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हक़ की ललकार उत्तराखंड के इंजीनियरों का महासंग्राम और प्रदेश के विकास पर लगा अनिश्चितकालीन ब्रेक

काशीपुर। देवभूमि उत्तराखंड के प्रशासनिक और विकासपरक इतिहास में आज का दिन एक अभूतपूर्व गतिरोध के रूप में दर्ज हो गया है। राज्य की प्रगति के असली सारथी कहे जाने वाले डिप्लोमा इंजीनियरों ने अपनी अस्मिता, आत्मसम्मान और लंबे समय से लंबित जायज हक के लिए अब कलम बंद कर सड़कों पर उतरने का निर्णायक फैसला ले लिया है। उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर महासंघ के बैनर तले प्रदेश के हजारों तकनीकी अधिकारियों ने सोमवार की सुबह से अनिश्चितकालीन हड़ताल का विधिवत शंखनाद कर दिया है। इस घोषणा के साथ ही लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी), सिंचाई विभाग, और ऊर्जा जैसे प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे वाले महकमों में सन्नाटा पसर गया है। महासंघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों का यह कड़ा और समझौताविहीन रुख शासन की उस सुस्त कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है, जिसमें महीनों से चल रहे पत्राचार, अनुनय-विनय और शांतिपूर्ण अनुरोधों की फाइलों को सचिवालय के ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। इंजीनियरों के चेहरों पर साफ दिखाई दे रहा यह प्रचण्ड आक्रोश इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब लोकतंत्र में संवाद के सारे सभ्य रास्ते सत्ता की चौखट पर बंद कर दिए जाते हैं, तो आंदोलन ही वह अंतिम शस्त्र बचता है जिसका उपयोग कर्मचारी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए करते हैं। आज सिंचाई खण्ड, काशीपुर के विशाल प्रांगण में जिस प्रकार विभिन्न विभागों के इंजीनियरों का सैलाब उमड़ा, उसने शासन को यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अब यह लड़ाई केवल एक मांग की नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तराखंड के तकनीकी संवर्ग के अस्तित्व और उनके भविष्य को सुरक्षित करने की एक आर-पार की जंग बन चुकी है।

आंदोलन की सघनता, इसकी सोची-समझी रणनीति और अब तक के घटनाक्रम पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए महासंघ के स्थानीय शाखा अध्यक्ष राजेश ने अत्यंत भावुक लेकिन तार्किक ढंग से मीडिया के समक्ष पूरी स्थिति का विश्लेषण रखा। उन्होंने आंकड़ों और तारीखों के साथ तथ्यों को स्पष्ट करते हुए बताया कि यह हड़ताल किसी क्षणिक आवेश या जल्दबाजी का नतीजा कतई नहीं है, बल्कि यह शासन की निरंतर वादाखिलाफी और टालमटोल की नीति से उपजा एक अनिवार्य विद्रोह है। राजेश के अनुसार, महासंघ ने एक जिम्मेदार संगठन होने के नाते अत्यंत धैर्य का परिचय दिया था। उन्होंने बताया कि प्रथम चरण के अंतर्गत दो फरवरी से लेकर 23 फरवरी तक पूरे प्रदेश में काली पट्टी बांधकर और कार्यस्थलों पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किए गए थे। इसका मुख्य उद्देश्य शासन को आगाह करना और उन्हें अपनी गलतियों को सुधारने के लिए पर्याप्त समय देना था। विडंबना यह रही कि शासन की उच्च नौकरशाही ने इस शांतिपूर्ण विरोध को इंजीनियरों की सहनशीलता की जगह उनकी कमजोरी समझने की ऐतिहासिक भूल कर दी। जब शासन स्तर पर कोई हरकत नहीं हुई, तो 25 फरवरी को महासंघ की उच्चाधिकार समिति की एक आपातकालीन बैठक बुलानी पड़ी, जिसमें सर्वसम्मति से यह संकल्प लिया गया कि अब विनम्रता का समय समाप्त हो चुका है। इसी संकल्प के साथ नौ मार्च से 20 मार्च तक प्रदेश के हर दुर्गम पहाड़ी जिले से लेकर मैदानी जनपदों तक, लोक निर्माण विभाग और सिंचाई मुख्यालयों के बाहर भारी प्रदर्शन आयोजित किए गए। इन सबके बावजूद जब सचिवालय की नींद नहीं टूटी, तो अंततः 23 मार्च से इस आंदोलन को श्अनिश्चितकालीन हड़तालश् के भीषण स्वरूप में बदलने का फैसला लिया गया।

इस महासंग्राम के केंद्र में खड़े जुझारू और मुखर इंजीनियर गौरव पाठक ने मांगों के उस विस्तृत और पेचीदा पिटारे को मीडिया के सामने रखा, जो पिछले कई वर्षों से सरकारी दराजों में धूल फांक रहा है। गौरव पाठक ने बेहद गंभीर शब्दों में स्पष्ट किया कि उनकी 27 सूत्रीय मांगों की सूची कोई साधारण मांग पत्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा दस्तावेज है जो उत्तराखंड के तकनीकी ढांचे की विसंगतियों को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि इन 27 मांगों को अल्प समय में समझाना लगभग असंभव है क्योंकि इसमें करियर प्रोग्रेशन से लेकर फील्ड भत्तों तक के बारीक तकनीकी मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने विशेष रूप से श्1626श् के ग्रेड पे से जुड़ी उस जटिल विसंगति को उठाया, जिसने पिछले एक दशक से तकनीकी संवर्ग के वेतन ढांचे को अस्त-व्यस्त कर रखा है। इसके साथ ही, गौरव पाठक ने श्उत्तराखंड पेंशन निगमश् के गठन की मांग पर विशेष बल देते हुए कहा कि जो इंजीनियर अपनी पूरी जवानी दुर्गम पहाड़ों में सड़कें और नहरें बनाने में खपा देता है, उसे सेवानिवृत्ति के बाद बुढ़ापे में सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिलना ही चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी अन्य कई मांगें कार्यस्थल की सुरक्षा और पदोन्नति के पारदर्शी नियमों से जुड़ी हैं। पाठक ने अत्यंत दुखी मन से यह भी जोड़ा कि वे व्यक्तिगत रूप से और एक इंजीनियर के तौर पर कभी नहीं चाहते कि राज्य के विकास कार्य बाधित हों, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर निकल जाए, तो हक मांगना नहीं बल्कि छीनना पड़ता है। उन्होंने आह्वान किया कि यदि सरकार आज उनकी मांगों पर मुहर लगा दे, तो वे अभी इसी वक्त हड़ताल खत्म कर काम पर लौटने को तैयार हैं।

हड़ताल की व्यापकता और इसमें शामिल विभागों की भारी संख्या को देखें तो यह आंदोलन उत्तराखंड सरकार के लिए किसी बड़े प्रशासनिक संकट से कम नहीं है। इस हड़ताल की आग केवल सिंचाई या लोक निर्माण विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जल निगम, जल संस्थान, कृषि विभाग, शहरी विकास प्राधिकरण और ग्रामीण अभियंत्रण विभाग (आरईडब्ल्यूडी) जैसे महत्वपूर्ण संस्थान भी अपनी पूरी ताकत के साथ कूद पड़े हैं। काशीपुर के धरना स्थल पर जुटी इंजीनियरों की भीड़ में हर विभाग का प्रतिनिधित्व नजर आया। आंदोलनकारियों का तर्क है कि जब राज्य का पूरा तकनीकी ढांचा एक साथ काम रोक देता है, तो इसका सीधा और भयावह असर राज्य की करोड़ों की विकास योजनाओं पर पड़ता है। निर्माणाधीन पुलों का काम रुक गया है, नई सड़कों का डामरीकरण अधर में लटक गया है और सरकारी भवनों के नक्शे फाइलों में बंद हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने एक स्वर में यह चेतावनी दी है कि वे अब शासन की किसी भी खोखली मौखिक सांत्वना पर विश्वास नहीं करेंगे। उन्हें अब ठोस शासनादेश चाहिए, जो उनकी मांगों के समाधान की गारंटी दे सके। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक उत्तराखंड का पूरा तकनीकी तंत्र इसी तरह ठप रहेगा, जिसकी पूरी जवाबदेही केवल और केवल शासन की संवेदनहीनता पर होगी।

तकनीकी विसंगतियों की गहराई में उतरते हुए अनुभवी इंजीनियर केशव सिंह ने अपने संबोधन में उस ऐतिहासिक अन्याय का कच्चा चिट्ठा खोला, जिसने इंजीनियरों के मन में गहरी कड़वाहट पैदा कर दी है। केशव सिंह ने विशेष रूप से वर्ष 2013 के उस विवादित शासनादेश का जिक्र किया जिसने पूरे संवर्ग के साथ अन्याय किया। उन्होंने विस्तृत रूप से समझाया कि पूर्व की मान्य व्यवस्था के अनुसार, दस वर्ष की संतोषजनक और निष्कलंक सेवा पूर्ण करने वाले प्रत्येक डिप्लोमा इंजीनियर को 5400 का ग्रेड पे प्रथम एसीपी (एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन) के रूप में मिलना सुनिश्चित था। परंतु, शासन ने 10 दिसंबर 2013 की एक मनमानी समय सीमा निर्धारित करके इस अधिकार पर कैंची चला दी। इसके परिणामस्वरूप, उस तारीख के बाद नियुक्त होने वाले प्रतिभाशाली इंजीनियरों के लिए पदोन्नति और उचित वेतनमान के रास्ते अत्यंत कठिन और भेदभावपूर्ण हो गए। केशव सिंह ने सवाल उठाया कि ‘क्या एक ही पद और एक ही योग्यता वाले दो कर्मचारियों के लिए अलग-अलग नियम न्यायसंगत हो सकते हैं?’ उन्होंने कहा कि शासन की इस अदूरदर्शी नीति ने विभाग में नए भर्ती होने वाले ऊर्जावान इंजीनियरों के मनोबल को कुचल कर रख दिया है। वे शासन से कोई खैरात नहीं मांग रहे, बल्कि केवल उस अधिकार की बहाली चाहते हैं जो नियमतः उनका था और जिसे सरकार ने पहले स्वीकार भी किया था, लेकिन बाद में चालाकी से नियमों के फेर में उलझाकर छीन लिया गया।

विकास कार्यों के रुकने से जनता को होने वाली परेशानियों और राज्य की आर्थिक हानि पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इंजीनियरों ने इसके लिए सीधे तौर पर मुख्यमंत्री कार्यालय और संबंधित मंत्रियों की वादाखिलाफी को जिम्मेदार ठहराया है। केशव सिंह ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम को याद दिलाते हुए बताया कि पिछले वर्ष जून के महीने में जब महासंघ के एक प्रतिनिधिमंडल ने माननीय मुख्यमंत्री जी से भेंट की थी, तो मुख्यमंत्री ने उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुना था और तत्काल समाधान का ठोस आश्वासन दिया था। उस समय मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इंजीनियरों की समस्याएं जायज हैं और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सुलझाया जाएगा। मुख्यमंत्री के इस शब्द पर भरोसा करके ही इंजीनियरों ने कई महीनों तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की और कोई आंदोलन नहीं किया। लेकिन जब महीनों बाद भी मुख्यमंत्री के उन आश्वासनों को सचिवालय की फाइलों में कोई जगह नहीं मिली और नौकरशाही ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया, तो इंजीनियरों का विश्वास पूरी तरह से टूट गया। केशव सिंह ने भावुक होकर कहा, ‘हमें सड़कों पर बैठने का शौक नहीं है, हम तो निर्माण के शिल्पी हैं। लेकिन जब शिल्पकार के ही हाथ बांध दिए जाएं और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए, तो निर्माण कैसे होगा?’ उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि आज विकास की गाड़ी रुकी है, तो इसका दोष उन अधिकारियों पर मढ़ा जाना चाहिए जिन्होंने मुख्यमंत्री की गरिमा और उनके आश्वासनों को गंभीरता से नहीं लिया।

आंदोलन की आगामी दिशा अब और भी अधिक आक्रामक और भीषण होने के स्पष्ट संकेत दे रही है। महासंघ ने अपनी रणनीति का खुलासा करते हुए शासन को एक अंतिम अल्टीमेटम दिया है। केशव सिंह और अन्य पदाधिकारियों ने बताया कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत अभी तक उन्होंने जल संस्थान और जल निगम जैसे ‘अति-आवश्यक’ सेवा वाले विभागों को आंदोलन से कुछ हद तक दूर रखा था, ताकि उत्तराखंड की जनता को पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तुरंत परेशान न होना पड़े। यह उनकी नैतिकता थी, जिसे शायद सरकार ने उनकी ढिलाई समझ लिया। परंतु, अब धैर्य की सीमा समाप्त हो चुकी है। महासंघ ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा कर दी है कि यदि 31 मार्च तक उनकी 27 सूत्रीय मांगों पर कोई निर्णायक और संतोषजनक शासनादेश जारी नहीं किया गया, तो एक अप्रैल से जल संस्थान और जल निगम के हजारों इंजीनियर भी पूरी तरह से काम ठप कर अनिश्चितकालीन हड़ताल में शामिल हो जाएंगे। इसका सीधा प्रभाव प्रदेश के लाखों घरों की जलापूर्ति पर पड़ेगा, जिसके लिए शासन को अभी से तैयार रहना चाहिए। हड़ताल स्थल पर गूंज रहे ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों और इंजीनियरों के चेहरों पर दिख रही दृढ़ता यह साफ कर रही है कि यह लड़ाई अब अपने चरम पर पहुंच चुकी है। यह केवल वेतन या भत्तों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के तकनीकी गौरव को पुनः स्थापित करने का एक महाअभियान बन चुका है, जो अब मांगों के पूरा होने पर ही थमेगा।

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