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उत्तराखंड में सफाई कर्मियों का बिगुल सरकार को 24 जून तक अल्टीमेटम जारी

पांच साल पुराने समझौते पर अमल न होने से भड़का कर्मचारियों का गुस्सा, काली पट्टी बांधकर सड़कों पर उतरे सफाईकर्मी। पुरानी पेंशन, नियमितीकरण और ठेका प्रथा खत्म करने की मांग को लेकर सरकार के खिलाफ तेज हुआ संघर्ष।

काशीपुर। उत्तराखण्ड के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों संविदा और सफाई कर्मचारियों के आक्रोश की गूंज साफ तौर पर सुनाई दे रही है, जिसने स्थानीय प्रशासन से लेकर प्रदेश सरकार तक की नींद हराम कर दी है। देवभूमि उत्तराखण्ड सफाई कर्मचारी संघ, शाखा काशीपुर के बैनर तले कर्मचारियों ने अपनी लंबित और जायज मांगों को लेकर आर-पार की जंग का पूरी तरह से ऐलान कर दिया है। सरकार द्वारा लगातार की जा रही अनदेखी से नाराज होकर काशीपुर में आज यानी 22 जून 2026 से कर्मचारियों का “काली पट्टी बांधकर प्रदर्शन” बेहद आक्रामक रूप से शुरू हो चुका है, जिसने शहर की सफाई व्यवस्था और सरकारी दावों पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। आंदोलनकारियों ने साफ कर दिया है कि यह विरोध केवल एक सांकेतिक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उस गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति है जो पिछले कई वर्षों से शासन के झूठे आश्वासनों के कारण कर्मचारियों के दिलों में सुलग रहा था।

कर्मचारियों के इस ऐतिहासिक और उग्र होते विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि को देखा जाए तो पता चलता है कि प्रदेश सरकार की वादाखिलाफी ही इस पूरे फसाद की असली जड़ है। दरअसल, साल 2021 की 27 जुलाई को शासन और कर्मचारी संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच एक लिखित समझौता हुआ था, जिसे लागू करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से सूबे की सरकार की थी। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इस महत्वपूर्ण समझौते को बीते लगभग पांच साल होने जा रहे हैं और सरकार ने आज तक इस दिशा में एक कदम भी आगे बढ़ाना मुनासिब नहीं समझा। प्रदेश संगठन के कड़े और स्पष्ट आह्वान पर काशीपुर शाखा ने आज से अपने पूर्व निर्धारित आंदोलन के अत्यंत महत्वपूर्ण द्वितीय चरण का औपचारिक आगाज कर दिया है, जिसके तहत शहर के तमाम हिस्सों में काम करने वाले सफाई कर्मियों ने विरोध स्वरूप अपने शरीर पर काली पट्टियां बांधकर व्यवस्था के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है।

इस बड़े और व्यापक स्तर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन की क्रोनोलॉजी को समझें तो पता चलता है कि यह गुस्सा रातों-रात नहीं फूटा है, बल्कि इसके पीछे एक तय रणनीति और निरंतर प्रयास शामिल हैं। इससे पहले इसी सिलसिले में बीती 20 जून को सफाई कर्मचारियों द्वारा एक प्रथम सांकेतिक धरने का आयोजन किया गया था, जिसका मकसद केवल सरकार को नींद से जगाना और सचेत करना था। लेकिन उस चेतावनी के बावजूद जब शासन और प्रशासन के स्तर से कोई ठोस कदम या सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई, तो कर्मचारियों का सब्र का बांध पूरी तरह से टूट गया। यही वजह रही कि आन्दोलन के इस द्वितीय चरण के क्रम में समूचे मौहल्ला स्वच्छता समिति के अध्यक्ष अमित टांक के कुशल और मजबूत नेतृत्व में आज भारी संख्या में कर्मचारियों ने काम करते हुए भी अपनी नाराजगी दर्ज कराई और दफ्तरों व सड़कों पर धरना प्रदर्शन का एक लंबा दौर शुरू कर दिया।

सफाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इन ग्राउंड वर्कर्स की अगुवाई कर रहे मौहल्ला स्वच्छता समिति के अध्यक्ष अमित टांक ने इस आंदोलन की गंभीरता को रेखांकित करते हुए सरकार को बेहद तीखे शब्दों में आड़े हाथों लिया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज 22 जून से काशीपुर का हर एक सफाई कर्मी अपनी बांह पर काली पट्टी बांधकर पूरी मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी पर आया है ताकि जनता को किसी तरह की असुविधा न हो। लेकिन इसके साथ ही हम काम करते हुए भी बहरी सरकार को यह कड़ा संदेश देना चाहते हैं कि उन्हें पांच साल पहले किए गए अपने तमाम वादे हर हाल में याद रखने होंगे। अमित टांक ने बेहद मुखर अंदाज में अपनी मुख्य मांगों को दोहराते हुए कहा कि पुरानी पेंशन योजना को तुरंत प्रभाव से बहाल किया जाए, मानव श्रम का शोषण करने वाली ठेका प्रथा को पूरी तरह से बंद किया जाए और लंबे समय से सेवाएं दे रहे संविदा कर्मियों को अविलंब नियमित किया जाए।

आंदोलन की इस धधकती आग के बीच संगठन के प्रशासनिक ढांचे ने भी सरकार के सामने बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपना लिया है, जिससे आने वाले दिनों में टकराव और बढ़ने के आसार नजर आ रहे हैं। शाखा अध्यक्ष सुमित सौदा ने सरकार को अंतिम चेतावनी देते हुए साफ लहजे में कह दिया है कि यदि आगामी 24 जून तक प्रदेश सरकार ने कर्मचारी संघ के साथ वार्ता के लिए कोई ठोस पहल नहीं की या बातचीत का रास्ता साफ नहीं किया, तो इस आंदोलन को और भी ज्यादा उग्र व देशव्यापी रूप दिया जाएगा। सुमित सौदा के मुताबिक, सरकार उनकी खामोशी को उनकी कमजोरी समझने की भूल कतई न करे क्योंकि अब पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर 24 जून की समय सीमा के भीतर सरकार का कोई सकारात्मक रुख सामने नहीं आता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और स्थानीय प्रशासन की होगी।

काशीपुर के नगर निगम परिसर और विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित इस विशाल धरना प्रदर्शन में न केवल संगठन के पदाधिकारी बल्कि आम कर्मचारी भी अपनी पूरी ताकत के साथ डटे हुए नजर आए। इस ऐतिहासिक एकजुटता को बल देने के लिए शाखा अध्यक्ष सुमित सौदा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष संजय कुमार और उपाध्यक्ष रिंकू कुमार ने अग्रिम पंक्ति में रहकर कमान संभाली। इनके साथ ही संगठन के सक्रिय सदस्यों और प्रमुख नेताओं में बृजेश, नानक, विकास, सुमित, अमित, मोनू, दीपक, संजय, रजत, संदीप जैसी युवा ऊर्जा भी इस पूरे घटनाक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती दिखी। इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी और खास बात यह रही कि इसमें केवल पुरुष कर्मचारी ही नहीं, बल्कि कविता, अनीता, मुन्नी सहित भारी संख्या में महिला सफाई कर्मचारी भी अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को छोड़कर इस हक की लड़ाई में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नारे लगाती हुई दिखाई दीं।

आज आंदोलन के पहले ही दिन काशीपुर के सभी प्रशासनिक वार्डों में जो नजारा देखने को मिला, उसने सत्ता में बैठे नीति-नियंताओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं क्योंकि विरोध की यह गूंज पूरे शहर में फैल चुकी है। सुबह से ही शहर के कोने-कोने में तैनात महिला और पुरुष सफाई कर्मियों ने अपनी बांहों और सिर पर काली पट्टियां बांध रखी थीं और वे काम करने के साथ-साथ जगह-जगह गुट बनाकर सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी कर रहे थे। पूरे काशीपुर शहर के माहौल में इस वक्त केवल कुछ ही नारे गूंज रहे हैं, जिनमें “वादा निभाओ – वरना कुर्सी खाली करो” और “पुरानी पेंशन योजना बहाल करो” जैसे तीखे नारे शामिल हैं। कर्मचारियों का यह साफ और स्पष्ट संदेश है कि जो सरकार अपने कर्मचारियों को उनका हक और सामाजिक सुरक्षा नहीं दे सकती, उसे सत्ता के शीर्ष पर बने रहने का भी कोई नैतिक और राजनीतिक अधिकार नहीं रह जाता है।

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