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अमेरिका-बांग्लादेश डील से भारत के टेक्सटाइल सेक्टर और किसानों के लिए गहरा आर्थिक संकट

बांग्लादेश को जीरो टेरिफ मिलने के बाद भारत के कपास, यार्न और रेडीमेड गारमेंट उद्योगों पर गंभीर असर, किसानों और टेक्सटाइल सेक्टर के लिए अब नए आर्थिक झटके का खतरा

नई दिल्ली(सुनील कोठाराी)। अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हाल ही में हुई महत्वपूर्ण ट्रेड डील ने भारत के टेक्सटाइल सेक्टर के लिए गंभीर खतरे की घंटी बजा दी है। बांग्लादेश ने अमेरिका के साथ ऐसी व्यवस्था कर ली है, जिससे वह जीरो टेरिफ पर अपने रेडीमेड गारमेंट अमेरिका को निर्यात कर सकेगा। इस डील की खबर के साथ ही भारत के प्रमुख टेक्सटाइल कंपनियों जैसे गोकुल दास और केपीआर मिल्स के शेयरों में 5% तक गिरावट दर्ज की गई। कृषि क्षेत्र के बाद रोजगार के सबसे बड़े सेक्टर पर यह बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि भारत और अमेरिका के बीच अभी तक कोई फाइनल डील नहीं हुई है, लेकिन डील का फ्रेमवर्क तैयार हो चुका है। नौ महीने की लगातार बातचीत के बाद बांग्लादेश और अमेरिका ने अपनी डील को अंतिम रूप दे दिया। अब सवाल यह उठता है कि भारत अपने टेक्सटाइल सेक्टर को बचाने के लिए क्या कदम उठाएगा और क्या नई शर्तों पर बातचीत करेगा। बांग्लादेश को मिलने वाली बढ़त न सिर्फ अमेरिका में बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत के कपास और धागों के निर्यात को प्रभावित कर सकती है।

बांग्लादेश की यह रणनीति भारत के कपास किसानों और धागा बनाने वाली कंपनियों के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रही है। अमेरिका की नीति के तहत बांग्लादेश को अपनी तैयार गारमेंट्स पर कोई टेरिफ नहीं देना होगा, जबकि भारत को अमेरिका से अपने टेक्सटाइल निर्यात पर 18% टेरिफ का सामना करना पड़ेगा। यह न सिर्फ भारत के किसानों के लिए संकट पैदा करता है, बल्कि स्थानीय उद्योग और रोजगार पर भी भारी असर डाल सकता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में स्थित कपास और यार्न उद्योग इस बदलाव से सीधे प्रभावित होंगे। चीन के बाद बांग्लादेश दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक है और इसमें करीब 40 लाख लोग रोजगारित हैं। 2024 में बांग्लादेश ने अमेरिका को लगभग 7.5 अरब डॉलर का अपेरल निर्यात किया था। भारत को इस बदलते परिदृश्य में अपनी टेक्सटाइल नीति को मजबूत करने की आवश्यकता है, वरना देश के कपास और यार्न निर्यातकों के लिए गंभीर आर्थिक चुनौती उत्पन्न होगी।

हाल ही में भारत के कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह की भूमिका पर भी नजरें हैं। वे अक्सर अपने धर्म आधारित विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहते हैं, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या वे अपने टेक्सटाइल सेक्टर के हितों की रक्षा के लिए अमेरिका-बांग्लादेश डील पर मुखर होंगे या नहीं। सरकार की चुप्पी के कारण उद्योग जगत और किसानों में असंतोष बढ़ रहा है। वाइट हाउस ने फैक्ट शीट जारी की है, जिसमें बांग्लादेश डील की पूरी रणनीति और इसके प्रभाव की जानकारी दी गई है। फैक्ट शीट में स्पष्ट रूप से संकेत दिया गया है कि अमेरिका अपने निर्यातकों के हित में भारत और बांग्लादेश के बीच ट्रेड असमानताओं को दूर कर रहा है। इसका मतलब है कि भारत के कपास किसानों और टेक्सटाइल उद्योग को अमेरिका की इस नीति से नुकसान हो सकता है।

बांग्लादेश ने भारत से लगभग 80% कपास का आयात किया करता है, लेकिन अप्रैल 2025 में उसने जमीन के रास्ते कपास आयात पर रोक लगा दी। इससे भारत के निर्यातकों को समुद्री मार्ग से अधिक महंगे दामों पर निर्यात करना पड़ा। इसके अलावा बांग्लादेश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने भारत से आयातित कॉटन यार्न, ब्लेंडेड यार्न और ग्रे मिलांचेज पर 20% टेरिफ लगाने की मांग की थी। अमेरिका ने अब बांग्लादेश को अपने रेडीमेड गारमेंट निर्यात पर कोई टेरिफ नहीं लगाने की अनुमति दे दी है। इस कदम से भारत को अपने पड़ोसी देश में कपास और यार्न का बड़ा बाजार खोने का खतरा पैदा हो गया है। इस डील का सीधा असर भारत के कपास किसानों और टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ेगा।

भारत और अमेरिका के बीच हुई बातचीत में भी स्पष्ट अंतर सामने आया है। पिछले साल अगस्त में भारत ने अमेरिकी कपास आयात पर 11% शुल्क घटाकर शून्य कर दिया था, लेकिन अमेरिका ने भारत को अपने रेडीमेड कपड़ों पर जीरो टेरिफ की पेशकश नहीं की। इसके बजाय अंतरिम डील के फ्रेमवर्क के अनुसार भारत के टेक्सटाइल पर 18% टेरिफ लागू रहेगा। बांग्लादेश ने भारत से कपास खरीदना कम कर अमेरिकी बाज़ार की ओर रुख कर लिया, जिससे भारतीय किसानों और उद्योगपतियों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। मोदी सरकार और मंत्रियों के बयान असंगत प्रतीत हो रहे हैं, क्योंकि पीयूष गोयल ने हाल ही में प्रेस कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेश के साथ भारत के टेक्सटाइल पर टेरिफ को लेकर दावा किया था, जो अब पुराने साबित हो रहे हैं। अमेरिका की इस डील से केवल कपास उद्योग ही नहीं, बल्कि सोयाबीन, सेब और अन्य कृषि उत्पादों के लिए भी खतरे के संकेत मिले हैं। वाइट हाउस फैक्ट शीट में उल्लेख है कि भारत कुछ दालों से टेरिफ कम या समाप्त करेगा। इससे मध्य प्रदेश के किसानों पर असर पड़ सकता है, क्योंकि यह राज्य सोयाबीन और दाल उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत के कृषि मंत्री, वाणिज्य मंत्री और प्रधानमंत्री को इस बात का जवाब देना होगा कि क्या भारत के किसानों को इन नई नीतियों से सुरक्षा मिलेगी या नहीं।

रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाया है। वाइट हाउस फैक्ट शीट में साफ लिखा गया है कि भारत ने रूस से तेल नहीं खरीदने का वादा किया है। इस पर किसी भी मंत्री ने स्पष्ट बयान नहीं दिया। विदेश सचिव विक्रम मिश्री ने भी अस्पष्ट जवाब दिया। अमेरिका भारत से यह अपेक्षा कर रहा है कि वह उसके दिशा-निर्देशों के अनुसार व्यापार नीति और ऊर्जा नीति तय करे। इस डील के तहत अगर भारत रूस से तेल खरीदता है, तो अमेरिका 25% अतिरिक्त टेरिफ लगाने की धमकी दे सकता है। इस कदम से भारत के किसानों, उद्योगपतियों और आम जनता पर गंभीर आर्थिक असर पड़ने की संभावना है। अमेरिका की इस नीति का उद्देश्य अपने घरेलू उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुरक्षित रखना है। फैक्ट शीट में अमेरिका ने यह स्पष्ट किया कि यह डील व्यापारिक अन्यायपूर्ण नियमों से मुक्त होने के लिए है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और उनके मंत्री अपने देश के निर्यातकों के हित में दुनिया के बाजारों से टेरिफ कम करवा रहे हैं। भारत के उद्योगपतियों और किसानों के हितों के विपरीत यह कदम प्रभावी साबित हो रहा है। भारत के मंत्री और सरकारी अधिकारी इस डील पर पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं दिख रहे हैं।

भारतीय मीडिया और अखबारों में इस डील के प्रभाव को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाया जा रहा। वाइट हाउस फैक्ट शीट में बांग्लादेश और भारत के बीच होने वाले अंतर और टेरिफ की जानकारी स्पष्ट रूप से दी गई है। कांग्रेस के नेताओं ने कहा कि भारत के कृषि और टेक्सटाइल सेक्टर के लिए यह डील गंभीर संकट पैदा कर सकती है। बांग्लादेश को जीरो टेरिफ देने के बाद ट्रंप ने भारत के टेक्सटाइल मार्केट को चुनौती दी है। भारत के किसानों और उद्योगपतियों को इस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। भारत की मुद्रा, बजट और व्यापार नीति पर भी इस डील का प्रभाव दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने भारत को एक ऐसी स्थिति में खड़ा किया है, जिसमें उसे अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। अमेरिका के राष्ट्रपति और उनके मंत्री अपने देश के हितों के अनुसार भारत को मार्गदर्शन दे रहे हैं। भारत के मंत्री और अधिकारी इस स्थिति में प्रतिक्रिया देने में असमर्थ दिख रहे हैं। फैक्ट शीट में अमेरिकी दृष्टिकोण से स्पष्ट किया गया है कि भारत के लिए यह डील चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।

इस डील के कारण भारत के कृषि, टेक्सटाइल और निर्यात उद्योग के लिए गंभीर आर्थिक जोखिम उत्पन्न हो गया है। किसानों को नई चुनौतियों का सामना करना होगा और उद्योगपतियों को अपने निर्यात और उत्पादन रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा। भारत के मंत्री और सरकारी अधिकारी इस स्थिति पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। वाइट हाउस फैक्ट शीट में डील की व्यापक जानकारी दी गई है और यह भारत के लिए एक चेतावनी के रूप में है। अमेरिका ने इस डील के माध्यम से अपने देश के निर्यातकों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाई हैं। भारत के लिए यह डील चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इसे अपने किसानों और उद्योगपतियों के हितों की रक्षा करनी होगी। बांग्लादेश को मिलने वाली बढ़त से भारत को अपने टेक्सटाइल और कृषि सेक्टर में नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके लिए सरकार को नई रणनीति और कड़े कदम उठाने होंगे। कुल मिलाकर, अमेरिका-बांग्लादेश डील ने भारत के टेक्सटाइल सेक्टर, किसानों और निर्यात उद्योग के लिए गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। यह डील व्यापार, कृषि और उद्योग नीति में संतुलन बनाए रखने के लिए भारत के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है। सरकार और मंत्री इस पर सक्रिय प्रतिक्रिया दें, ताकि देश के आर्थिक हितों की रक्षा की जा सके और किसानों और उद्योगपतियों के लिए नुकसान को रोका जा सके।

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