काशीपुर। 125 वर्ष पुरानी शिक्षण संस्था इस्लामिया स्कूल काजीबाड़ा इन दिनों अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। प्रबंधन समिति के विवाद के चलते यह ऐतिहासिक विद्यालय बंद होने की कगार पर पहुँच गया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह स्कूल लंबे समय से अल्पसंख्यक समाज द्वारा चुनी गई कार्यकारिणी समिति के नियंत्रण में संचालित हो रहा था, लेकिन अब विवाद की स्थिति ने पूरे मोहल्ले में चिंता का माहौल पैदा कर दिया है। नागरिकों का आरोप है कि हाल ही में वक्फ बोर्ड उत्तराखंड के सदस्य पुष्कर द्वारी और चार लोगों की समिति ने इसे वक्फ बोर्ड में पंजीकृत कराकर विद्यालय का चार्ज दिलाने की कवायद शुरू की है, जिसे समाज पूरी तरह से अस्वीकार कर रहा है। यही विवाद बच्चों की पढ़ाई और भविष्य पर संकट की तरह मंडरा रहा है।
समाज के लोगों ने बताया कि यह विद्यालय कभी जर्जर और खंडहरनुमा स्थिति में पहुँच गया था। करीब पाँच से छह साल तक इसकी इमारत बदहाली की स्थिति में रही, लेकिन नवम्बर 2024 से मुनज्ज़िर बरकाती और स्थानीय नागरिकों ने मिलकर इसके कायाकल्प का बीड़ा उठाया। समाज के सहयोग से भवन की दीवारों की मरम्मत कराई गई, खिड़की-दरवाजे दुरुस्त हुए, पानी की टंकियों और पाइपलाइन की व्यवस्था बनी, बिजली फिटिंग के साथ हर कमरे में पंखे और ट्यूबलाइट लगाई गईं। स्कूल के सभी कक्षाओं के लिए नया फर्नीचर तैयार कराया गया और रंगाई-पुताई कराकर इसे एक आदर्श मॉडल स्कूल के रूप में खड़ा किया गया। जब समिति को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी तब विद्यालय में मात्र 45 छात्र-छात्राएं पढ़ रहे थे, लेकिन आज यह संख्या बढ़कर 200 तक पहुँच चुकी है। इन बच्चों में अधिकांश बेहद गरीब परिवारों से हैं, जिनके लिए यह स्कूल शिक्षा की एकमात्र उम्मीद है।

विद्यालय के भीतर मदरसा भी संचालित हो रहा है, जिसमें 28 बच्चे धार्मिक शिक्षा के साथ सामान्य शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इन बच्चों के खाने-पीने और पढ़ाई का पूरा खर्च समाज द्वारा वहन किया जा रहा है। अभिभावकों का कहना है कि इस्लामिया स्कूल गरीब परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि यहां न केवल सस्ती बल्कि बेहतर शिक्षा मिल रही है। इसके बावजूद वक्फ बोर्ड की ओर से की जा रही कार्रवाई ने असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। समाज के लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब स्थानीय समिति और नागरिक पूरी लगन से विद्यालय चला रहे हैं, तब वक्फ बोर्ड की हस्तक्षेप की कोशिश क्यों हो रही है।
विद्यालय के शिक्षकों का भी कहना है कि वे अपनी सेवाएं समाज की मदद से पूरी निष्ठा से दे रहे हैं और उनका उद्देश्य केवल बच्चों को बेहतर शिक्षा देना है। लेकिन अब जब वक्फ बोर्ड के दबाव में प्रबंधन बदलने की कोशिश हो रही है, तो इसका सीधा असर शिक्षण कार्य पर पड़ रहा है। इस बीच शैक्षणिक गतिविधियाँ प्रभावित हो गई हैं और बच्चों की पढ़ाई ठप पड़ने लगी है। अभिभावक चिंता जता रहे हैं कि यदि विवाद जल्द खत्म नहीं हुआ तो बच्चों का भविष्य पूरी तरह अंधकार में चला जाएगा। कई मोहल्लों के लोगों का मानना है कि यह विवाद केवल शिक्षा व्यवस्था को बाधित नहीं करेगा, बल्कि समाज में तनाव और विभाजन का कारण भी बन सकता है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि वक्फ बोर्ड के संरक्षण में आने वाली नई समिति के लोग देवबंद समाज से जुड़े हुए हैं, जबकि इस विद्यालय का संबंध वर्षों से सुन्नी बरेलवी समाज से रहा है। मोहल्ला कटोराताल, मोहल्ला खासान और मोहल्ला खालसा समेत बड़ी संख्या में लोग सुन्नी बरेलवी विचारधारा के हैं और उन्होंने ही इस विद्यालय को संवारने और पुनर्जीवित करने में बड़ा योगदान दिया है। इसलिए अब वक्फ बोर्ड की इस कार्रवाई को समाज विरोधी करार दिया जा रहा है। नागरिकों ने आशंका जताई है कि यदि प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो सुन्नी बरेलवी और देवबंद समुदायों के बीच तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है।

लोगों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जल्द समाधान निकाला जाए। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक स्कूल का मामला नहीं है, बल्कि उन सैकड़ों गरीब बच्चों के भविष्य का सवाल है जो यहां पढ़ाई करते हैं। इस्लामिया स्कूल जैसी शिक्षण संस्था को बंद होने से बचाना सभी की जिम्मेदारी है। समाज का तर्क है कि जिस तरह से स्थानीय नागरिकों ने इसे खंडहर से निकालकर मॉडल स्कूल बनाया और बच्चों की संख्या 45 से 200 तक पहुंचा दी, यह साबित करता है कि प्रबंधन समिति पारदर्शी और ईमानदारी से काम कर रही है। इस पर रोक लगाने की बजाय इसे प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
नागरिकों ने साफ कहा है कि यदि प्रशासन ने इस विवाद को नहीं सुलझाया तो शिक्षा का माहौल बिगड़ेगा और समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ सकता है। उनका कहना है कि स्कूल को बचाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि यही बच्चों के भविष्य का आधार है। लोगों ने मांग की है कि वक्फ बोर्ड की इस कार्रवाई पर रोक लगाई जाए और वर्तमान समिति को ही विद्यालय का संचालन जारी रखने दिया जाए। नागरिकों का विश्वास है कि यदि प्रशासन ने न्यायपूर्ण हस्तक्षेप किया तो न केवल इस्लामिया स्कूल का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा बल्कि काशीपुर का सामाजिक माहौल भी शांतिपूर्ण बना रहेगा।



