काशीपुर। देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और जनभावनाओं से सराबोर वातावरण में इस बार होली का पर्व काशीपुर के लिए ऐतिहासिक बन गया, जब काशीपुर में आयोजित भव्य होली मिलन समारोह में प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सहभागिता कर जनमानस को भावनात्मक रूप से जोड़ दिया। नगर निगम प्रांगण में सजे इस रंगोत्सव ने न केवल सांस्कृतिक उल्लास को नई ऊंचाई दी, बल्कि यह भी दिखाया कि सत्ता और जनता के बीच संवाद जब सीधे और आत्मीय रूप में होता है, तो उसका प्रभाव लंबे समय तक याद किया जाता है। मुख्यमंत्री का यह आगमन इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि इससे पहले काशीपुर में नगर निगम स्तर पर आयोजित होली मिलन कार्यक्रम में किसी मुख्यमंत्री की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं देखी गई थी। जैसे ही उनके कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने की सूचना फैली, लोगों में उत्साह की लहर दौड़ गई और हजारों की संख्या में नागरिक रंगों के इस पर्व में शामिल होने के लिए नगर निगम प्रांगण की ओर उमड़ पड़े। पूरे परिसर में ढोल, मंजीरे, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकगीतों की गूंज के बीच ऐसा वातावरण बन गया, जिसने आयोजन को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव का रूप दे दिया।
नगर निगम परिसर को इस अवसर पर पारंपरिक लोकशैली में सजाया गया था, जहां रंग-बिरंगे फूल, झंडियां और सांस्कृतिक प्रतीक हर ओर बिखरे दिखाई दे रहे थे। आयोजन का नाम “रंगोत्सव” रखा गया था, जो पूरी तरह उसके स्वरूप को दर्शा रहा था। जैसे ही मुख्यमंत्री मंच पर पहुंचे, लोकगायकों और होल्यारों ने उनका पारंपरिक अंदाज में स्वागत किया। अबीर और गुलाल के रंगों से सजी इस बेला में मुख्यमंत्री ने भी आत्मीयता के साथ कलाकारों और नागरिकों का अभिवादन स्वीकार किया और काशीपुरवासियों को होली की शुभकामनाएं दीं। उनके चेहरे पर सहज मुस्कान और व्यवहार में अपनापन साफ दिखाई दे रहा था, जिसने कार्यक्रम में मौजूद हर व्यक्ति को विशेष महसूस कराया। उन्होंने मंच से संबोधित करते हुए कहा कि इस आयोजन में उन्हें देश की विविधता की झलक मिल रही है, जहां अलग-अलग क्षेत्रों, परंपराओं और संस्कृतियों के लोग एक साथ रंगों का उत्सव मना रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जनता द्वारा दिया गया यह स्नेह और विश्वास उन्हें नई ऊर्जा देता है, जिससे वे प्रदेश के विकास को और अधिक गति देने के लिए प्रेरित होते हैं।

इस रंगोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सांस्कृतिक विविधता रही, जिसने पूरे कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को आगे बढ़ाने वाले प्रसिद्ध लोकगायक इंदर आर्या, गोविंद दिगारी और खुशी जोशी ने अपनी प्रस्तुतियों से माहौल को भावविभोर कर दिया। उनकी लोकधुनों में पहाड़ की मिट्टी की खुशबू और परंपराओं की गूंज साफ महसूस की जा सकती थी। इसके साथ ही पूर्वांचल के चर्चित गायक आलोक कुमार की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में अलग ही रंग भर दिया। ब्रज क्षेत्र से आए रास कलाकारों द्वारा प्रस्तुत फूलों की होली ने आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वातावरण को और गहरा कर दिया। पारंपरिक होली गीतों, रास नृत्य और लोकनाट्य की प्रस्तुतियों के दौरान दर्शक खुद को रोक नहीं पाए और तालियों, जयकारों व रंगों के साथ कलाकारों का उत्साह बढ़ाते रहे। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि लोकसंस्कृति आज भी लोगों के दिलों में जीवित है और ऐसे आयोजनों के माध्यम से उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।
कार्यक्रम का एक ऐसा क्षण भी आया, जिसने आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया। लोकधुनों की गूंज और ढोल की थाप के बीच मुख्यमंत्री स्वयं मंच से उतरकर ब्रज के रास कलाकारों और होल्यारों के साथ झूमते नजर आए। यह दृश्य किसी औपचारिक राजनीतिक कार्यक्रम से बिल्कुल अलग था, जहां सत्ता और आमजन के बीच कोई दूरी नहीं दिखाई दी। मुख्यमंत्री की यह सहभागिता देखकर कार्यक्रम में मौजूद लोग उत्साह से भर उठे और पूरा परिसर तालियों और उल्लास से गूंज उठा। लोगों ने अपने मोबाइल फोन में इस ऐतिहासिक पल को कैद किया, क्योंकि यह दृश्य लंबे समय तक स्मृतियों में रहने वाला था। इस सहभागिता ने यह संदेश दिया कि जनप्रतिनिधि जब जनता के साथ उसी भाव से जुड़ते हैं, तो विश्वास और अपनत्व अपने आप मजबूत होता है। काशीपुर के लिए यह क्षण इसलिए भी खास रहा क्योंकि इसने नगर को प्रदेश के सांस्कृतिक मानचित्र पर एक नई पहचान दी।
स्थानीय नागरिकों की भारी सहभागिता ने इस आयोजन को सामाजिक समरसता का सशक्त उदाहरण बना दिया। शहर के विभिन्न वार्डों के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग रंगोत्सव में शामिल हुए। हर आयु वर्ग के लोग — बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग — एक साथ रंगों के इस पर्व का आनंद लेते नजर आए। इस दृश्य ने यह साफ कर दिया कि होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि आपसी मेल-मिलाप और भाईचारे का प्रतीक भी है। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए कहा कि समाज में प्रेम, सद्भाव और एकता बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे सांस्कृतिक आयोजन समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं और लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखते हैं। इस अवसर पर महापौर दीपक बाली ने मुख्यमंत्री के आगमन पर गहरा आभार व्यक्त करते हुए कहा कि काशीपुर के इतिहास में यह दिन हमेशा याद किया जाएगा, क्योंकि पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने यहां आयोजित होली मिलन समारोह में भाग लेकर जनता के साथ रंगों का पर्व मनाया है।
कार्यक्रम के औपचारिक समापन के बाद भी रंगोत्सव का उल्लास कम नहीं हुआ, बल्कि माहौल और अधिक आत्मीय हो गया। खुले मंच पर संगीत की धुनों के बीच वह दृश्य सामने आया, जिसने पूरे आयोजन को मानवीय रिश्तों की गर्माहट से भर दिया। मुख्यमंत्री, महापौर दीपक बाली और उनके करीबी सहयोगी अनौपचारिक वातावरण में एक-दूसरे के साथ ठहाके लगाते, तालियों के साथ संगीत का आनंद लेते और रंगों की मस्ती में सराबोर नजर आए। यह क्षण राजनीति की सीमाओं से परे था, जहां पद और औपचारिकता पीछे छूट गई और केवल उत्सव का आनंद शेष रह गया। खुले याराना अंदाज में सभी ने लोकसंगीत की धुनों पर कदम थिरकाए, जिससे कार्यक्रम स्थल पर मौजूद आम नागरिकों को भी ऐसा महसूस हुआ मानो वे अपने ही परिवार के लोगों के साथ उत्सव मना रहे हों। यह दृश्य इस बात का प्रमाण बना कि जब जनप्रतिनिधि जनता के बीच उसी सहजता से शामिल होते हैं, तो विश्वास और अपनत्व का रिश्ता और मजबूत होता है।

इस भव्य आयोजन में अनेक जनप्रतिनिधियों और विशिष्ट अतिथियों की मौजूदगी ने समारोह की गरिमा को और बढ़ा दिया। कार्यक्रम में विधायक त्रिलोक सिंह चीमा, पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा, जसपुर के कांग्रेस विधायक आदेश चौहान, रुद्रपुर के विधायक शिव अरोरा, जसपुर के पूर्व विधायक डा शैलेंद्र मोहन सिंघल, भाजपा जिला अध्यक्ष मनोज पाल, उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी, पीसीयू चेयरमैन राम मेहरोत्रा, पूर्व जिला अध्यक्ष एवं भाजपा प्रदेश सचिव गुंजन सुखीजा, रुद्रपुर मेयर विकास शर्मा, काशीपुर की प्रथम महिला उर्वशी दत्त बाली, ब्लॉक प्रमुख चंद्रप्रभा, महिला आयोग की अध्यक्ष सायरा बानो, मुक्ता सिंह, पंकज टंडन, अमन बाली, मुकेश चावला, प्रमोद मिश्रा, राशिद फारूकी, महेश अग्रवाल, सादिक हुसैन, पार्षद बीना नेगी, चौधरी समरपाल सिंह, जसवीर सिंह सैनी, मदन मोहन पंत, संजय भाटिया, सीमा चौहान, मंजू यादव, गूलरभोज के अध्यक्ष सतीश चुघ, कायस्थ सभा के अध्यक्ष अभिताभ सक्सेना एडवोकेट, उद्यमी अश्वनी छाबड़ा, पार्षद पुष्कर बिष्ट, महेंद्र खुराना, विकास जिंदल, केपी सिंह, पार्षद सुरेश सैनी, मनोज बाठला, बांके गोयंका, संजय अग्रवाल, ब्राह्मी गोयल, अंशुल जिंदल, विनीत सेंगर, अजय चाहल, सुधा शर्मा, मुकेश पाहवा, दिलीप मेहरोत्रा, सुधा राय, मोनिका गुप्ता, प्रेमलता, मनजीत सिंह, राज, दीपिका, मधुर और वेद प्रकाश तिवारी सहित अनेक सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े लोग उपस्थित रहे। इन सभी की सहभागिता ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह आयोजन केवल एक नगर का कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर बन चुका था।
प्रशासनिक स्तर पर भी इस रंगोत्सव की व्यवस्थाएं सराहनीय रहीं। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी की निगरानी में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया था, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण और व्यवस्थित रूप से संपन्न हो सका। नगर आयुक्त रविंद्र सिंह बिष्ट, सहायक नगर आयुक्त विनोद कुमार, कार्यालय अधीक्षक विकास शर्मा, नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर अमरजीत सिंह साहनी और सफाई निरीक्षक मनोज बिष्ट सहित तमाम वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी ने यह सुनिश्चित किया कि साफ-सफाई, यातायात और सुरक्षा से जुड़ी किसी भी व्यवस्था में कमी न रहे। नगर निगम प्रांगण और आसपास के क्षेत्रों में विशेष साफ-सफाई अभियान चलाया गया, जिससे कार्यक्रम स्थल स्वच्छ और आकर्षक बना रहा। प्रशासन और नगर निगम के बीच बेहतर समन्वय ने यह साबित कर दिया कि बड़े आयोजनों को भी सुचारु रूप से संपन्न किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, काशीपुर में आयोजित यह रंगोत्सव केवल होली का कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता और जनप्रतिनिधियों व जनता के बीच मजबूत होते रिश्तों का प्रतीक बन गया। इस आयोजन ने यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया कि जब परंपरा, संस्कृति और जनभावनाएं एक साथ मिलती हैं, तो वे इतिहास रचने का काम करती हैं। रंगों, संगीत और अपनत्व से भरा यह दिन काशीपुर की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेगा और आने वाले समय में ऐसे आयोजनों के लिए एक प्रेरणा बनेगा।

रंगोत्सव के माध्यम से काशीपुर ने यह भी दिखा दिया कि जब स्थानीय नेतृत्व, प्रशासन और समाज एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी आयोजन केवल औपचारिक कार्यक्रम न रहकर जनआस्था और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन जाता है। इस आयोजन में यह साफ देखने को मिला कि किस प्रकार नगर के हर वर्ग ने अपनी भूमिका निभाई। पार्षदों से लेकर सामाजिक संगठनों, व्यापारिक वर्ग से लेकर युवाओं और महिलाओं तक, सभी ने मिलकर इस उत्सव को सफल बनाने में योगदान दिया। कार्यक्रम स्थल पर अनुशासन, आपसी सहयोग और सकारात्मक माहौल ने यह साबित कर दिया कि बड़े आयोजनों को भी शालीनता और मर्यादा के साथ संपन्न किया जा सकता है। लोकसंस्कृति से जुड़े कलाकारों को मंच मिलने से न केवल उनकी कला को सम्मान मिला, बल्कि युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर भी प्राप्त हुआ। रंगोत्सव के दौरान पारंपरिक गीतों, नृत्यों और लोकधुनों के माध्यम से यह संदेश गया कि आधुनिकता के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजना भी उतना ही जरूरी है। लोगों ने इस आयोजन को केवल एक दिन का उत्सव नहीं माना, बल्कि इसे सामाजिक एकता और सामूहिक आनंद के रूप में स्वीकार किया। पूरे कार्यक्रम के दौरान अनुशासन, सुरक्षा और स्वच्छता पर जो विशेष ध्यान दिया गया, उसने नगर निगम और प्रशासन की कार्यशैली की भी सकारात्मक छवि प्रस्तुत की। यही कारण रहा कि आयोजन समाप्त होने के बाद भी नागरिकों के बीच इस रंगोत्सव की चर्चा लंबे समय तक बनी रही।
इस ऐतिहासिक आयोजन ने काशीपुर को न केवल प्रदेश के सांस्कृतिक मानचित्र पर मजबूती से स्थापित किया, बल्कि भविष्य के लिए भी एक नई दिशा तय कर दी। लोगों के बीच यह भावना प्रबल हुई कि यदि इस प्रकार के आयोजन नियमित रूप से किए जाएं, तो सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास और अधिक मजबूत होगा। रंगोत्सव ने यह सिद्ध कर दिया कि उत्सव केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि वे समाज को जोड़ने, संवाद बढ़ाने और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने का माध्यम भी बनते हैं। इस आयोजन के बाद शहर में जिस तरह की सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली, उससे यह स्पष्ट है कि काशीपुर की जनता ऐसे आयोजनों को अपनाने और आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है। रंगों, संगीत और आपसी मेल-जोल से सजा यह पर्व आने वाले वर्षों में एक परंपरा का रूप ले सकता है, जो न केवल स्थानीय पहचान को मजबूत करेगा, बल्कि बाहरी लोगों के लिए भी काशीपुर को सांस्कृतिक दृष्टि से आकर्षक बनाएगा। कुल मिलाकर, यह रंगोत्सव केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि काशीपुर की सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक शक्ति का प्रतीक बन गया, जिसकी गूंज आने वाले समय तक महसूस की जाती रहेगी।





