नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। नए साल की दस्तक के साथ देश भर में उत्साह और उम्मीद का माहौल बनता दिख रहा है, लेकिन इस उत्सव के ठीक पहले बीतते वर्ष की परछाइयाँ भारत के सामने कई गहरे सवाल छोड़ जाती हैं। वर्ष 2025 की विदाई केवल कैलेंडर का पन्ना पलटना नहीं है, बल्कि यह उस दौर का लेखा-जोखा भी है, जिसने भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दिशा को नए सिरे से परिभाषित किया। बीते वर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश की अर्थव्यवस्था केवल आंकड़ों और घोषणाओं से नहीं चलती, बल्कि वैश्विक दबावों, कूटनीतिक उलझनों और घरेलू असमानताओं के बीच संतुलन साधना एक कठिन चुनौती बन चुका है। जिस समय नया साल आने वाला है, उसी समय यह सवाल भी खड़ा होता है कि भारत वास्तव में किस मोड़ पर खड़ा है और आगे का रास्ता कितना आसान या कठिन होने वाला है।
बीते साल की सबसे बड़ी आर्थिक सच्चाइयों में से एक रही रुपये की गिरती स्थिति, जिसे संभालने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक को अभूतपूर्व कदम उठाने पड़े। पहली बार ऐसा हुआ जब रुपये को डॉलर के मुकाबले 100 के आंकड़े से नीचे रखने के लिए लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य के डॉलर बाजार में बेचने पड़े। यह स्थिति केवल मुद्रा विनिमय की कहानी नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक राजनीति, अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव, टैरिफ विवाद और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती अनिश्चितता की लंबी श्रृंखला जुड़ी हुई है। आईएमएफ की रिपोर्ट ने भी इस दौर में भारत के आर्थिक आंकड़ों पर सवाल उठाए और यह संकेत दिया कि विकास की तस्वीर के पीछे कई कमजोरियाँ छिपी हुई हैं। रुपये की कीमत 75 से 90 के स्तर तक फिसलती रही, लेकिन सरकार के माथे पर कोई खास शिकन नहीं दिखी, जिसने आम जनता के भीतर चिंता और असमंजस दोनों को जन्म दिया।
आर्थिक उपलब्धियों की बात करें तो सरकार ने यह दावा किया कि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और 2030 तक तीसरे स्थान पर पहुंच जाएगा। यह घोषणा सुनने में जितनी भव्य लगती है, जमीनी हकीकत उतनी ही जटिल दिखाई देती है। देश की औसत आय घटकर 2013 के स्तर से भी नीचे पहुंच गई, जबकि महंगाई और मुद्रास्फीति लगातार बढ़ती रही। प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा जब 90 प्रतिशत आबादी के लिए देखा जाता है, तो तस्वीर चिंताजनक नजर आती है, जहां बड़ी आबादी की सालाना आय एक लाख रुपये से भी कम रह गई। इस असमानता के बीच विकास का ढिंढोरा पीटा गया और आंकड़ों की बाजीगरी ने वास्तविक समस्याओं को ढकने का काम किया, जिससे आर्थिक तरक्की और आम आदमी की हालत के बीच की खाई और चौड़ी हो गई।
सामाजिक स्तर पर भारत की पहचान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक अलग ही रूप में उभरती दिखी। दुनिया के विभिन्न देशों में रोजगार की तलाश में जाने वाले भारतीयों की संख्या चीन से भी आगे निकल गई और करोड़ों की तादाद में लोग विदेशों में बसने लगे। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप जैसे देशों में भारतीय समुदाय की मौजूदगी बढ़ी, लेकिन इसके साथ ही भारत की सामाजिक छवि पर भी सवाल उठे। 2014 के बाद से जिस सेकुलर और सर्वधर्म समभाव की पहचान पर देश गर्व करता था, वह अंतरराष्ट्रीय विमर्श में धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई दी। विदेशी मीडिया और रिपोर्टों में भारत के सामाजिक ताने-बाने पर उठते सवाल यह संकेत देने लगे कि देश के भीतर बदलती परिस्थितियाँ अब वैश्विक नजरों से छिपी नहीं रहीं।
रईसों की बढ़ती तादाद और उनके देश छोड़ने की प्रवृत्ति भी 2025 की एक अहम कहानी बनकर सामने आई। आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के कुल अरबपतियों में लगभग 60 प्रतिशत भारतीय मूल के लोग अब भारत के बाहर रहकर कारोबार कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत फैसलों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे टैक्स, नीतिगत सहूलियतें और सरकारी संरक्षण जैसी कई वजहें जुड़ी हुई हैं। वहीं दूसरी ओर, आम नागरिक के लिए कर्ज और आर्थिक दबाव लगातार बढ़ता गया। बैंकों से बड़े उद्योगपतियों को दिए गए कर्ज का बड़ा हिस्सा वापस नहीं आया और सरकार को बैंकों की बैलेंस शीट सुधारने के लिए 25 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि झोंकनी पड़ी, जिससे आर्थिक असमानता और गहरी हो गई। भूख और गरीबी के सवाल पर भी 2025 ने कई विरोधाभास उजागर किए। एक ओर गरीब कल्याण योजना के तहत पांच किलो अनाज बांटने की घोषणा से सरकार ने वाहवाही बटोरी, वहीं दूसरी ओर आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों ने भारत को आर्थिक सहायता और कर्ज के बड़े बाजार के रूप में चिन्हित किया। यह स्थिति दर्शाती है कि गरीबी राहत के नाम पर दी जा रही मदद के पीछे भी वैश्विक वित्तीय संस्थानों की रणनीतियाँ काम कर रही हैं, जिनका उद्देश्य भारत को एक बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में और अधिक मजबूत करना है।
राजनीतिक माहौल की बात करें तो 2025 में पहली बार नफरत, हमलों और असहिष्णुता की घटनाओं ने खुलकर सुर्खियाँ बटोरीं। दुनिया के अखबारों में भारत की गवर्नेंस प्रणाली पर सवाल उठने लगे और लोकतंत्र की स्थिति को लेकर चिंता जाहिर की गई। वैचारिक स्तर पर संघ की सोच को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तानाशाही प्रवृत्तियों से जोड़कर देखा गया, जो भारत की पारंपरिक लोकतांत्रिक छवि से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है। इस बदलाव ने न केवल देश के भीतर बल्कि विदेशों में भी भारत की साख पर असर डाला। इन तमाम नकारात्मकताओं के बीच यह भी सच है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उभरता बाजार बना हुआ है। देश के पास युवा आबादी, विशाल उपभोक्ता वर्ग और कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते हैं, जो भविष्य में आर्थिक विकास की संभावनाओं को मजबूत करते हैं। हालांकि न्यूजीलैंड जैसे देशों में भारत के साथ फ्री ट्रेड को लेकर राजनीतिक बहस यह दिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय साझेदारी भी अब पहले जितनी सहज नहीं रही। दुनिया बदल रही है और भारत को अपनी रणनीति बार-बार पुनः परिभाषित करनी पड़ रही है।
वैश्विक कूटनीति के मोर्चे पर 2025 एक निर्णायक वर्ष साबित हुआ। क्वाड की बैठक से लेकर बीजिंग में राजदूतों की मुलाकात तक, चीन और अमेरिका के बीच बदलते समीकरणों ने भारत की भूमिका को जटिल बना दिया। एक ओर भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मंच साझा करता दिखा, तो दूसरी ओर चीन की राजधानी में क्वाड से जुड़ी बैठक ने यह संकेत दिया कि वैश्विक राजनीति में विरोध और सहयोग की रेखाएँ धुंधली हो चुकी हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में अनिश्चितता और बढ़ गई। टैरिफ विवाद, व्यापार समझौतों में अड़चन और पाकिस्तान के मुद्दे पर अमेरिका की भूमिका ने भारत को असहज स्थिति में ला खड़ा किया। वहीं चीन ने भी यह दावा कर दिया कि अगर वह बीच में न आता तो भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध और लंबा खिंच सकता था। इस बयान ने एशिया की राजनीति में भारत की रणनीतिक स्थिति पर नए सवाल खड़े कर दिए। रूस और यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजराइल तनाव और ब्रिक्स को लेकर अमेरिका की चेतावनियों के बीच भारत हर मंच पर संतुलन साधने की कोशिश करता दिखा। गुटनिरपेक्ष आंदोलन, जिसकी अगुवाई कभी भारत करता था, अब इतिहास के पन्नों में सिमटता नजर आया। 2014 में संयुक्त राष्ट्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आतंकवाद पर दिया गया भाषण आज भी याद किया जाता है, लेकिन बदली परिस्थितियों में उसकी प्रासंगिकता पर बहस जारी है।
पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की तस्वीर भी मिश्रित रही। अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखने को मिले। आर्थिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के बावजूद यह सवाल बना रहा कि संकट के समय कौन सा देश वास्तव में भारत के साथ खड़ा है। आर्थिक असमानता का असर बाजारों पर भी साफ दिखा। सोने और चांदी की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल दर्ज किया गया, जहां 24 कैरेट सोना 7,600 रुपये से बढ़कर 13,399 रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गया और चांदी भी कई गुना महंगी हो गई। यह बढ़ोतरी केवल निवेश का संकेत नहीं थी, बल्कि आम आदमी की जेब पर बढ़ते दबाव की कहानी भी कहती थी। बैंकों में जमा धन और रईसों को दिए गए कर्ज के बीच का अंतर और गहरा होता गया। कर्ज माफी और राइट-ऑफ की नीतियों ने बैंकों को संभाला, लेकिन आम नागरिक को राहत कम ही मिली। बजट का बड़ा हिस्सा प्रचार-प्रसार पर खर्च होने लगा, जो हर साल बढ़ता गया और विकास योजनाओं की वास्तविक प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता गया।
लोकतंत्र की स्थिति पर भी 2025 ने कई चिंताजनक दृश्य दिखाए। चुनाव आयोग, वोटर लिस्ट और मशीनों को लेकर विवाद सामने आए। राजीव कुमार के बाद ज्ञानेश कुमार का नाम चर्चा में आया और संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठे। देश ने पहली बार मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंके जाने जैसी घटना भी देखी, जिस पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया ने नए विमर्श को जन्म दिया। संस्कृति और मनोरंजन की दुनिया भी राजनीति से अछूती नहीं रही। बॉलीवुड से लेकर क्रिकेट तक, हर क्षेत्र में वैचारिक प्रभाव नजर आया। विराट कोहली, रोहित शर्मा और गौतम गंभीर जैसे नाम भी इस बहस का हिस्सा बने, जहां खेल और सिनेमा के माध्यम से विचारधाराएँ परोसी जाती रहीं और तालियों के बीच असल मुद्दे दबते चले गए। साल के अंत में जब 2026 की ओर कदम बढ़ रहे हैं, तो 2025 की सीख यही है कि जश्न के साथ सावधानी भी जरूरी है। भारत आगे बढ़ रहा है, लेकिन यह प्रगति कई सवालों और चुनौतियों से घिरी हुई है। नए साल की रोशनी में कदम रखते समय यह समझना जरूरी है कि बीते वर्ष की सच्चाइयों को नजरअंदाज किए बिना ही भविष्य की दिशा तय की जा सकती है।



