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गैरसैंण बजट पर अनुपम शर्मा का हमला बोले बढ़ता कर्ज बेरोजगारी पलायन और जनता के मुद्दे गायब

कांग्रेस प्रदेश महासचिव अनुपमा शर्मा ने धामी सरकार के बजट को बताया निराशाजनक युवाओं को रोजगार नहीं महिला सुरक्षा शिक्षा स्वास्थ्य पलायन और बढ़ते कर्ज पर ठोस योजना न होने का लगाया आरोप।

काशीपुर। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में जब राज्य सरकार ने लगभग ₹1.11 लाख करोड़ का वार्षिक बजट प्रस्तुत किया तो सत्ता पक्ष ने इसे विकास, आत्मनिर्भरता और भविष्य की योजनाओं का मजबूत दस्तावेज बताया। लेकिन बजट पेश होने के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस का माहौल तेज हो गया है। इसी क्रम में कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अनुपम शर्मा ने राज्य सरकार के बजट पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह बजट आंकड़ों और घोषणाओं से भरा हुआ दस्तावेज तो जरूर है, लेकिन इसमें राज्य की असली समस्याओं का ठोस समाधान दिखाई नहीं देता। उनका कहना है कि किसी भी राज्य का बजट केवल संख्याओं का खेल नहीं होता बल्कि यह उस सरकार की प्राथमिकताओं और सोच को भी दर्शाता है। यदि बजट में जनता की वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता नहीं दी जाती तो उसका लाभ केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। अनुपम शर्मा ने कहा कि उत्तराखंड की जनता लंबे समय से रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा व्यवस्था और पलायन जैसी समस्याओं से जूझ रही है, लेकिन बजट में इन मुद्दों को जिस गंभीरता के साथ उठाया जाना चाहिए था, वह दिखाई नहीं देता। उनका आरोप है कि सरकार ने बड़े-बड़े आंकड़े प्रस्तुत कर विकास का भ्रम पैदा करने की कोशिश की है, जबकि जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है।

राज्य की आर्थिक स्थिति को लेकर भी अनुपम शर्मा ने गंभीर चिंता व्यक्त की और कहा कि उत्तराखंड पर लगातार बढ़ता कर्ज भविष्य के लिए खतरे की घंटी बन सकता है। उन्होंने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 के आसपास राज्य पर लगभग ₹44,000 करोड़ का कर्ज था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह बढ़ते-बढ़ते ₹1 लाख करोड़ से भी अधिक हो चुका है। उनका कहना है कि यदि किसी राज्य का कर्ज इतनी तेजी से बढ़ता है और उसकी आय के स्रोत उसी गति से मजबूत नहीं होते तो आने वाले समय में आर्थिक दबाव बढ़ना तय है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बजट का आकार बढ़ाकर इसे उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, लेकिन यह नहीं बता रही कि इस बढ़ते कर्ज को नियंत्रित करने की क्या योजना है। अनुपम शर्मा का कहना है कि यदि कर्ज के बोझ को समय रहते संतुलित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि एक जिम्मेदार सरकार को बजट पेश करते समय केवल खर्च बढ़ाने पर नहीं बल्कि वित्तीय अनुशासन और आर्थिक संतुलन पर भी बराबर ध्यान देना चाहिए।

उत्तराखंड की सामाजिक और आर्थिक संरचना में बेरोजगारी और पलायन लंबे समय से सबसे बड़ी चुनौतियों में गिने जाते रहे हैं। इस मुद्दे पर बोलते हुए अनुपम शर्मा ने कहा कि राज्य के हजारों शिक्षित युवा आज भी रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं और बड़ी संख्या में युवाओं को मजबूरी में अपने घर-गांव छोड़कर दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। उनका कहना है कि सरकार के बजट से युवाओं को यह उम्मीद थी कि उन्हें रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और उद्योगों के विकास के लिए स्पष्ट नीति सामने आएगी। लेकिन बजट में ऐसी कोई ठोस योजना दिखाई नहीं देती जिससे यह भरोसा पैदा हो सके कि आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होंगे। अनुपम शर्मा ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में पलायन रोकना चाहती है तो उसे पहाड़ी क्षेत्रों में उद्योग, पर्यटन और कृषि आधारित उद्यमों को बढ़ावा देना होगा। साथ ही स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार देने के लिए स्पष्ट भर्ती नीति और पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी होगी। उनका आरोप है कि बजट में इन महत्वपूर्ण मुद्दों को गंभीरता से संबोधित नहीं किया गया है, जिससे युवाओं में निराशा का माहौल बन सकता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर भी कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अनुपम शर्मा ने सरकार को घेरते हुए कहा कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कई सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार स्वास्थ्य विभाग में लगभग 41 प्रतिशत पद रिक्त बताए जाते हैं, जो इस बात का संकेत है कि स्वास्थ्य सेवाएं कितनी दबाव में चल रही हैं। अनुपम शर्मा का कहना है कि बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए धनराशि आवंटित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जरूरी यह है कि डॉक्टरों की भर्ती, अस्पतालों का विस्तार और दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों तक चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाने के लिए स्पष्ट योजना बनाई जाए। उन्होंने कहा कि कई गांवों में आज भी लोगों को प्राथमिक उपचार के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है और गंभीर बीमारियों के मामलों में मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। उनके अनुसार यदि सरकार वास्तव में जनता की भलाई के लिए काम करना चाहती है तो स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता देते हुए स्थायी समाधान तैयार करना होगा।

शिक्षा के क्षेत्र को लेकर भी अनुपम शर्मा ने चिंता जताई और कहा कि राज्य में स्कूलों की संख्या में लगातार कमी आना एक गंभीर संकेत है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में उत्तराखंड में लगभग 17,753 स्कूल संचालित हो रहे थे, जबकि वर्ष 2024 तक यह संख्या घटकर करीब 16,018 रह गई। उनका कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में छात्र संख्या कम होने के कारण कई स्कूलों को बंद या विलय किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अनुपम शर्मा ने कहा कि शिक्षा किसी भी राज्य के विकास की बुनियाद होती है और यदि इस क्षेत्र को मजबूत नहीं किया गया तो भविष्य में सामाजिक और आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि बजट में शिक्षक भर्ती, स्कूलों के आधुनिकीकरण और ग्रामीण शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए स्पष्ट नीति दिखाई नहीं देती। उनका कहना है कि सरकार को चाहिए था कि वह शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए दीर्घकालिक योजना प्रस्तुत करती।

पलायन का मुद्दा उत्तराखंड की पहचान से जुड़ी बड़ी चुनौती बन चुका है और इस विषय पर भी अनुपम शर्मा ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों के हजारों गांवों से लोग रोज़गार और बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिससे कई गांव लगभग खाली हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि यदि गांवों में रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं उपलब्ध हों तो लोग अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होंगे। अनुपम शर्माका आरोप है कि बजट में पलायन रोकने के लिए कोई व्यापक और प्रभावी रणनीति दिखाई नहीं देती। उनका कहना है कि स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन देना, कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना और पर्यटन को गांवों तक विस्तार देना इस समस्या का समाधान हो सकता है। लेकिन बजट में इन पहलुओं पर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देती, जिससे यह आशंका बनी हुई है कि आने वाले वर्षों में पलायन की समस्या और बढ़ सकती है।

सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर भी अनुपम शर्मा ने सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई विभागों को पहले से जो बजट आवंटित किया गया था, उसका पूरा उपयोग भी नहीं हो पाया। सामाजिक कल्याण और ऊर्जा जैसे विभागों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कई योजनाएं कागजों पर तो घोषित हो जाती हैं, लेकिन उनका लाभ समय पर जनता तक नहीं पहुंच पाता। अनुपम शर्मा का कहना है कि यदि पहले से आवंटित धनराशि का सही उपयोग नहीं हो रहा तो केवल बजट का आकार बढ़ाने से विकास की गति तेज नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह योजनाओं की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करे और यह सुनिश्चित करे कि जो धन जनता के विकास के लिए निर्धारित किया गया है, उसका उपयोग समय पर और पारदर्शी तरीके से हो।

युवाओं के भविष्य से जुड़े भर्ती घोटालों के मुद्दे को भी अनुपम शर्मा ने गंभीरता से उठाया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद सामने आए हैं, जिससे युवाओं का विश्वास व्यवस्था से कमजोर हुआ है। उनका कहना है कि हजारों युवा मेहनत करके परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और उन्हें उम्मीद होती है कि भर्ती प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होगी। लेकिन जब भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं की खबरें सामने आती हैं तो युवाओं का मनोबल टूटता है। अनुपम शर्मा ने आरोप लगाया कि बजट या विधानसभा सत्र में सरकार ने इस विषय पर स्पष्ट रुख नहीं अपनाया। उनका कहना है कि यदि सरकार युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करना चाहती है तो उसे भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना होगा।

महिला सुरक्षा का मुद्दा भी राज्य की राजनीति में लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है और इस संदर्भ में अनुपम शर्मा ने अंकिता भंडारी हत्याकांड का उल्लेख करते हुए सरकार से सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि यह घटना पूरे प्रदेश के लिए पीड़ा और आक्रोश का कारण बनी थी और लोगों को उम्मीद थी कि सरकार महिला सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाएगी। लेकिन उनके अनुसार बजट में महिला सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को लेकर स्पष्टता नहीं दिखाई देती।अनुपम शर्मा ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस व्यवस्था को मजबूत करना, त्वरित न्याय की व्यवस्था करना और सामाजिक जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि यदि इन मुद्दों पर गंभीर कदम नहीं उठाए गए तो समाज में असुरक्षा की भावना बनी रह सकती है।

बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे पर भी अनुपम शर्मा ने सरकार की नीतियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि राज्य के कई क्षेत्रों में बिजली और पानी जैसी मूलभूत सेवाओं को लेकर अभी भी लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि बिजली के दामों में लगातार वृद्धि से आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। वहीं कई गांवों में जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन तो बिछा दी गई है, लेकिन नियमित रूप से पानी नहीं पहुंच पा रहा। अनुपम शर्मा का कहना है कि यदि बुनियादी सुविधाएं ही सुचारु रूप से उपलब्ध नहीं होंगी तो विकास की बड़ी योजनाओं का लाभ जनता तक कैसे पहुंचेगा। उन्होंने सरकार से मांग की कि इन समस्याओं के समाधान के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं।

विधानसभा सत्र की अवधि को लेकर भी अनुपम शर्मा ने सरकार पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि बजट जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन सत्र को अपेक्षाकृत छोटा रखा गया जिससे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन बहस नहीं हो पाई। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है और यदि उसे पर्याप्त समय नहीं दिया जाएगा तो जनता की आवाज़ पूरी तरह सामने नहीं आ पाएगी। अनुपम शर्मा ने मांग की कि बजट सत्र कम से कम 20 से 22 दिनों का होना चाहिए था ताकि सभी विभागों की योजनाओं और खर्चों पर विस्तार से चर्चा की जा सके।

बजट पेश करने की प्रक्रिया को लेकर भी अनुपम शर्मा ने यह आरोप लगाया कि सत्र के शुरुआती चरण में ही बजट प्रस्तुत कर दिया गया, जिससे विपक्ष को विस्तृत तैयारी और चर्चा का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। उनका कहना है कि इतने बड़े आर्थिक दस्तावेज पर गहन विमर्श होना आवश्यक है क्योंकि इसका सीधा संबंध राज्य के विकास और जनता के भविष्य से जुड़ा होता है। अनुपम शर्माने कहा कि सरकार को चाहिए था कि वह अधिक पारदर्शिता और संवाद की भावना के साथ बजट प्रस्तुत करती, ताकि सभी पक्ष मिलकर राज्य के विकास की दिशा तय कर सकें। उनके अनुसार उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और पहाड़ी राज्य में विकास की योजनाओं को बनाते समय जनता की वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता देना सबसे जरूरी है, और यही वह पहलू है जिसकी कमी इस बजट में दिखाई देती है।

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