर पर पहले से ही लिए जा चुके फैसलों पर महज़ औपचारिक मुहर लगाने का काम करता है। बिना किसी व्यापक जमीनी और सांगठनिक प्रशासनिक तजुर्बे के अचानक से बिल्कुल जूनियर और नए नेताओं को राज्यों का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया जाता है, जो इस बात का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष प्रमाण है कि पार्टी के भीतर सामूहिक चर्चा और आंतरिक लोकतंत्र का स्तर किस कदर गिर चुका है। इससे भी ज्यादा गहरी चिंता की बात यह है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों और आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने वाली सर्वाेच्च संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, आजादी और उनकी ईमानदारी का ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है। उदाहरण के तौर पर, हाल ही में चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से अचानक नब्बे लाख से ज्यादा वोटरों के नाम हटा दिए, जिससे उस पूरी चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर एक बहुत बड़ा गंभीर और गहरा सवालिया निशान खड़ा हो गया, जिसमें राज्य की आम जनता साफ तौर पर ममता बनर्जी के शासन के खिलाफ खड़ी दिखाई दे रही थी।

लोकतंत्र को कमजोर करने वाली इस राजनीतिक गिरावट के दौर में अभी हाल ही में टीएमसी और शिवसेना यूपीटी के कुछ सांसदों ने जिस तरह से पाला बदला, उसने आम जनता के बीच इस नकारात्मक धारणा को और ज्यादा पक्का और पुख्ता कर दिया है कि आज के दौर में ज्यादातर राजनेताओं की वफादारी की एक तय कीमत होती है। कु. कपूर का साफ तौर पर मानना है कि एक सच्चे और मजबूत लोकतंत्र में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत केवल और केवल जनता के पवित्र और सीधे वोट से ही मिलना चाहिए, न कि चुनाव खत्म होने के बाद धनबल और बाहुबल के दम पर विपक्षी विधायकों और सांसदों को अनैतिक रूप से तोड़-मरोड़ कर। वर्तमान समय में केंद्र और राज्यों में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की जो एक बेहद बेरहम, आक्रामक और अलोकतांत्रिक मुहिम चलाई जा रही है, उसे देखकर इतिहास के पन्नों की वह खौफनाक यादें ताजा हो जाती हैं कि कैसे इंदिरा गांधी ने भी अपने भारी दो-तिहाई बहुमत के घमंड का इस्तेमाल करके देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को पंगु बना दिया था, अदालतों की अवमानना की थी और अंततः पूरे देश पर एक क्रूर आपातकाल थोप दिया था।
आज पूरा देश पच्चीस जून को देश में लगे उस ऐतिहासिक आपातकाल के पचास साल पूरे होने पर बहुत ही भारी मन से उस काले दौर की यातनाओं को याद कर रहा है, जहाँ वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के कई बड़े नेता और समर्थक इंदिरा गांधी के काल में हुई ज्यादतियों, जेलबंदी और प्रेस पर लगी पाबंदियों का मंचों से खूब बढ़-चढ़कर बखान करते हैं ताकि देश की आने वाली नई पीढ़ियां कभी भी उस दमनकारी रास्ते पर न चलें। परंतु इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी और कड़वी विडंबना यही है कि जिस आपातकाल की आज निंदा की जा रही है, उसके कई अलोकतांत्रिक तौर-तरीके आज खुद वर्तमान व्यवस्था द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से बार-बार दोहराए जा रहे हैं। आज विभिन्न अखबारी विज्ञापनों, होर्डिंग्स, कोल्ड ड्रिंक्स के कमर्शियल्स और बड़े-बड़े सार्वजनिक मंचों पर देश के मौजूदा शासकों की जो हद से ज्यादा और गैर-जरूरी चापलूसी की जाती है, वह हूबहू कांग्रेस के उसी चाटुकारिता से भरे काले कालखंड की याद दिलाती है, जब कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष ने चमचागिरी की सारी हदें पार करते हुए एक बेहद शर्मनाक और प्रसिद्ध नारा दिया था कि ष्इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिराष्। यहीं पर वरिष्ठ पत्रकार कु. कपूर देश की इस पूरी विचलित करने वाली स्थिति पर अपनी बेबाक बात समाप्त करती हैं, जो एक लंबे समय तक देश के प्रतिष्ठित अखबार इंडियन एक्सप्रेस के साथ जुड़ी रही हैं और जिनकी बातों में आज के इस बदलते दौर का एक कड़वा और नग्न सच साफ तौर पर झलकता है।





