spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडद्रोणासागर तीर्थ में अवैध कब्जा विवाद तीर्थ की पवित्रता और आस्था खतरे...

द्रोणासागर तीर्थ में अवैध कब्जा विवाद तीर्थ की पवित्रता और आस्था खतरे में

काशीपुर में द्रोणासागर तीर्थ क्षेत्र में कथित अतिक्रमण और नियमों की अनदेखी को लेकर ट्रस्ट और संगठनों ने अलर्ट जारी किया, आस्था, इतिहास और धार्मिक विरासत की सुरक्षा के लिए विरोध तेज किया गया।

काशीपुर। काशीपुर नगर के प्राचीन, पौराणिक और ऐतिहासिक तीर्थ द्रोणासागर को लेकर उपजा विवाद अब केवल स्थानीय असंतोष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और कानून के पालन से जुड़ा एक गंभीर जनमुद्दा बनता जा रहा है। शहर के हृदय में स्थित इस तीर्थ को महाभारत कालीन परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है और वर्षों से यह श्रद्धालुओं, साधु-संतों व इतिहास प्रेमियों की आस्था का केंद्र रहा है। हाल के दिनों में द्रोणासागर क्षेत्र में कथित अवैध गतिविधियों, अतिक्रमण और नियमों की अनदेखी के आरोपों ने माहौल को गर्मा दिया है। श्री डमरू वाले बाबा मंदिर ट्रस्ट सहित अनेक धार्मिक व सामाजिक संगठनों ने खुलकर यह आरोप लगाया है कि तीर्थ की पवित्रता से खिलवाड़ किया जा रहा है और प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई जा रही। संगठनों का कहना है कि यह मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि काशीपुर की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान से सीधा जुड़ा हुआ है, जिसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं पड़ने दिया जाएगा।

जानकारी के अनुसार, श्री डमरू वाले बाबा मंदिर ट्रस्ट और उनसे जुड़े संगठनों ने काशीपुर डेवलपमेंट फोरम के अध्यक्ष राजीव घई पर तीर्थ भूमि पर अवैध कब्जे और नियमों की अवहेलना के गंभीर आरोप लगाए हैं। ट्रस्ट का दावा है कि वर्ष 2022 से लगातार ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं, जो न केवल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियमों के विरुद्ध हैं, बल्कि धार्मिक भावनाओं को भी आहत करने वाले हैं। आरोप है कि 22 जनवरी 2022 को शंभूनाथ से मात्र 600 वर्गमीटर भूमि की विधिवत रजिस्ट्री कराई गई थी, लेकिन वर्तमान स्थिति में उस क्षेत्र से कहीं अधिक, लगभग 1000 वर्गमीटर से भी ज्यादा भूमि पर कब्जा कर लिया गया है। ट्रस्ट पदाधिकारियों का कहना है कि इस प्रकार का विस्तार बिना किसी वैधानिक अनुमति के किया गया, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है। उनका यह भी कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से की गई, ताकि बाद में इसे वैध रूप देने का प्रयास किया जा सके।

धार्मिक संगठनों का यह भी कहना है कि जिस भूमि को लेकर विवाद खड़ा हुआ है, वह गोविषाण टीले की परिधि में आती है, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। एएसआई के नियमों के तहत किसी भी संरक्षित स्मारक या स्थल के 100 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री, निर्माण, खुदाई या अन्य गतिविधियां पूरी तरह प्रतिबंधित हैं। इसके बावजूद, बिना एएसआई और स्थानीय प्रशासन की स्वीकृति के बाउंड्रीवाल और कार्यालय का निर्माण कराए जाने का आरोप सामने आया है। ट्रस्ट का कहना है कि यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई कार्रवाई है, जिससे भविष्य में इस ऐतिहासिक स्थल की मूल संरचना और महत्व को नुकसान पहुंच सकता है। संगठनों ने चेताया है कि यदि इस तरह की गतिविधियां जारी रहीं तो द्रोणासागर की पहचान केवल कागजों तक सिमट कर रह जाएगी।

आरोपों की कड़ी यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि शिकायतकर्ताओं ने यह भी कहा है कि उक्त भूमि पर धनुर्विद्या प्रशिक्षण के नाम पर गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। उनका दावा है कि इस तरह के किसी भी प्रशिक्षण या आयोजन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य था, जो नहीं ली गई। ट्रस्ट का कहना है कि ऐतिहासिक और संरक्षित स्थल पर इस प्रकार की गतिविधियां न केवल नियमों का उल्लंघन हैं, बल्कि स्थल की गरिमा के भी खिलाफ हैं। इसके साथ ही एएसआई कार्यालय से सटे चिल्ड्रन पार्क पर काशीपुर डेवलपमेंट फोरम का बोर्ड लगाए जाने का भी आरोप लगाया गया है, जिसे ट्रस्ट ने अवैध कब्जे का एक और उदाहरण बताया है। संगठनों का कहना है कि धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि भविष्य में किसी भी विरोध को दबाया जा सके।

मामले को और अधिक गंभीर बनाते हुए, श्री डमरू वाले बाबा मंदिर ट्रस्ट ने 2 दिसंबर 2024 की घटना का उल्लेख किया है, जिसे उन्होंने तीर्थ की पवित्रता पर सीधा हमला बताया। ट्रस्ट के अनुसार, उस दिन मंदिर प्रांगण में जेसीबी मशीन लगाकर फलदार और जंगली वृक्षों की कटाई कराई गई। इसके साथ ही बिना किसी वैधानिक अनुमति के खनन कर मिट्टी उठाई गई, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा, बल्कि मंदिर परिसर की धार्मिक शांति भी भंग हुई। ट्रस्ट का दावा है कि जब इस कार्रवाई का विरोध किया गया तो ट्रस्ट पदाधिकारियों और श्रद्धालुओं के साथ गाली-गलौच की गई और जान से मारने की धमकियां भी दी गईं। इस घटना के बाद से स्थानीय लोगों में रोष व्याप्त है और वे स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

ट्रस्ट पदाधिकारियों का कहना है कि इन सभी घटनाओं की जानकारी उन्होंने कई बार लिखित रूप में उपजिलाधिकारी काशीपुर को दी, लेकिन अब तक न तो कोई ठोस जांच की गई और न ही कोई प्रभावी कार्रवाई सामने आई। उनका आरोप है कि शिकायतों को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें नजरअंदाज किया गया, जिससे अतिक्रमण करने वालों के हौसले और बढ़ गए। ट्रस्ट का यह भी कहना है कि प्रशासनिक चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं और आम नागरिकों में यह संदेश गया है कि कानून सबके लिए समान नहीं है। शिकायतकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। अब मामला इस स्तर तक पहुंच गया है कि धार्मिक संगठनों को सड़कों पर उतरने की तैयारी करनी पड़ रही है।

एक और गंभीर आरोप यह भी लगाया गया है कि प्रशासनिक स्तर पर उल्टे अतिक्रमणकर्ता को अतिरिक्त 1000 वर्गमीटर भूमि देने का प्रयास किया जा रहा है। ट्रस्ट का कहना है कि यह कदम सरकार द्वारा चलाए जा रहे धार्मिक अतिक्रमण विरोधी अभियान की भावना के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने सवाल उठाया है कि जब एक ओर धार्मिक स्थलों से अवैध कब्जे हटाने की बात की जा रही है, तो दूसरी ओर एक प्राचीन तीर्थ की भूमि को बढ़ाकर देना किस नीति का संकेत है। संगठनों का कहना है कि यदि यह निर्णय लागू होता है, तो यह भविष्य में अन्य धार्मिक स्थलों के लिए भी एक गलत उदाहरण स्थापित करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार के किसी भी निर्णय को वे न्यायालय और जन आंदोलन के माध्यम से चुनौती देंगे।

धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने इस पूरे प्रकरण को केवल स्थानीय विवाद न मानते हुए इसे सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का प्रश्न बताया है। उनका कहना है कि द्रोणासागर केवल एक जलाशय या भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था, परंपरा और इतिहास का प्रतीक है। यदि आज इसके साथ समझौता किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपने अतीत से कट जाएंगी। ट्रस्ट ने यह भी कहा है कि विकास के नाम पर यदि नियमों को ताक पर रखा जाएगा, तो उसका परिणाम विनाशकारी होगा। उनका मानना है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन बनाना ही किसी भी सभ्य समाज की पहचान होती है।

इसी क्रम में, श्री डमरू वाले बाबा मंदिर ट्रस्ट ने सभी धार्मिक व सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों, युवाओं, व्यापारियों, जनप्रतिनिधियों और आस्थावान नागरिकों से द्रोणासागर की पवित्रता और धार्मिक स्वरूप की रक्षा के लिए एकजुट होने की अपील की है। ट्रस्ट का कहना है कि यह लड़ाई किसी एक संगठन की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि जरूरत पड़ी तो शांतिपूर्ण आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और कानूनी लड़ाई के सभी विकल्प अपनाए जाएंगे। उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करना नहीं, बल्कि तीर्थ की गरिमा और कानून के सम्मान को बनाए रखना है।

अंत में, ट्रस्ट ने दो टूक शब्दों में कहा है कि द्रोणासागर की मूल पहचान को बदलने या उसकी पवित्रता से समझौता करने का कोई भी प्रयास किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनका कहना है कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए उनका संघर्ष जारी रहेगा, चाहे इसके लिए कितनी ही लंबी लड़ाई क्यों न लड़नी पड़े। स्थानीय नागरिकों का भी मानना है कि यदि समय रहते इस मामले का निष्पक्ष समाधान नहीं निकाला गया, तो यह विवाद और गहराएगा। अब सभी की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि द्रोणासागर की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत सुरक्षित रह पाएगी या नहीं।

संबंधित ख़बरें
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!