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उत्तराखंड के वन ग्रामों को राजस्व ग्राम बनाने हेतु धना तिवारी और मातृशक्ति का प्रचंड रणघोष

नई बस्ती पूछड़ी और कालू सिद्ध के वनाधिकारों की निर्णायक जंग में बसंती आर्य की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ जनमंच और लोक मंच के दिग्गजों ने भरी हुंकार अब राजस्व ग्राम का हक मिलकर रहेगा।

रामनगर। उत्तराखंड की शांत वादियों के बीच वनाधिकारों की एक ऐसी चिंगारी सुलग रही है, जिसने अब एक विशाल आंदोलन का रूप ले लिया है और इसी कड़ी में वनाधिकार समिति की सक्रियता ने शासन-प्रशासन की रातों की नींद हराम कर दी है। रामनगर के सीमावर्ती इलाकों में स्थित वन ग्रामों को उनका वाजिब हक दिलाने की दिशा में एक बहुत बड़ी और निर्णायक हलचल तब देखने को मिली जब ग्राम स्तरीय वनाधिकार समिति नई बस्ती पूछड़ी की कमान संभाल रहीं धना तिवारी और ऊर्जावान सचिव अंजलि रावत ने अन्य प्रमुख पदाधिकारियों के साथ मिलकर अपनी रणनीति को धार दी। इस उच्च स्तरीय मुलाक़ात के दौरान नई बस्ती पूछड़ी समिति के वरिष्ठ सदस्य बालादत्त भी अपनी पूरी टीम के साथ मौजूद रहे, जिनका मुख्य ध्येय केवल और केवल अपने पुश्तैनी गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाना है। इस संघर्ष में केवल एक गांव नहीं बल्कि कालू सिद्ध की वनाधिकार समिति के सचिव सत्या पटवाल ने भी अपनी एकजुटता दिखाई है, जो यह स्पष्ट करता है कि अब यह लड़ाई व्यक्तिगत न रहकर एक सामुदायिक महासंग्राम बन चुकी है। इस महत्वपूर्ण बैठक का माहौल उस समय और भी अधिक गंभीर हो गया जब इसमें महिला एकता मंच की प्रखर आवाज बनकर उभरीं सरस्वती जोशी और भगवती आर्य ने शिरकत की और महिलाओं के अधिकारों पर जोर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि क्षेत्र के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनैतिक दिग्गजों ने भी इस मुद्दे पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, ताकि कोई भी कानूनी अड़चन ग्रामीणों के रास्ते का रोड़ा न बन सके। उत्तराखंड जनमंच के जुझारू नेता महेंद्र आर्य और समाजवादी लोक मंच के प्रखर वक्ता मुनीष कुमार की उपस्थिति ने इस पूरे मामले को एक नई राजनीतिक और सामाजिक ऊंचाई प्रदान की है, जिससे प्रशासन पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इन सभी दिग्गजों ने एक सुर में बीडीसी सदस्य बसंती आर्य के साथ गहन मंत्रणा की और उन्हें जमीनी हकीकत से रूबरू करवाते हुए यह बताया कि किस प्रकार पीढ़ियों से वनों में बसने वाले लोग आज भी अपने ही घर में बेगाने बने हुए हैं। वनाधिकार कानून 2006 के तहत मिलने वाले लाभों को लेकर जिस तरह की जागरूकता इन समितियों ने दिखाई है, वह काबिले तारीफ है क्योंकि यह लड़ाई अब केवल कागजों तक सीमित नहीं है बल्कि यह अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। बैठक में शामिल हर शख्स के चेहरे पर एक ही संकल्प था कि जब तक राजस्व ग्राम का दर्जा प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे।

समिति के पदाधिकारियों ने बीडीसी सदस्य बसंती आर्य को पूरे तथ्यों और घटनाक्रम से अवगत कराते हुए विस्तार से जानकारी दी कि किस प्रकार वन ग्राम कालू सिद्ध और नई बस्ती पूछड़ी की ग्राम स्तरीय समितियों ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए बीते 25 अप्रैल को अपने दावों की फाइल तैयार की थी। इन समितियों ने उपखंड स्तरीय समिति के समक्ष वनाधिकार कानून 2006 की जटिल धाराओं के अंतर्गत राजस्व ग्राम बनाने का विधिवत दावा न केवल प्रस्तुत किया है, बल्कि उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य और प्राचीन दस्तावेजों का अंबार भी लगा दिया है। सचिव अंजलि रावत और सत्या पटवाल ने यह स्पष्ट किया कि उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों में उन सभी साक्ष्यों को शामिल किया गया है जो यह प्रमाणित करते हैं कि ये ग्रामीण दशकों से इन वनों का संरक्षण कर रहे हैं और यही उनकी कर्मभूमि है। अब पूरी गेंद खंड स्तरीय समिति के पाले में है, जिसे इन दावों का निष्पक्ष और त्वरित परीक्षण करना है ताकि फाइल को बिना किसी विलंब के जिला स्तरीय समिति के पास अंतिम संस्तुति के लिए भेजा जा सके। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी हजारों परिवारों के भविष्य को अधर में लटका सकती है, इसलिए अब हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जा रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू यह है कि खंड स्तरीय समिति में जिन 5 अन्य सदस्यों का चयन किया गया है, उनमें बसंती आर्य खुद एक महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हैं, जो इस पूरी प्रक्रिया की एक मजबूत कड़ी साबित हो सकती हैं। वनाधिकार समिति की अध्यक्ष धना तिवारी और सदस्य बालादत्त ने उन्हें याद दिलाया कि उनके कंधों पर न केवल इन दावों के परीक्षण की जिम्मेदारी है, बल्कि उन हजारों ग्रामीणों की उम्मीदों का बोझ भी है जो न्याय की आस में बैठे हैं। बसंती आर्य की भूमिका इस मायने में बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वह स्वयं उस जमीनी संघर्ष को जानती हैं और खंड स्तरीय समिति के भीतर उनकी आवाज एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है। समिति के सदस्यों ने जोर देकर कहा कि दावों के परीक्षण के दौरान किसी भी तकनीकी त्रुटि को हावी नहीं होने दिया जाना चाहिए और मानवीय दृष्टिकोण के साथ-साथ कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना उनका प्राथमिक कर्तव्य है। महेंद्र आर्य और मुनीष कुमार ने भी इस बात का समर्थन किया कि जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी सक्रियता ही इस जटिल फाइल को सचिवालय और कलेक्ट्रेट की धूल फांकने से बचा सकती है और इसे जल्द से जल्द जिला स्तरीय समिति तक पहुंचा सकती है।

मुलाकात के इस दौर में सरस्वती जोशी और भगवती आर्य ने महिला सशक्तिकरण का उदाहरण पेश करते हुए यह मांग रखी कि वनाधिकारों के वितरण में महिलाओं की हिस्सेदारी और उनकी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए क्योंकि वन क्षेत्रों में सबसे अधिक संघर्ष महिलाओं को ही करना पड़ता है। उन्होंने बसंती आर्य से आग्रह किया कि वह समिति के भीतर एक प्रहरी की तरह काम करें ताकि कोई भी पात्र परिवार इस अधिकार से वंचित न रह जाए और राजस्व ग्राम बनने का सपना हकीकत में तब्दील हो सके। वातावरण में एक अजीब सी बेचैनी और उत्साह का मिश्रण देखा गया, क्योंकि दशकों बाद ऐसा लग रहा है कि कानून और संघर्ष का तालमेल सही दिशा में बैठ रहा है। वनाधिकार कानून 2006 की बारीकियों को लेकर जिस तरह से धना तिवारी और उनकी टीम ने तैयारी की है, उसने विपक्षी खेमों और उदासीन अधिकारियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह मात्र एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के पुनर्वास और सम्मान की बहाली का मार्ग है जिन्होंने हमेशा वनों को अपना घर माना है। अब सबकी निगाहें खंड स्तरीय समिति की अगली बैठक पर टिकी हैं, जहां बसंती आर्य की सक्रियता यह तय करेगी कि नई बस्ती पूछड़ी और कालू सिद्ध का भाग्य किस ओर मुड़ेगा।

इस पूरे आंदोलन को धार देने में मुनीष कुमार और महेंद्र आर्य जैसे अनुभवी चेहरों ने जो रणनीति तैयार की है, उसने ग्रामीणों के भीतर एक नया विश्वास पैदा कर दिया है कि इस बार उनका दावा खाली नहीं जाएगा। उन्होंने साफ कहा कि यदि खंड स्तरीय समिति ने दावों के परीक्षण में किसी भी तरह की हीला-हवाली की, तो इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और आंदोलन को और उग्र किया जाएगा। बैठक के अंत में सभी पदाधिकारियों ने एकजुट होकर संकल्प लिया कि वे प्रशासन की हर चाल पर नजर रखेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि 25 अप्रैल को जो बीज बोया गया था, वह राजस्व ग्राम के फल के रूप में ग्रामीणों को प्राप्त हो। अंजलि रावत और सत्या पटवाल ने अंत में यह दोहराया कि उनके पास मौजूद साक्ष्य अकाट्य हैं और किसी भी स्तर पर होने वाली जांच में वे पूरी तरह से खरे उतरेंगे। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इन दावों पर कितनी संवेदनशीलता दिखाता है, लेकिन फिलहाल रामनगर के इन वन ग्रामों में उम्मीदों की एक नई किरण जगमगा रही है जिसका नेतृत्व धना तिवारी और उनके साथी पूरी मुस्तैदी के साथ कर रहे हैं। इस ऐतिहासिक पहल ने निश्चित रूप से क्षेत्र की राजनीति और सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव लाने के संकेत दे दिए हैं।

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