कोलकाता। दुर्गा पूजा, पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक, आज केवल राज्य या देश तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह विश्वभर में भारतीय अस्मिता का उत्सव बन चुकी है। इसकी सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक गूंज इतनी गहरी है कि इसे यूनेस्को ने ‘ग्लोबल इंटैन्जिबल कल्चरल हेरिटेज ऑफ ह्यूमैनिटी’ में शामिल किया है। कोलकाता, जिसे ‘सिटी ऑफ जॉय’ कहा जाता है, इस पर्व का केंद्र बिंदु है जहां लगभग एक सप्ताह तक उत्सव का जोश चरम पर रहता है। लेकिन इसका प्रभाव केवल इन दिनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और पर्यावरण दोनों पर इसका गहरा असर पड़ता है। यही कारण है कि अब इस उत्सव को सामाजिक विकास का माध्यम बनाने के लिए वैज्ञानिक और सामाजिक संस्थान एकजुट हो रहे हैं, ताकि उल्लास और उत्तरदायित्व के बीच संतुलन कायम किया जा सके।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रव्यापी अभियान से प्रेरणा लेते हुए कोलकाता स्थित वेरिएबल एनर्जी साइकलोट्रॉन सेंटर (वीईसीसी), जो परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन एक प्रमुख अनुसंधान संस्थान है, ने “स्वच्छोत्सव” थीम पर आधारित “स्वच्छता ही सेवा अभियान 2025” के अंतर्गत एक विशाल जनजागरण अभियान शुरू किया। इस पहल का उद्देश्य दुर्गा पूजा को पर्यावरण के अनुकूल, टिकाऊ और स्वच्छ तरीके से मनाने की संस्कृति को बढ़ावा देना था। इस अभियान में न केवल पूजा समितियों बल्कि उन समुदायों को भी जोड़ा गया जिनकी आजीविका इस पर्व से जुड़ी हुई है। लगभग 160 से अधिक पूजा आयोजकों, मूर्तिकारों, पुजारियों, कारीगरों, विसर्जन कर्मियों और सफाई मित्रों से संवाद स्थापित कर उन्हें इस दिशा में जागरूक किया गया। अभियान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि पूजा का उल्लास बना रहे, परंतु उसके साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी निभाई जाए।

इस महत्वपूर्ण पहल में रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3291 तथा इसके सहयोगी क्लबों — रोटरी क्लब ऑफ डम डम और रोटरी क्लब ऑफ ईस्ट कोलकाता — ने नेतृत्व करते हुए एक संगठित ढांचा विकसित करने का प्रस्ताव रखा, ताकि दुर्गा पूजा के स्थायी और संतुलित आयोजन के लिए जनसहभागिता को नई दिशा दी जा सके। इस प्रयास में वीईसीसी ने वैज्ञानिक सलाहकार की भूमिका निभाई, जबकि जादवपुर विश्वविद्यालय को ज्ञान साझेदार के रूप में शामिल किया गया। इस पूरी पहल के दौरान केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को आधार बनाते हुए समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद स्थापित किया गया, ताकि पर्यावरणीय नियमों के तहत उत्सवों को अधिक जिम्मेदारी के साथ मनाने की आदत विकसित की जा सके।
इस अभियान में वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, रोटेरियनों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों का उत्साहपूर्ण योगदान देखने को मिला। त्योहार के दिनों में विशेष रूप से तैयार किए गए थीम सॉन्ग और स्वच्छता संदेशों को वेब प्लेटफॉर्म और एफएम रेडियो चैनलों के माध्यम से प्रसारित किया गया, जिससे यह संदेश कोलकाता के हर कोने तक पहुंचा। इस जागरूकता अभियान ने दुर्गा पूजा को केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की मिसाल बना दिया। पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जुड़ा यह अनूठा प्रयास ‘सिटी ऑफ जॉय’ को एक नए अध्याय की ओर ले गया, जहां परंपरा और पर्यावरणीय चेतना का सुंदर संगम देखने को मिला।

कार्यक्रम के समापन के बाद अब व्यापक स्तर पर एक स्थायित्व अध्ययन शुरू किया गया है, जिसमें पूजा पंडालों में प्रयुक्त सामग्रियों की आपूर्ति श्रृंखला की समीक्षा की जा रही है। इसके साथ ही, मूर्ति विसर्जन से पहले और बाद में विभिन्न घाटों से जल के नमूने एकत्र किए जा रहे हैं, ताकि उनके विश्लेषण से यह समझा जा सके कि त्योहार के दौरान पर्यावरण पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ता है। इन अध्ययनों के परिणाम संबंधित प्राधिकरणों को सौंपे जाएंगे ताकि वे आवश्यकतानुसार मौजूदा नियमों में संशोधन कर सकें या नई नीतियां तैयार कर सकें। यह पहल न केवल स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सशक्त कदम है, बल्कि यह दर्शाती है कि विज्ञान और समाज साथ मिलकर परिवर्तन की दिशा तय कर सकते हैं।
इस आयोजन के तहत 4 नवंबर 2025 को जादवपुर विश्वविद्यालय परिसर स्थित त्रिगुणा सेन सभागार में एक विशेष सम्मान समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें “स्वच्छोत्सव” में योगदान देने वाले व्यक्तियों और समूहों को सम्मानित किया जाएगा। विशेष रूप से सफाई कर्मियों को उनके अथक प्रयासों के लिए सम्मानित करने की तैयारी की गई है, ताकि समाज में स्वच्छता सैनिकों के प्रति सम्मान की भावना और गहरी हो सके। यह पहल दर्शाती है कि वैज्ञानिक संस्थान केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के वाहक भी बन सकते हैं।

28 अक्टूबर को वीईसीसी कोलकाता में आयोजित प्रेस मीट में कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और समिति के सदस्य उपस्थित रहे। इस अवसर पर डॉ. सुमित सोम, निदेशक वीईसीसी, ने इस अभियान को वैज्ञानिक सोच और सामाजिक उत्तरदायित्व का संगम बताया। चिन्मय नंदी, स्वच्छता समिति के अध्यक्ष, ने कहा कि यह पहल आने वाले वर्षों में अन्य त्योहारों के लिए भी प्रेरणा बनेगी। डॉ. तिलक घोष, सचिव स्वच्छता समिति, ने इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज तभी विकसित होगा जब उत्सव और पर्यावरण दोनों में संतुलन कायम रहेगा। सुमन गुहा, संयुक्त सचिव, डॉ. सुजॉय चटर्जी, सदस्य, डॉ. त्रिजित कुमार मैती और डॉ. अरिंदम सिकदर, आमंत्रित सदस्य, के साथ-साथ नंद दास और चंदन रथ जैसे सदस्य भी इस कार्यक्रम में शामिल रहे।

यह पहल वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक संवेदना का अद्भुत संगम है, जो आने वाले समय में टिकाऊ विकास का सशक्त उदाहरण बनेगी। जब विज्ञान, समाज और संस्कृति एक समान उद्देश्य के लिए एकजुट होते हैं, तब परिवर्तन की वह शक्ति जन्म लेती है जो केवल एक शहर ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को नई दिशा देती है। दुर्गा पूजा की भव्यता के बीच यह अभियान इस विचार का प्रतीक बन गया है कि उत्सव का अर्थ केवल आनंद तक सीमित नहीं, बल्कि इसमें एक गहरी जिम्मेदारी निहित है — एक स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की जिम्मेदारी। इस ऐतिहासिक पहल में जादवपुर विश्वविद्यालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्षेत्रीय निदेशालय कोलकाता, और रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3291 ने भागीदारी निभाकर इसे सशक्त दिशा प्रदान की है।



