उत्तराखण्ड। प्रदेश का करीब सत्तर फीसदी भूभाग को अपने हरे आंचल से ढकने वाले वन महकमे में इन दिनों पेड़ों की सरसराहट से ज्यादा पैसों के हिसाब-किताब की खलबली मची हुई है। देश-दुनिया को पर्यावरण का संदेश देने वाले इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील विभाग का अपना वित्तीय गणित पूरी तरह से गड़बड़ा चुका है, जिससे वनों के संरक्षण और विकास की राह में एक बड़ा प्रशासनिक गतिरोध खड़ा हो गया है। करोड़ों-अरबों रुपये के भारी-भरकम बजट को संभालने वाले इस महकमे के पास अब खर्चों का ब्योरा रखने और कर्मचारियों की तनख्वाह बनाने वाले जिम्मेदार कारिंदे ही नहीं बचे हैं। वित्तीय कुप्रबंधन का यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक उपेक्षा और हाल ही में जारी हुई एक अविवेकी तबादला सूची ने जलती आग में घी डालने का काम किया है। आलम यह है कि एक तरफ जंगलों को महफूज रखने के लिए नई-नई योजनाएं कागजों पर दम भर रही हैं, तो दूसरी तरफ उन योजनाओं के पैसों का लेखा-जोखा रखने वाला ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है।
इस पूरे संकट की जड़ें विभाग के भीतर खाली पड़े पदों के उस गहरे कुएं में छिपी हैं, जिसे भरने की जहमत शासन स्तर पर कभी गंभीरता से नहीं उठाई गई। सरकारी फाइलों और दस्तावेजों में तो वन प्रभागों के सुचारू संचालन के लिए बाकायदा वित्तीय विशेषज्ञों और लेखाकारों की मुकम्मल व्यवस्था की गई है, लेकिन धरातल पर यह सुनियोजित ढांचा सिर्फ सफेद हाथी साबित हो रहा है। उत्तराखंड के भीतर लगभग चालीस वन प्रभाग और अलग-अलग इकाइयां चौबीसों घंटे सक्रिय रहती हैं, जहां हर छोटे-बड़े खर्च के सत्यापन के लिए पदों का सृजन किया गया था। विडंबना देखिए कि विभाग को अपने वजूद के बाद से आज तक कभी भी स्वीकृत संख्या के मुताबिक वित्तीय कर्मचारी नसीब ही नहीं हो सके, जिसके चलते मौजूदा कर्मचारियों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता चला गया। कागजों पर सिमटी यह व्यवस्था अब अधिकारियों के लिए सिरदर्द बन चुकी है क्योंकि बिना वित्तीय रीढ़ के इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैले महकमे को पारदर्शी तरीके से चलाना नामुमकिन होता जा रहा है।

यदि हम विभागीय आंकड़ों की परतों को टटोलें तो चौंकाने वाली और डराने वाली हकीकत सामने आती है, जो यह बताने के लिए काफी है कि वन विभाग किस कदर बेबस हो चुका है। पूरे महकमे के भीतर लेखाकारों यानी अकाउंटेंट के कुल चौंतीस पद स्वीकृत हैं, जो कि विभाग की विशालता को देखते हुए पहले से ही ऊंट के मुंह में जीरे के समान थे। मगर सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन चौंतीस पदों में से इक्कीस पद लंबे समय से धूल फांक रहे हैं और महकमे में केवल तेरह धुरंधर ही वित्तीय मोर्चे पर अकेले डटे हुए हैं। यानी कि आधा से भी कम स्टाफ इस समय इतने बड़े महकमे की तिजोरी की रखवाली और उसके हिसाब-किताब को संभालने के लिए मजबूर है। जब आधे से ज्यादा सीटें खाली हों, तो किसी भी तंत्र का बैठ जाना लाजिमी है और यही वजह है कि वन विभाग के कई प्रभागों में वित्तीय फाइलें कछुए की रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं।
विभागीय अधिकारियों की नींद तो उस वक्त पूरी तरह उड़ गई जब निदेशालय विभागीय लेखा ने हाल ही में एक नई स्थानांतरण सूची जारी कर महकमे को और तगड़ा झटका दे दिया। इस नई प्रशासनिक फेरबदल की लिस्ट ने पहले से ही बदहाली के आंसू रो रहे वन विभाग की कमर पूरी तरह से तोड़कर रख दी है। इस सूची के तहत वन विभाग में तैनात नौ अनुभवी और मझे हुए लेखाकारों का तबादला कर उन्हें दूसरे विभागों या अन्य सुदूर स्थानों पर भेज दिया गया। इसके बदले में न्याय के सिद्धांत को ताक पर रखते हुए वन विभाग को केवल चार नए लेखाकार सौंपे गए, जिससे महकमे के खाते में सीधे तौर पर पांच कर्मचारियों का शुद्ध घाटा दर्ज हो गया। इस अजीबोगरीब और बेमेल तबादला नीति ने वन विभाग के भीतर चल रहे वित्तीय संकट को और ज्यादा गहरा तथा गंभीर बना दिया है, जिससे अब उबरना आसान नहीं लग रहा।

अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि प्रदेश के जंगलों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए आने वाली करोड़ों रुपये की भारी-भरकम धनराशि का हिसाब आखिरकार कौन रखेगा। राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए वन महकमे को 131.68 करोड़ रुपये का भारी बजटीय आवंटन किया है, इसके साथ ही वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार की तरफ से कैंपा योजना के अंतर्गत 253 करोड़ रुपये की मोटी रकम भी महकमे को हासिल हुई है। इन दोनों विशाल राशियों को मिला दिया जाए तो यह कुल आंकड़ा 384.68 करोड़ रुपये के पार पहुंच जाता है, जो कि किसी भी विभाग के लिए एक बहुत बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी है। इतनी विशालकाय पूंजी, विकास कार्यों, ठेकेदारों के भुगतानों और रोजमर्रा के अभियानों में खर्च होनी है, लेकिन जब मुख्य वित्तीय सिपाही ही गायब हों, तो इस महाबजट के सदुपयोग और उसकी शुचिता पर सवालिया निशान लगना बिल्कुल लाजिमी है।
इस घोर संकट के बीच अगर वन विभाग की सांसें थोड़ी बहुत चल रही हैं, तो उसका पूरा श्रेय विभाग के निचले पायदान पर काम करने वाले सहायक लेखाकारों यानी असिस्टेंट अकाउंटेंट्स को जाता है। यह जूनियर कर्मचारी इस समय अपनी क्षमता से कई गुना ज्यादा काम करते हुए किसी तरह महकमे की डूबती नैया को पार लगाने में दिन-रात एक किए हुए हैं। मुख्य मुख्यालय से लेकर दूर-दराज के जंगलों में स्थित वन प्रभागों तक, बजट का खाका तैयार करने से लेकर बिलों को पास कराने की पूरी जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर टिकी हुई है। कर्मचारियों की तनख्वाह का वक्त पर भुगतान करना, रिटायर्ड कर्मियों की पेंशन के कागजात तैयार करना और रोजमर्रा के भत्तों का मिलान करना, यह सब काम फिलहाल इन्हीं सहायक लेखाकारों के भरोसे घिसट रहा है, जो खुद भारी मानसिक दबाव के साए में काम कर रहे हैं।

निदेशालय विभागीय लेखा द्वारा जारी की गई इस विवादित स्थानांतरण सूची की बारीकियों को देखें तो पता चलता है कि कुल पैंतालीस लेखाकारों के कार्यक्षेत्र में बदलाव किया गया है। इस सूची में तबादला कानून की अलग-अलग धाराओं का हवाला देते हुए बड़े पैमाने पर फेरबदल किया गया, जिसमें धारा-7 के अंतर्गत सुगम क्षेत्रों से दुर्गम क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से अट्ठाईस कर्मियों को भेजा गया है। वहीं कुछ कर्मचारियों की व्यक्तिगत समस्याओं को ध्यान में रखते हुए धारा-13 के तहत अनुरोध के आधार पर नौ लोगों के तबादले किए गए। इसी क्रम में धारा-10 का उपयोग करते हुए दुर्गम से सुगम क्षेत्रों में छह लोगों की घर वापसी कराई गई और धारा-15 के तहत दो अन्य स्थानांतरण अमली जामे में लाए गए। इस पैंतालीस लोगों की लंबी-चौड़ी सूची ने पूरे प्रदेश के प्रशासनिक हलके में हलचल मचा दी है, जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा अकेले वन विभाग को भुगतना पड़ रहा है।
इस पूरी स्थानांतरण प्रक्रिया का सबसे घातक और नकारात्मक प्रहार वन विभाग की उन रीढ़ की हड्डी मानी जाने वाली इकाइयों पर हुआ है, जो राजस्व और संरक्षण के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। जिन प्रमुख और वीआईपी वन प्रभागों से अनुभवी लेखाकारों को बिना किसी ठोस विकल्प के हटा दिया गया, उनमें पिथौरागढ़ वन प्रभाग, चकराता वन प्रभाग और राज्य की राजधानी से सटा देहरादून वन प्रभाग शामिल हैं। इसके अलावा तराई केंद्रीय वन प्रभाग रुद्रपुर, विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व कार्यालय, रामनगर वन प्रभाग और तराई पूर्वी वन प्रभाग जैसे बड़े कमाऊ और व्यस्त दफ्तरों से भी अकाउंटेंट्स की विदाई कर दी गई है। यहां तक कि प्रमुख वन संरक्षक परियोजना कार्यालय और पर्यटकों से गुलजार रहने वाले मसूरी वन प्रभाग को भी नहीं बख्शा गया, जिससे इन सभी महत्वपूर्ण जगहों पर वित्तीय कामकाज ठप होने के कगार पर पहुंच गया है।
इस भयावह स्थिति और भविष्य में आने वाले प्रशासनिक भूचाल से वन विभाग के आला अधिकारी भली-भांति वाकिफ हैं और उन्होंने इस पर अपनी गंभीर चिंता जतानी शुरू कर दी है। महकमे के भीतर बढ़ते इस संकट को देखते हुए वन विभाग की ओर से निदेशालय विभागीय लेखा को एक बेहद कड़ा और चेतावनी भरा आधिकारिक पत्र प्रेषित किया गया है। इस पत्राचार के माध्यम से विभाग ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया है कि पहले से ही स्टाफ की कमी से जूझ रहे महकमे के लिए यह नए तबादले किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। विभाग ने दो टूक कहा है कि अगर इन महत्वपूर्ण प्रभागों में तुरंत नए और योग्य लेखाकारों की तैनाती नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन पूरी तरह ठप हो जाएगा।
इस पूरे मामले पर अपनी बात रखते हुए वन विभाग के सीसीएफ एचआरडी पीके पात्रो ने बेहद संजीदगी और चिंता के साथ बताया कि विभाग ने शासन स्तर पर अपनी मांगों को पुरजोर तरीके से रखा है। पीके पात्रो ने कहा कि रिक्त पड़े पदों की वजह से जमीनी स्तर पर काम प्रभावित हो रहा है और ऑडिट से लेकर दैनिक भुगतानों में देरी हो रही है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने उम्मीद जताई कि निदेशालय उनकी इस जायज मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए जल्द से जल्द आवश्यक संख्या में लेखाकारों की फौज वन विभाग को उपलब्ध कराएगा ताकि वित्तीय संकट को टाला जा सके। पीके पात्रो के मुताबिक, यदि समय रहते इस रिक्तता को नहीं भरा गया तो भविष्य में महकमे को गंभीर प्रशासनिक और कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है।
अधिकारियों के साथ-साथ अब कर्मचारियों के संगठनों ने भी इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलना शुरू कर दिया है और मैदानी से लेकर पहाड़ी इलाकों तक आक्रोश पनप रहा है। इस संबंध में वन दारोगा संगठन के प्रदेश अध्यक्ष स्वरूप चंद रमोला ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अकाउंटेंट की इस भारी कमी ने पूरे वन क्षेत्र के कामकाज को पंगु बना दिया है। स्वरूप चंद रमोला ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि एक तरफ सरकार वनों की सुरक्षा की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ उसके वित्तीय तंत्र को खोखला किया जा रहा है। संगठन के मुखिया ने पुरजोर मांग की है कि शासन और संबंधित उत्तरदायी विभाग बिना किसी देरी के इन खाली पड़े इक्कीस पदों पर स्थायी नियुक्तियां करे, अन्यथा कर्मचारी संगठन सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होगा।
वास्तव में, उत्तराखंड की हरी-भरी वादियों और बहुमूल्य वन्यजीवों की सुरक्षा करने वाला यह विशाल महकमा आज अपने ही भीतर पनपे एक अजीब किस्म के वित्तीय संकट से लहूलुहान हो रहा है। 384 करोड़ रुपये से अधिक के विशाल सालाना बजट को संभालने के लिए सिर्फ तेरह लेखाकारों का होना किसी मज़ाक से कम नहीं है, जो यह दर्शाता है कि नीतियां बनाने वाले जमीनी हकीकत से कितने दूर हैं। यह समस्या अब सिर्फ फाइलों के इधर-उधर खिसकने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर उत्तराखंड के पर्यावरण, इको-टूरिज्म और जंगलों के विकास से जुड़ी योजनाओं की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान बन चुकी है। अब देखना यह होगा कि गहरी नींद में सोया हुआ शासन और संबंधित लेखा विभाग इस गंभीर समस्या का समाधान कितनी फुर्ती से करता है, या फिर वन विभाग इसी तरह बिना गणितज्ञों के अपने बिगड़ते गणित को सुधारने की नाकाम कोशिश करता रहेगा।





