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मिशन 2027 के रण में क्या खिलेगा कमल या बिखरी कांग्रेस को मिलेगा सहारा

काशीपुर। उत्तराखंड की राजनीति को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच एक विस्तृत वरिष्ठ पत्रकार विनोद भगत और ‘सहर प्रजातंत्र के सम्पदाक सुनील कोठारी’ के बीज एक संवाद में 2027 के विधानसभा चुनावों को केंद्र में रखकर मौजूदा सरकार के कार्यकाल, उसकी उपलब्धियों और कमियों पर गंभीर मंथन सामने आया। चर्चा की शुरुआत वरिष्ठ पत्रकार विनोद ने इस प्रश्न से हुई कि पिछली बार जिस प्रचंड बहुमत के साथ सरकार सत्ता में आई थी, क्या वैसा ही जनादेश दोबारा मिल पाना संभव है। इस पर सुनील कोठारी ने साफ शब्दों में कहा कि प्रदेश की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को समझने वाले लोग जानते हैं कि सरकार ने अपने घोषित एजेंडों में से लगभग 80 प्रतिशत पर काम किया है, जिसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। उनका मानना था कि जिन मुद्दों को लेकर जनता ने भरोसा जताया था, उनमें कई क्षेत्रों में सरकार खरी उतरी है, हालांकि यह भी सच है कि कुछ मोर्चों पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिखे। उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी भी सरकार के आकलन में केवल दावों को नहीं, बल्कि ज़मीनी सच्चाई को देखना ज़रूरी होता है, क्योंकि जनता के अनुभव ही अंततः राजनीतिक भविष्य तय करते हैं।

चर्चा आगे बढ़ी तो सरकार के एजेंडे को लेकर सवाल उठे, खासकर धार्मिक मुद्दों को प्राथमिकता देने को लेकर। सुनील कोठारी ने कहा कि आम धारणा यह बनती जा रही है कि मौजूदा सरकार का झुकाव धार्मिक एजेंडों की ओर अधिक रहा है, जबकि स्थानीय समस्याएं, विकास कार्य और रोजमर्रा के जनहित के मुद्दे अपेक्षाकृत पीछे छूटते दिखाई देते हैं। सरकार भले ही यह दावा करती रहे कि विकास और जनसमस्याओं पर बराबर ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन एक वर्ग ऐसा है जिसे यह संतुलन ठीक नहीं लगता। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश की लगभग 20 प्रतिशत वह जागरूक और बुद्धिजीवी जनता, जो सरकार की नीतियों और फैसलों पर लगातार नजर रखती है, इस बात से असंतुष्ट है कि चुनाव और राजनीति भावनाओं के बजाय ठोस मुद्दों पर आधारित होनी चाहिए। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और “पहाड़ बचाओ” जैसे प्रश्न उनके लिए ज्यादा अहम हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पहाड़ों की स्थिति पर चर्चा करते हुए बातचीत और गंभीर हो गई। सुनील कोठारी ने पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाल स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि आज भी यदि पहाड़ में कोई गंभीर रूप से बीमार होता है या कोई प्रसूता महिला होती है, तो उसे मैदानों की ओर ले जाना मजबूरी बन जाता है। यह स्थिति दर्शाती है कि प्रदेश की भौगोलिक चुनौतियों को अब तक कोई भी सरकार पूरी तरह समझ नहीं पाई है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सेवाओं का ढांचा तैयार करना बेहद जरूरी है, लेकिन अधिकांश सरकारें अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए लोकलुभावन वादों में उलझी रहती हैं। नतीजतन पहाड़ आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित महसूस करता है, और यही असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक नाराजगी में बदल सकता है।

गढ़वाल क्षेत्र का उदाहरण देते हुए सुनील कोठारी ने कहा कि आज़ादी से पहले और बाद की तुलना करें तो वहां के लोगों को आज भी वही उपेक्षा महसूस होती है। उन्होंने बताया कि कई इलाकों में अब भी बिजली, सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। सरकार चारधाम यात्रा के लिए बेहतर सड़कों और सुविधाओं के दावे जरूर करती है, लेकिन आम स्थानीय नागरिकों के जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता। उनका तर्क था कि विकास का मतलब केवल कुछ बड़े प्रोजेक्ट या आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका असर आम आदमी के जीवन में महसूस होना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार की इच्छाशक्ति पर भी सवाल उठते हैं, क्योंकि चाहे वर्तमान सरकार हो या पिछली सरकारें, पहाड़ों को लेकर दीर्घकालिक दृष्टि का अभाव साफ दिखता है। विधायकों का देहरादून में बस जाना और अपने क्षेत्रों से दूरी बना लेना भी इसी समस्या का हिस्सा बताया गया।

विधानसभा सत्र और पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़े बयानों का जिक्र करते हुए बातचीत में एक उदाहरण सामने आया, जिसमें गैरसैंण को लेकर दिए गए बयान ने विवाद खड़ा किया था। सुनील कोठारी ने कहा कि जब कोई जनप्रतिनिधि यह तर्क देता है कि किसी प्राकृतिक स्थल पर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, तो यह न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि पहाड़ों के साथ अन्याय जैसा भी प्रतीत होता है। उनके अनुसार ठंड और संसाधनों की कमी का समाधान खोजने के बजाय ऐसे तर्क देना दर्शाता है कि पहाड़ों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। इस तरह के बयान जनता में यह संदेश देते हैं कि सत्ता में बैठे लोग खुद पहाड़ से दूरी बना चुके हैं, जिससे वहां के निवासियों में निराशा और आक्रोश बढ़ता है।

चर्चा का रुख विपक्ष की भूमिका की ओर मुड़ा तो यह सवाल उठा कि सरकार की कमियों के बावजूद विपक्ष उसका राजनीतिक लाभ क्यों नहीं उठा पा रहा। सुनील कोठारी का मानना था कि विपक्ष मुद्दे तो उठाता है, लेकिन जनता के बीच वह प्रभाव पैदा नहीं कर पा रहा, जो एक मजबूत विपक्ष से अपेक्षित होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष पर यह धारणा बनती जा रही है कि जांच एजेंसियों और प्रशासनिक दबाव के जरिए विपक्ष को कमजोर किया जाता है, और उठाए गए मुद्दों को खारिज करने के लिए पूरी व्यवस्था सक्रिय हो जाती है। उन्होंने अंकिता भंडारी हत्याकांड का उदाहरण देते हुए कहा कि यह उत्तराखंड का एक अत्यंत संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दा रहा, लेकिन सीबीआई जांच की संस्तुति के बाद भी कई सवाल अनुत्तरित रह गए, जिससे विपक्ष और पीड़ित परिवार की असंतुष्टि बनी रही।

2027 के चुनावी परिदृश्य पर लौटते हुए सुनील कोठारी ने स्वीकार किया कि प्रदेश में एंटी-इनकंबेंसी की चर्चा जोर पकड़ रही है। रोजगार, सरकारी भर्तियों, शिक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर असंतोष दिखाई देता है। हालांकि उनका यह भी कहना था कि विपक्ष इस असंतोष को एकजुट राजनीतिक ताकत में बदलने में नाकाम रहा है। विपक्षी दल गुटों में बंटे हुए हैं और जनता के सामने एक साझा विकल्प प्रस्तुत नहीं कर पा रहे। उन्होंने कहा कि जब तक विपक्ष अपने आंतरिक मतभेदों से ऊपर उठकर एकजुट नहीं होगा, तब तक सत्ता पक्ष को चुनौती देना कठिन रहेगा। सत्ता में रहने का लाभ सरकार को मिलता है, लेकिन विपक्ष उस मौके को भुना नहीं पा रहा, यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

तराई क्षेत्र से उठे असंतोष और विद्रोह के सुरों पर बात करते हुए सुनील कोठारी ने कहा कि उधम सिंह नगर में जिस तरह से एक विधायक से जुड़े विवाद सामने आए हैं, वह आने वाले चुनावों में असर डाल सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से अरविंद पांडे के नाम के लगातार चर्चा में रहने का जिक्र किया और कहा कि जनता यह सब देख रही है कि पार्टी के भीतर असंतोष किस तरह सार्वजनिक हो रहा है। आमतौर पर भाजपा को एक ऐसी पार्टी माना जाता है, जहां आंतरिक विवाद मंच के भीतर सुलझा लिए जाते हैं, लेकिन तराई में सामने आए घटनाक्रम ने इस छवि को कुछ हद तक नुकसान पहुंचाया है। यदि ऐसे मुद्दों को समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो इसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।

मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर चर्चा में सुनील कोठारी ने कहा कि फिलहाल पुष्कर सिंह धामी की केंद्र के साथ बेहतर तालमेल की वजह से नेतृत्व परिवर्तन की संभावना कम दिखाई देती है। उनका मानना था कि यदि किसी नए चेहरे को आगे लाया गया, तो मौजूदा एंटी-इनकंबेंसी उस पर भारी पड़ सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और संगठन के साथ मुख्यमंत्री का तालमेल मजबूत है, जो भाजपा के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।

कांग्रेस की स्थिति पर बोलते हुए सुनील कोठारी ने कहा कि पार्टी के पास चेहरे तो कई हैं, लेकिन ऐसा कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं दिखता, जो कुमाऊं और गढ़वाल दोनों को जोड़ सके। आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असमंजस कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। काशीपुर का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि संगठनात्मक नियुक्तियों के बाद किस तरह गुटबाजी खुलकर सामने आई, जिससे पार्टी का ध्यान सरकार के विरोध के बजाय आपसी संघर्ष में उलझ गया। उनका निष्कर्ष था कि जब तक विपक्ष एकजुट होकर “संगठन में ही ताकत” के सिद्धांत को नहीं अपनाएगा, तब तक भाजपा को चुनौती देना बेहद कठिन रहेगा। अंततः उन्होंने कहा कि 2027 में सत्ता की तस्वीर क्या होगी, यह जनता तय करेगी, लेकिन मौजूदा हालात में भाजपा का पलड़ा भारी और विपक्ष के लिए राह कठिन नजर आती है।

यह चर्चा किसी एक निष्कर्ष को थोपने के लिए नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति की जमीनी हकीकत को सामने रखने का प्रयास थी। पत्रकार होने के नाते सुनील कोठारी ने सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक सवालों को उसी दृष्टि से उठाया, जो आम जनता के मन में लगातार आकार ले रहे हैं। सत्ता की उपलब्धियां, सरकार के दावे, पहाड़ों की पीड़ा, युवाओं के सवाल और विपक्ष की कमजोरियांकृइन सभी पहलुओं पर खुलकर संवाद हुआ। अब यह फैसला किसी एक व्यक्ति या मंच का नहीं, बल्कि प्रदेश की उस जनता का है, जो हर दिन इन नीतियों और फैसलों के असर को अपने जीवन में महसूस कर रही है। सवाल सीधा और बेहद अहम हैकृक्या पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी उत्तराखंड में एक बार फिर सत्ता का विश्वास हासिल कर पाएगी, या फिर लगातार सरकार बनाने का उसका क्रम इस बार जनता की कसौटी पर टूट जाएगा? इसका जवाब समय नहीं, बल्कि जनमत देगा।

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