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कांग्रेस जिलाध्यक्ष अलका पाल ने प्रधानमंत्री की ‘त्याग वाली अपील’ को बताया सरकार की विफलता का प्रमाण

आर्थिक बदहाली छिपाने के लिए जनता पर थोपे जा रहे त्याग और कटौती के फैसलों के खिलाफ मुखर हुईं अलका पाल, सरकारी दावों की पोल खोलते हुए ऐतिहासिक संकटों से की वर्तमान नाजुक स्थितियों की तुलना।

देश की वर्तमान आर्थिक दशा को लेकर छिड़ी सियासी जंग अब उस मोड़ पर आ पहुंची है जहां विपक्ष सीधे तौर पर केंद्र सरकार की मंशा और देश की वित्तीय सेहत पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर रहा है। कांग्रेस की जिला अध्यक्ष अलका पाल ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा देशवासियों से की गई ‘सोना न खरीदने’ और ‘पेट्रोल-डीजल की बचत करने’ वाली अपील पर तीखा प्रहार करते हुए इसे एक गुप्त ‘इकोनॉमिक इमरजेंसी’ का संकेत करार दिया है। अलका पाल ने दोटूक शब्दों में कहा कि चुनावों के शोर और सुनहरे वादों के दिन अब हवा हो चुके हैं और जैसे ही सरकार ने हकीकत की जमीन पर अपने पांव रखे, उसे समझ आ गया कि स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो रही हैं। उनके अनुसार, यह बेहद चिंताजनक है कि जो सरकार कल तक ‘विश्वगुरु’ और सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दंभ भर रही थी, वह आज जनता से एक साल तक विदेश यात्रा न करने और खाने के तेल तक में कटौती करने की याचना कर रही है।

प्रधानमंत्री की इस अपील के पीछे छिपे आर्थिक संकट की परतें उधेड़ते हुए अलका पाल ने कहा कि भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर पर गोते लगा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान संतुलन पूरी तरह चरमरा गया है। सरकार जो भी सामान दुनिया के अन्य मुल्कों से आयात करती है, उसका भुगतान डॉलर में करना होता है, और रुपये की कमजोरी ने इस खर्चे को इतना बढ़ा दिया है कि अब खजाना खाली होने के संकेत मिल रहे हैं। अलका पाल का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह कहना कि ‘तेल का खर्च कम करें और सोना न खरीदें’, दरअसल इस बात की स्वीकारोक्ति है कि विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इन कड़वे तथ्यों को चुनावों तक बड़ी चालाकी से जनता से छिपा कर रखा, लेकिन अब जब स्थिति नाजुक हो चुकी है, तो राष्ट्रहित का वास्ता देकर अपनी प्रशासनिक विफलताओं का बोझ एक झटके में फिर से देश की आम जनता के कंधों पर डाल दिया गया है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का हवाला देते हुए कांग्रेस नेता अलका पाल ने मौजूदा सरकार की तुलना देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल से की और बताया कि पहले की अपीलों के पीछे हमेशा एक स्पष्ट और वाजिब राष्ट्रीय कारण हुआ करता था जिसे जनता को ईमानदारी से बताया जाता था। उन्होंने याद दिलाया कि 1965 में जब लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों से ‘सोमवार का व्रत’ रखने की अपील की थी और ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था, तब देश न केवल पाकिस्तान के साथ युद्ध लड़ रहा था, बल्कि भीषण अकाल और अमेरिका की गेहूं आपूर्ति रोकने वाली धमकी का भी सामना कर रहा था। उस समय प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने आवास के लॉन में हल चलाकर जनता को प्रेरित किया था क्योंकि उद्देश्य खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करना था। अलका पाल के अनुसार, शास्त्री जी ने संकट को छिपाया नहीं बल्कि देश को भागीदार बनाया, जबकि वर्तमान सरकार केवल भावनात्मक अपील के पीछे अपनी आर्थिक नाकामी को ढंकने का प्रयास कर रही है।

इसी क्रम में अलका पाल ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदरा गाँधी के दौर का जिक्र करते हुए कहा कि 1970 के दशक में जब वैश्विक तेल संकट और 1971 के युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा था, तब इंदरा गाँधी ने जनता से सादगी अपनाने और ‘स्वर्ण बॉन्ड’ के माध्यम से सोना सरकार को देने का आह्वान किया था। उस समय विदेशी मुद्रा बचाने का उद्देश्य पारदर्शी था और देश के सामने मौजूद चुनौतियों को स्पष्ट रूप से साझा किया गया था। ठीक इसी तरह 1991 के भुगतान संतुलन संकट के दौरान पीवीनरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री मनामोहन सिंह ने देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आने पर जनता को वास्तविक हालात बताए थे और कठोर आर्थिक सुधारों के लिए तैयार किया था। अलका पाल ने सवाल उठाया कि आज जब कोई प्रत्यक्ष युद्ध या वैश्विक अकाल जैसी स्थिति नहीं है, तो फिर प्रधानमंत्री को अचानक जनता के व्यक्तिगत खर्चों और परंपराओं पर अंकुश लगाने की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है।

कांग्रेस जिलाध्यक्ष अलका पाल ने केंद्र सरकार पर विज्ञापनों और भव्य आयोजनों में हजारों करोड़ रुपये बर्बाद करने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जब अपनी फिजूलखर्ची के कारण सरकारी खजाना खाली होने लगा है, तो अब मध्यम वर्ग को बचत और त्याग का पाठ पढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश का युवा आज बेरोजगारी से बेहाल है, किसान अपनी लागत निकालने के लिए संघर्ष कर रहा है और महिलाएं रसोई के बजट के कारण मानसिक तनाव में हैं, ऐसे में सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले भारी टैक्स को कम करने के बजाय जनता को कम उपभोग की सलाह देना जले पर नमक छिड़कने जैसा है। अलका पाल ने जोर देकर कहा कि अगर सरकार वास्तव में आर्थिक स्थिति को लेकर चिंतित है, तो उसे सबसे पहले अपनी ब्रांडिंग पर होने वाले खर्च को रोकना चाहिए और कच्चे तेल की गिरती अंतरराष्ट्रीय कीमतों का लाभ आम आदमी को देना चाहिए ताकि बाजार में तरलता और मांग बनी रहे।

अलका पाल ने आगाह किया कि प्रधानमंत्री की इस तरह की अपीलों से बाजार में डर का माहौल पैदा हो रहा है, जिससे निवेश और व्यापार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। जब शीर्ष नेतृत्व सोना न खरीदने या खर्च घटाने की बात करता है, तो आम नागरिक के मन में यह आशंका घर कर जाती है कि क्या भविष्य में 1991 जैसा संकट या उससे भी बदतर हालात आने वाले हैं। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया में सोने और पेट्रोलियम का सबसे बड़ा आयातक है, और अगर आयात बिल को नियंत्रित करने के लिए जनता के अधिकारों पर कटौती की जा रही है, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। अलका पाल ने प्रधानमंत्री से मांग की कि वे राष्ट्र के नाम श्वेत पत्र जारी कर देश की जीडीपी, राजकोषीय घाटा और विदेशी मुद्रा भंडार की असलियत को सामने रखें, ताकि जनता जान सके कि जिस आत्मनिर्भरता का दावा किया जा रहा था, वह हकीकत में कितनी खोखली साबित हुई है।

इस पूरे प्रकरण को अलका पाल ने सरकार की आर्थिक अदूरदर्शिता का परिणाम बताते हुए कहा कि चुनाव जीतने के लिए जनता को मुफ्त योजनाओं और सुनहरे ख्वाबों में उलझाकर रखा गया, लेकिन बुनियादी ढांचे और उत्पादन क्षेत्र की उपेक्षा की गई। अब जब वैश्विक स्तर पर उर्वरक, अनाज और ईंधन की किल्लत मंडरा रही है, तो सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं बची है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेगी और जनता के बीच जाकर सरकार के इस ‘आर्थिक धोखे’ का पर्दाफाश करेगी। अलका पाल के अनुसार, प्रधानमंत्री की लापरवाही और केवल इवेंट मैनेजमेंट पर केंद्रित राजनीति ने आज देश की आर्थिक रीढ़ को कमजोर कर दिया है, और अब स्थिति इतनी संवेदनशील है कि अगर समय रहते कठोर और ईमानदार सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो भारत एक बड़े वित्तीय भंवर में फंस सकता है जिसकी पूरी जिम्मेदारी वर्तमान सत्ता की होगी।

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