spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडकेदारनाथ लीद प्रबंधन पर महासंग्राम मुफ्त सेवा छोड़ नई संस्था को डेढ़...

केदारनाथ लीद प्रबंधन पर महासंग्राम मुफ्त सेवा छोड़ नई संस्था को डेढ़ करोड़ का गुपचुप प्रोजेक्ट

बिना नोटिस पतंजलि का अनुबंध रद्द होने से भड़का कानूनी विवाद विभागीय मंत्री सौरभ बहुगुणा फैसले से पूरी तरह अनभिज्ञ पावन बाबा केदारनाथ धाम के यात्रा मार्ग की स्वच्छता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल

रुद्रप्रयाग(सुनील कोठारी)।उत्तराखंड की पावन और जगप्रसिद्ध केदारनाथ यात्रा इन दिनों भक्ति भाव के साथ-साथ एक ऐसे बड़े प्रशासनिक और राजनैतिक घमासान के केंद्र में आ गई है, जिसने शासन से लेकर सचिवालय तक हड़कंप मचा दिया है। देवभूमि के इस सुप्रसिद्ध धाम में चल रही इस उठापटक के पीछे कोई आपदा या बुनियादी सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि यात्रा मार्ग को साफ-सुथरा रखने के लिए होने वाला पशु अपशिष्ट निस्तारण यानी लीद प्रबंधन का एक ऐसा अनोखा विवाद है, जिसने करोड़ों रुपये के हेरफेर और पारदर्शिता पर गंभीर उंगलियां उठा दी हैं। पूरा विवाद इस बात को लेकर गरमाया हुआ है कि जिस बेहद खर्चीले और मुश्किल काम को योगगुरु बाबा रामदेव की विख्यात पतंजलि संस्था बिना एक भी सरकारी पैसा लिए बिल्कुल मुफ्त सेवा के रूप में अंजाम दे रही थी, उसे अचानक बीच मझधार में रोककर एक भारी-भरकम बजट वाले प्रोजेक्ट में क्यों तब्दील कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन और उत्तराखंड के संबंधित विभागों की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है, क्योंकि जब सरकारी खजाने पर बिना कोई बोझ डाले काम बेहतरीन ढंग से चल रहा था, तो अचानक ऐसा क्या हुआ कि शासन को एक नई संस्था को डेढ़ करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट सौंपने की जरूरत महसूस होने लगी।

इस पूरे बवाल की गहराई को समझने के लिए हमें केदारनाथ यात्रा मार्ग की उस भौगोलिक और व्यावहारिक चुनौती को समझना होगा, जो हर साल लाखों श्रद्धालुओं के सामने एक बड़ी मुसीबत बनकर खड़ी होती है। हिमालय की दुर्गम वादियों में बसे केदारनाथ धाम की पैदल चढ़ाई के दौरान यात्रियों की सुविधा के लिए हर साल चार से छह हजार घोड़ों और खच्चरों का संचालन किया जाता है, जो तीर्थयात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाते हैं। लेकिन इन हजारों बेजुबान पशुओं के माध्यम से यात्रा मार्ग पर हर रोज टन के हिसाब से निकलने वाली लीद पूरे पैदल रास्ते को बेहद बदबूदार, गंदगी से भरा और खतरनाक रूप से फिसलन भरा बना देती है, जिससे श्रद्धालुओं का पैदल चलना दूभर हो जाता है। सबसे खतरनाक बात यह है कि पहाड़ों पर होने वाली लगातार बारिश के कारण यह समूचा पशु अपशिष्ट बहकर सीधे नीचे बहने वाली अति पवित्र मंदाकिनी नदी में जाकर मिल जाता है, जिससे इस पावन जलधारा के प्रदूषित होने का बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाता है और स्थानीय पर्यावरण को भी अपूरणीय क्षति पहुंचती है।

पर्यावरण को हो रहे इसी भारी नुकसान और मंदाकिनी नदी की पवित्रता को खतरे में देखते हुए देश की सर्वाेच्च पर्यावरण अदालत यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पूर्व में उत्तराखंड सरकार और राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कड़ी फटकार लगाई थी। एनजीटी ने साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि अगर इस दुर्गम और संवेदनशील क्षेत्र में पशु अपशिष्ट का वैज्ञानिक और उचित तरीके से प्रबंधन नहीं किया गया, तो यह न केवल जलीय जीवों के अस्तित्व को मिटा देगा, बल्कि इस वैश्विक धरोहर की गरिमा को भी पूरी तरह नष्ट कर देगा। इसी न्यायिक दबाव और पर्यावरण को बचाने की छटपटाहट के बीच वर्ष 2024 में उत्तराखंड के पशुपालन विभाग ने एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए पतंजलि संस्थान के साथ एक विशेष समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे, ताकि इस लाइलाज बन चुकी समस्या का कोई स्थाई और प्रभावी समाधान निकाला जा सके।

इस समझौते के तहत पतंजलि संस्था ने केदारनाथ के अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण वातावरण में अपने स्वयं के वित्तीय संसाधनों, आधुनिक मशीनों और समर्पित कर्मचारियों को काम पर लगाया था। सबसे हैरान करने वाली और उल्लेखनीय बात यह थी कि इस बेहद खर्चीले और श्रमसाध्य अभियान को चलाने के लिए पतंजलि सरकार से किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता या अनुदान नहीं ले रही थी, यानी सरकारी खजाने से इसके लिए एक भी रुपया खर्च नहीं किया जा रहा था। पतंजलि का आधिकारिक दावा है कि उन्होंने इस पुनीत कार्य को पूरी निष्ठा से निभाते हुए अब तक अपनी जेब से 40 लाख रुपये से अधिक की बड़ी धनराशि इस पूरे लीद प्रबंधन इंफ्रास्ट्रक्चर को खड़ा करने और उसे सुचारू रूप से चलाने में लगा दी थी, जिससे यात्रा मार्ग पर स्वच्छता दिखने लगी थी और मंदाकिनी नदी में जाने वाला कचरा भी काफी हद तक रुक गया था।

लेकिन यह सुचारू रूप से चल रही व्यवस्था अचानक उस समय विवादों के हिचकोले खाने लगी, जब चालू वर्ष 2026 के अप्रैल महीने में पशुपालन विभाग ने बिना किसी ठोस वजह के अचानक पतंजलि के साथ हुए इस अनुबंध को पूरी तरह से निरस्त करने का एकतरफा फरमान जारी कर दिया। विभाग के इस अचानक लिए गए फैसले से न केवल पतंजलि प्रबंधन बल्कि पूरी केदारघाटी के लोग और तीर्थयात्री भी सन्न रह गए, क्योंकि अनुबंध रद्द करने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को पूरी तरह से हवा में उड़ा दिया गया था। पतंजलि ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए सीधे आरोप लगाया है कि उन्हें इस निलंबन की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई, न ही उनका पक्ष सुनने की जहमत उठाई गई और तो और, अनुबंध की मूल शर्तों में लिखे नियमों के मुताबिक दिया जाने वाला 90 दिनों का अनिवार्य नोटिस पीरियड भी उन्हें नहीं दिया गया, जिससे साफ पता चलता है कि परदे के पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है।

इस पूरे विवाद में एक और बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब अंदरूनी सूत्रों से यह खबर लीक हुई कि पतंजलि का अनुबंध तो अप्रैल 2026 में खत्म किया गया, लेकिन उसके विकल्प के तौर पर किसी दूसरी संस्था को लाने की गुप्त प्रशासनिक प्रक्रिया फरवरी 2026 में ही गुपचुप तरीके से शुरू कर दी गई थी। अब पर्यटन विभाग द्वारा ‘हिमालय इंस्टीट्यूट फॉर इनवायरमेंट इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट’ नामक एक गैर-सरकारी संस्था को इस कार्य के लिए एक नया पायलट प्रोजेक्ट सौंपने की पूरी पटकथा तैयार कर ली गई है। सचिवालय के गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इस नई संस्था को केदारनाथ मार्ग पर लीद प्रबंधन का यही काम सौंपने के एवज में सरकारी खजाने से लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की भारी-भरकम धनराशि का भुगतान करने की योजना बनाई जा रही है, जिसने अब एक बहुत बड़े वित्तीय घोटाले और भाई-भतीजावाद के अंदेशे को जन्म दे दिया है।

यही वह बिंदु है जहां से शासन और प्रशासन की नीयत पर सबसे तीखे और गंभीर सवाल उठने शुरू हो गए हैं, जिसने उत्तराखंड की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है। देवभूमि की प्रबुद्ध जनता और बुद्धिजीवी वर्ग अब सीधे मुख्यमंत्री और सरकार से यह यक्ष प्रश्न पूछ रहे हैं कि जब एक नामी और साधन-संपन्न संस्था इसी काम को बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी सरकारी पैसे के मुफ्त में जनसेवा के रूप में कर रही थी, तो फिर अचानक जनता की गाढ़ी कमाई के डेढ़ करोड़ रुपये एक निजी संस्था पर लुटाने की क्या मजबूरी आन पड़ी? क्या पूर्व में पतंजलि द्वारा की जा रही व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हो चुकी थी, और अगर ऐसा था तो विभाग के पास उसकी विफलता की कोई आधिकारिक जांच या मूल्यांकन रिपोर्ट कहां है, जिसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए था, और अगर वह व्यवस्था पूरी तरह सफल थी तो उसे हटाने के पीछे किसका निजी स्वार्थ छिपा है?

इस पूरे प्रशासनिक ताने-बाने और मनमानी से बेहद आहत और आक्रोशित होकर पतंजलि संस्थान ने अब चुप बैठने के बजाय आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और उन्होंने रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन सहित पशुपालन विभाग को एक कड़ा कानूनी नोटिस थमा दिया है। इस विधिक नोटिस में पतंजलि ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकारी अधिकारियों ने अनुबंध की शर्तों का सरेआम उल्लंघन किया है और बिना किसी सुनवाई या सुधार का मौका दिए उनके साथ हुए करार को रद्द करना पूरी तरह से गैर-कानूनी और तानाशाही पूर्ण रवैया है। पतंजलि ने सरकार को साफ शब्दों में चेतावनी भरे संकेत दे दिए हैं कि अगर उनके साथ हुए इस अनुबंध को तुरंत सम्मानपूर्वक बहाल नहीं किया गया, तो वह इस पूरे मामले को देश की सर्वाेच्च अदालत तक ले जाएंगे और जिम्मेदार अधिकारियों को बेनकाब करेंगे।

यह पूरा घटनाक्रम उस समय हास्यास्पद और बेहद गंभीर बन गया जब उत्तराखंड के पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा ने इस पूरे मामले पर मीडिया के सामने आकर अपनी ही सरकार और अधिकारियों को संकट में डाल दिया। कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा ने कैमरे के सामने बेहद सादगी से यह बयान दे डाला कि उन्हें इस पूरे मामले और पतंजलि का अनुबंध रद्द किए जाने की विभागीय स्तर पर कोई जानकारी ही नहीं है और वह खुद इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। मंत्री का यह गैर-जिम्मेदाराना बयान अपने आप में सचिवालय के भीतर चल रही अफसरशाही की मनमानी की पोल खोलता है कि कैसे इतने बड़े धार्मिक और संवेदनशील मुद्दे पर विभाग के सर्वाेच्च राजनैतिक मुखिया को भनक तक नहीं लगने दी गई, या फिर क्या मंत्री जी खुद को इस संभावित घोटाले की आंच से बचाने के लिए अब जांच की आड़ लेकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

केदारनाथ धाम केवल एक भौगोलिक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह देश-विदेश के करोड़ों सनातनी हिंदुओं की अगाध श्रद्धा, अटूट आस्था और भावनाओं का एक ऐसा पवित्र केंद्र है जहां लोग अपना सर्वस्व न्यौछावर करने आते हैं। ऐसे पावन तीर्थ क्षेत्र में अगर लीद प्रबंधन जैसी बुनियादी और बेहद संवेदनशील व्यवस्थाओं को लेकर इस तरह की अपारदर्शिता, गुटबाजी और करोड़ों रुपये के खेल की बू आएगी, तो सरकार के जीरो टॉलरेंस के दावों पर सवाल उठना बिल्कुल लाजिमी और स्वाभाविक है। यह पूरा मामला अब महज दो संस्थाओं के बीच का आपसी व्यावसायिक विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह देवभूमि की प्रशासनिक पारदर्शिता, हिमालय के नाजुक पर्यावरण की सुरक्षा और जनता के टैक्स के पैसों के खुलेआम दुरुपयोग से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है।

अब सबकी निगाहें और उम्मीदें इस बात पर टिकी हुई हैं कि डैमेज कंट्रोल में जुटी राज्य सरकार और मुख्यमंत्री इस पूरे मामले में क्या कड़ा रुख अपनाते हैं और क्या वाकई इस मामले की कोई उच्च स्तरीय जांच होती है। अगर इस पूरे प्रकरण की किसी स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाती है, तो निश्चित रूप से कई ऐसे चौंकाने वाले और सनसनीखेज तथ्य सामने आ सकते हैं जो कई बड़े अधिकारियों और सफेदपोशों की कुर्सी हिला देंगे। केदारनाथ धाम की अलौकिक पवित्रता केवल मुख्य मंदिर के गर्भगृह तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां तक जाने वाला पूरा यात्रा मार्ग, वहां का पर्यावरण और वहां की प्रशासनिक व्यवस्था की शुचिता भी बाबा केदार की गरिमा का एक अभिन्न हिस्सा हैं, और अगर आस्था के नाम पर होने वाले कार्यों में ही भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता के बादल मडराएंगे, तो उनके जवाब भी उतनी ही सख्ती और ईमानदारी से सामने आने ही चाहिए।

संबंधित ख़बरें
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!