रामनगर(सुनील कोठारी)।उत्तराखंड के भीतर चल रही सियासी हलचलों और सरकारी खजाने पर बढ़ते अतिरिक्त बोझ को लेकर इन दिनों गलियारों में एक बेहद गंभीर और तीखी बहस छिड़ गई है। हिमालयी राज्य के नीतिगत फैसलों पर पैनी नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रदेश की मौजूदा हुकूमत अब सौ से भी अधिक विशिष्ट चेहरों को लाल बत्ती यानी दर्जा प्राप्त मंत्रियों की कतार में खड़ा करने की पूरी तैयारी कर चुकी है। इन विशेष दर्जा प्राप्त राजनेताओं की फौज तैयार होने से सीधे तौर पर प्रदेश के आम करदाताओं और मेहनत की कमाई जमा करने वाली जनता की जेब पर एक बहुत बड़ा डाका पड़ने जा रहा है, क्योंकि इनका आलीशान खर्च चलाने के लिए जनता के टैक्स का गाढ़ा पैसा पानी की तरह बहाया जाएगा। सबसे बड़ा और सुलगता हुआ यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या वाकई में उत्तराखंड जैसे बेहद सीमित संसाधनों, विषम भौगोलिक परिस्थितियों और छोटे वार्षिक बजट वाले राज्य को मंत्रियों जैसा ठाठ-बाठ भोगने वाले इन सौ से अधिक मठाधीशों और दायित्वधारियों की रत्ती भर भी आवश्यकता है। जनमानस में यह चर्चा आम हो चली है कि विकास कार्यों के लिए हमेशा धन का रोना रोने वाली सरकारें आखिर किस मजबूरी के तहत अपने चहेते नेताओं की इस विशाल फौज पर करोड़ों रुपये लुटाने को आमादा हो जाती हैं।
इस पूरे राजनीतिक खेल की जमीनी हकीकत और कानूनी बारीकियों को समझना हर नागरिक के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि ये तथाकथित माननीय किसी संवैधानिक प्रक्रिया के तहत चुनकर नहीं आते हैं। हमारे देश के संविधान में इस तरह के दर्जा प्राप्ति या दायित्वधारी मंत्रियों का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख या वैधानिक ढांचा मौजूद नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक विलासिता का जरिया मात्र है। ये लोग न तो जनता के वोटों के जरिए कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनाव जीतकर सदन में पहुँचते हैं और न ही इन्हें राजभवन में राज्यपाल के सम्मुख कैबिनेट मंत्री या राज्यमंत्री की तरह देश के संविधान के प्रति निष्ठा और गोपनीयता की कोई आधिकारिक शपथ दिलाई जाती है। यह दर्जाधारी व्यवस्था केवल एक ऐसा कृत्रिम स्टेटस या राजनीतिक तमगा है, जिसे सत्तारूढ़ सरकार बिना किसी जवाबदेही के अपनी व्यक्तिगत और राजनीतिक मर्जी के अनुसार किसी भी मनपसंद व्यक्ति या संगठन के कार्यकर्ता को खैरात के रूप में बांट सकती है। शासन व्यवस्था के भीतर बने अलग-अलग आयोगों, सरकारी बोर्डों, विकास निगमों और विभिन्न समितियों में सैकड़ों की संख्या में मलाईदार पद रिक्त पड़े रहते हैं, जिनकी बागडोर प्रशासनिक अधिकारियों के बजाय इन बैकडोर से एंट्री पाने वाले राजनेताओं को सौंप दी जाती है। इस जिम्मेदारी के मिलते ही इन नेताओं को रातों-रात सरकारी रसूख, भारी-भरकम लाव-लश्कर, चमचमाती गाड़ियाँ और सुरक्षाकर्मियों का एक बड़ा घेरा मुफ्त में मिल जाता है, जो उनके रसूख को आसमान पर पहुँचा देता है।
अगर हम इस पूरी व्यवस्था के ऐतिहासिक पन्नों को पलटें और इसके सफर को देखें, तो अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से ही इसके पीछे की कड़वी राजनीतिक सच्चाई सामने आने लगती है। उत्तर प्रदेश के शासनकाल के दौरान वहां के तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्षों को सीधे तौर पर राज्य मंत्री का विशिष्ट दर्जा देने की एक लंबी परंपरा चल रही थी, लेकिन बाद में इस व्यवस्था के भारी दुरुपयोग और खजाने पर बढ़ते दबाव को देखते हुए इसे पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था। इस रोक के पीछे सबसे बड़ा तार्किक और व्यावहारिक कारण यह सामने आया था कि अगर सूबे में भारतीय जनता पार्टी या किसी अन्य दल की सरकार सत्ता में है, तो वह केवल अपने ही कैडर के लोगों और पार्टी के वफादारों को इन पदों पर बिठाती है। यानी इस पूरी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य जनता की सेवा करना नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को उपकृत करना और विपक्ष के लोगों को पूरी तरह से हाशिए पर धकेलना होता है। लेकिन साल दो हज़ार में जब उत्तर प्रदेश से अलग होकर एक नए पर्वतीय राज्य के रूप में उत्तराखंड अस्तित्व में आया, तो यहाँ की सरकारों ने जनहित की प्राथमिकताओं को दरकिनार करते हुए फिर से वही पुरानी जिला पंचायत अध्यक्षों को राज्यमंत्री का दर्जा देने की खर्चीली प्रथा दोबारा बहाल कर दी। आज प्रबुद्ध नागरिकों और विश्लेषकों की मानें तो यह सिर्फ एक ऐसा घिनौना तरीका बन चुका है जिसके जरिए सरकारें अपने रूठे हुए और असंतुष्ट नेताओं को चुप कराने के लिए जनता के पैसे की रिश्वत देती हैं।

राजनीतिक गलियारों की कड़वी सच्चाई यह भी उजागर करती है कि इस प्रकार के रेवड़ी नुमा पदों का इस्तेमाल चुनाव के समय टिकट न मिलने से बगावत पर उतरे नेताओं को शांत करने के लिए एक अचूक हथियार के रूप में किया जाता है। जब मुख्यधारा के चुनावों में कई दावेदारों के टिकट कट जाते हैं और वे पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलने या भीतरघात करने की धमकी देने लगते हैं, तो उन्हें सरकार बनने पर लाल बत्ती का झुनझुना थमाने का गुप्त आश्वासन दे दिया जाता है। इस रणनीति के सहारे सत्ता में बैठी पार्टियां कहीं न कहीं अपना राजनीतिक विस्तार करती हैं और विभिन्न जातियों, क्षेत्रों तथा गुटों के समीकरणों को साधने का एक अनैतिक गणितीय संतुलन बिठाने का प्रयास करती हैं। लेकिन इस पूरे सियासी मैनेजमेंट की सबसे घिनौनी बात यह है कि इस राजनीतिक विस्तार की पूरी की पूरी भारी-भरकम कीमत उत्तराखंड की मासूम जनता के खून-पसीने की कमाई और राज्य के सीमित बजट को चुकानी पड़ती है। सरकार अपने चहेतों, करीबियों और पार्टी के चाटुकारों को कैसी-कैसी आलीशान और वीआईपी सुविधाएं सरकारी खजाने के बलबूते मुहैया कराती है, इसका पूरा ब्यौरा देखकर किसी भी आम नागरिक की आंखें फटी की फटी रह जाएंगी।
इन विशेष दर्जा प्राप्त माननीय राजनेताओं को मिलने वाली सुख-सुविधाओं और भत्तों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त पर यदि गौर किया जाए तो यह किसी भी आम नागरिक को झकझोर कर रख देगी। सबसे पहले तो इन तमाम दर्जाधारियों को बिना किसी खास काम के सीधे तौर पर पैंतालीस हज़ार रुपये की मोटी मासिक सैलरी या मानदेय सीधे उनके खातों में ट्रांसफर किया जाता है। इसके बाद यदि ये माननीय नेता सरकार द्वारा आवंटित की गई वीआईपी गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें अलग से चालीस हजार रुपये की अतिरिक्त राशि दी जाती है। वहीं दूसरी तरफ, यदि वे सरकारी गाड़ी के बजाय अपनी निजी गाड़ी का आधिकारिक उपयोग करना चुनते हैं, तो सरकार उन्हें अस्सी हजार रुपये प्रति महीना सिर्फ गाड़ी और ईंधन के रखरखाव के नाम पर सीधे भुगतान करती है। इतना ही नहीं, ठाठ-बाठ का यह सिलसिला यहीं पर खत्म नहीं होता है; अगर इन दर्जाधारी मंत्रियों को राजधानी या कार्यक्षेत्र में कोई सरकारी बंगला या आलीशान ऑफिस आवंटित नहीं हो पाता है, तो उन्हें रहने और दफ्तर चलाने के लिए पचास हज़ार रुपये की भारी-भरकम राशि अलग से हर महीने थमा दी जाती है। और यदि संयोग से उन्हें इन दोनों सुविधाओं में से कोई एक चीज यानी सिर्फ दफ्तर या सिर्फ घर मिल पाता है, तो दूसरे मद के नाम पर भी दस से पंद्रह हज़ार रुपये का अतिरिक्त भत्ता उनके खाते में नियमित रूप से डाल दिया जाता है।
इन तमाम वीआईपी खर्चों के अलावा इनके दैनिक और प्रशासनिक खर्चों का जो बोझ जनता पर पड़ता है, उसका हिसाब-किताब भी पूरी तरह से होश उड़ाने वाला और हैरान करने वाला है। इन माननीयों के फोन के बिल और मोबाइल खर्चों को वहन करने के लिए हर महीने दो हज़ार रुपये अलग से दिए जाते हैं, जबकि उनके दफ्तर के निजी स्टाफ का वेतन चुकाने के लिए पंद्रह हज़ार रुपये महीना सरकारी खजाने से निकलता है। उनके घर और दफ्तर के छोटे-मोटे काम करने वाले फोर्थ क्लास कर्मचारी यानी चतुर्थ श्रेणी के सहायकों को वेतन देने के लिए भी बारह हज़ार रुपये की राशि हर महीने आवंटित की जाती है। इन सब सुविधाओं के साथ-साथ जब ये दर्जाधारी नेता देश या राज्य के भीतर कहीं भी भ्रमण पर निकलते हैं, तो उनके लिए रेलवे की प्रथम श्रेणी और हवाई यात्राओं के दौरान अति विशिष्ट श्रेणी के विशेष इंतजामात और ठहरने के लिए आलीशान सरकारी गेस्ट हाउस पूरी तरह मुफ्त आरक्षित किए जाते हैं। इन्हीं सब फिजूलखर्चियों को लेकर उत्तराखंड की जागरूक जनता और सामाजिक संगठनों द्वारा वक्त-वक्त पर सरकार की नीयत पर बेहद कड़े और सुलगते हुए सवाल उठाए जाते रहे हैं। लोग खुलेआम पूछ रहे हैं कि जनता के खून-पसीने के टैक्स के पैसों को इस तरह पानी की तरह बहाना और अपने निजी राजनीतिक लोगों को खुश करने के लिए खुलेआम लुटाना आखिर कहाँ तक न्यायसंगत माना जा सकता है। क्या उत्तराखंड जैसे बेहद कर्जदार, छोटे और सीमित बजट वाले राज्य को सचमुच इतने बड़े पैमाने पर दर्जाधारियों की फौज पालने की कोई वास्तविक जरूरत है, या फिर यह सब सिर्फ सत्ता की कुर्सी बचाने और अपना सियासी गणित बिठाने के लिए जनता की गाढ़ी कमाई का खुला खिलवाड़ किया जा रहा है





