हरिद्वार। धर्म और अध्यात्म की वैश्विक राजधानी में इन दिनों आस्था के सबसे बड़े प्रतीक माँ गंगा की अविरलता और निर्मलता पर एक ऐसा काला धब्बा लगा है, जिसने न केवल श्रद्धालुओं के हृदय को छलनी कर दिया है, बल्कि प्रशासनिक दावों की पोल भी खोल कर रख दी है। करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र मानी जाने वाली पतित पावनी गंगा की लहरों में जिस पवित्रता को खोजने दुनिया भर से लाखों लोग खिंचे चले आते हैं, आज उसी धारा में व्यवस्थाओं का जहर घोला जा रहा है। हरिद्वार के सबसे व्यस्ततम क्षेत्रों में शुमार पंडित दीनदयाल उपाध्याय पार्किंग के समीप जो दृश्य सामने आया है, उसने मानवता और स्वच्छता के नाम पर चल रहे ढोंग को बेनकाब कर दिया है। यहाँ स्थित एक सुलभ शौचालय से निकलने वाली सीवर की गंदगी और मानव अपशिष्ट सीधे तौर पर बिना किसी उपचार के पवित्र गंगा जल में समाहित हो रहे हैं। यह स्थिति उस तीर्थ नगरी की है जहाँ हर कंकड़ में शंकर देखा जाता है और जहाँ गंगा को माँ मानकर पूजा जाता है, लेकिन व्यवस्था की अनदेखी ने आज इसी माँ की गोद को मैला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
विडंबना का विषय यह है कि जिस सुलभ शौचालय को स्वच्छता अभियान के एक स्तंभ के रूप में स्थापित किया गया था, वही आज प्रदूषण का सबसे बड़ा मुहाना बन चुका है। पार्किंग क्षेत्र में बने इस शौचालय के टैंक से रिसता हुआ गंदा पानी और सीवेज का रिसाव खुलेआम गंगा की मुख्य धारा को दूषित कर रहा है, जिससे आसपास के वातावरण में असहनीय दुर्गंध फैली हुई है। केवल तकनीकी खामी ही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का अभाव भी यहाँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, क्योंकि इसी संवेदनशील क्षेत्र में अनेक लोग खुले में शौच करते हुए पाए गए हैं। गंगा किनारे रहने वाले कुछ स्थानीय लोग और यहाँ आने वाले बेपरवाह तत्वों द्वारा खुले में किए जा रहे इस कृत्य ने आस्था की नगरी को शर्मसार कर दिया है। स्वच्छता के ऊंचे-ऊंचे नारों के बीच गंगा के साथ हो रहा यह विश्वासघात न केवल पर्यावरण प्रेमियों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि यह उन करोड़ों भक्तों की भावनाओं पर भी एक सीधा और गहरा आघात है जो गंगा जल को चरणामृत मानकर ग्रहण करते हैं।
कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह पूरा घटनाक्रम राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT के सख्त आदेशों और दिशा-निर्देशों की सरेआम धज्जियां उड़ाने जैसा है। एनजीटी ने पूर्व में कई बार स्पष्ट किया है कि गंगा की धारा में किसी भी प्रकार का गंदा पानी या सीवर डालना दंडनीय अपराध है और इसके लिए भारी आर्थिक जुर्माने के साथ-साथ कठोर कारावास तक की व्यवस्था की गई है। इसके बावजूद, हरिद्वार के हृदय स्थल पर इस प्रकार की लापरवाही का बने रहना यह दर्शाता है कि संबंधित विभागों के लिए कानून की किताबें केवल दफ्तरों की शोभा बढ़ाने तक ही सीमित रह गई हैं। सवाल यह उठता है कि जब नियम इतने सख्त और स्पष्ट हैं, तो फिर इस सुलभ शौचालय के संचालकों और इस क्षेत्र की निगरानी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या प्रशासन किसी बड़ी महामारी या जन-आक्रोश का इंतजार कर रहा है, या फिर भ्रष्टाचार की परतों के नीचे गंगा की पुकार को जानबूझकर अनसुना किया जा रहा है?

वर्तमान समय में यह स्थिति और भी अधिक भयावह और चिंताजनक इसलिए हो जाती है क्योंकि आगामी वर्ष हरिद्वार में कुंभ जैसे विशाल और भव्य मेले का आयोजन होना सुनिश्चित हुआ है। कुंभ से ठीक पहले अगले माह से ही विश्व प्रसिद्ध चार धाम यात्रा का भी विधिवत शुभारंभ होने जा रहा है, जिसमें देश-विदेश के कोने-कोने से श्रद्धालु ऋषिकेश और हरिद्वार के मार्ग से होकर हिमालय की चोटियों पर स्थित धामों की ओर प्रस्थान करेंगे। यदि यात्रा और कुंभ के मुख्य पड़ाव पर ही गंगा का जल इस कदर जहरीला और प्रदूषित बना रहेगा, तो क्या सरकार यह उम्मीद करती है कि श्रद्धालु इसी दूषित और सीवर युक्त पानी में डुबकी लगाकर अपनी आध्यात्मिक यात्रा को सफल मानेंगे? यह केवल एक स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि और सनातन संस्कृति के गौरव से जुड़ा हुआ बेहद संवेदनशील मामला है। यदि समय रहते इस प्रदूषणकारी मुहाने को बंद नहीं किया गया, तो आगामी धार्मिक आयोजनों की शुचिता पर उठने वाले सवालों का जवाब देना प्रशासन के लिए असंभव हो जाएगा।
सबसे बड़ा और कड़वा सवाल शासन और प्रशासन की उस रहस्यमयी चुप्पी पर खड़ा होता है, जिसने इस पूरे मामले को जानते हुए भी अपनी आंखें मूंद रखी हैं। वे विभाग जिनकी प्राथमिक जिम्मेदारी गंगा की स्वच्छता को बनाए रखना और सीवरेज सिस्टम की निगरानी करना है, वे आखिर क्यों इस गंभीर लापरवाही पर मौन धारण किए हुए हैं? क्या नगर निगम, जल संस्थान और गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के अधिकारी केवल वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर फाइलों के अंबार तक ही अपनी कर्तव्यश्री को सीमित मान चुके हैं? जमीन पर उतरकर वास्तविकता का निरीक्षण करने और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने की हिम्मत आखिर किस फाइल में दबी हुई है? गंगा के नाम पर अरबों रुपये का बजट ठिकाने लगा देने वाली एजेंसियां क्या एक सुलभ शौचालय के टैंक को ठीक करने या खुले में शौच करने वालों को रोकने में खुद को इतना असहाय महसूस कर रही हैं? यह प्रशासनिक विफलता उस भरोसे को तोड़ रही है जो जनता ने व्यवस्था पर किया था।

अब हरिद्वार के स्थानीय निवासियों, पुरोहित समाज और दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं की उम्मीदें पूरी तरह से जिलाधिकारी मयूर दीक्षित के सख्त रुख पर टिकी हुई हैं। लोग इस आस में हैं कि नवागत जिलाधिकारी इस रिपोर्ट का तत्काल संज्ञान लेंगे और अपनी प्रशासनिक कुशलता का परिचय देते हुए उन जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे जिन्होंने गंगा को प्रदूषित होने के लिए अकेला छोड़ दिया है। क्या मयूर दीक्षित इस गंभीर मामले की उच्च स्तरीय जांच कराकर इस गंदे खेल को बंद करवाएंगे या फिर व्यवस्था का यह सड़ांध भरा तंत्र इसी तरह गंगा की पावन धारा को अपनी गंदगी से भरता रहेगा? हरिद्वार की जनता अब कोरे आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है, उसे धरातल पर ठोस कार्रवाई और गंगा किनारे पसरी इस गंदगी से पूर्ण मुक्ति चाहिए। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन की प्राथमिकता में गंगा की मर्यादा है या फिर उन रसूखदारों को बचाना जो इस प्रदूषण के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी हैं।
अंततः यह कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि हरिद्वार में गंगा की रक्षा के लिए कागजों पर तो योजनाओं, नियमों और समितियों की भरमार है, लेकिन धरातल पर पालन के नाम पर केवल शून्य ही नजर आता है। नमामि गंगे जैसे वृहद अभियानों के दौर में भी अगर पंडित दीनदयाल उपाध्याय पार्किंग जैसे प्रमुख स्थानों पर सीवर का पानी सीधे गंगा में गिर रहा है, तो यह हम सभी के लिए एक सामूहिक हार है। आज जरूरत केवल नई घोषणाओं या बड़े बजटों की नहीं है, बल्कि उन कठोर फैसलों की है जो मिसाल पेश कर सकें। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और दोषियों को कानून का असली खौफ नहीं दिखाया जाएगा, तब तक गंगा की अविरल और निर्मल धारा को बचा पाना महज एक सपना ही बना रहेगा। अब समय आ गया है कि धर्मनगरी के मान-सम्मान को बचाने के लिए शासन अपने कुंभकर्णी नींद से जागे और आस्था के इस केंद्र को प्रदूषण के इस कलंक से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति दिलाए।





