किच्छा। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बयानबाजी, आपत्तियों और कथित अफवाहों के बीच अब राज्य निर्वाचन तंत्र ने मतदाताओं को राहत देने वाला स्पष्ट संदेश दिया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. वी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम ने कहा है कि किसी भी पात्र मतदाता को अनावश्यक रूप से मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जाएगा और किसी नागरिक को घबराने की जरूरत नहीं है। पुनरीक्षण के दौरान सामने आ रही शिकायतों और आपत्तियों को लेकर जिस तरह से आम मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनने की बात कही जा रही है, उसने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर बहस तेज कर दी है। इसी बीच निर्वाचन आयोग की ओर से यह भरोसा खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि नाम हटाने से पहले निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच की जाएगी और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। दूसरी ओर, राजनीतिक स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ लोग एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर जनता के बीच भय का वातावरण तैयार कर रहे हैं। ऐसे में आयोग का यह स्पष्टीकरण उन मतदाताओं के लिए अहम है, जो दस्तावेज, मतदाता सूची और दोहरी प्रविष्टि जैसे मुद्दों को लेकर असमंजस में हैं। आयोग ने संकेत दिया है कि चुनावी सूची की शुद्धता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हुए प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
मामले की गंभीरता उस समय और बढ़ गई जब पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में आपत्तियां सामने आने लगीं। आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ राजनीतिक तत्वों और शरारती लोगों की ओर से ऐसे मतदाताओं को डराने का प्रयास किया जा रहा है, जिन्हें चुनावी नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी नहीं है। विशेष रूप से गरीब, अनपढ़ और ग्रामीण पृष्ठभूमि के मतदाताओं के बीच यह डर फैलने की बात कही गई कि यदि उनके नाम दो स्थानों पर मतदाता सूची में पाए गए तो उन्हें जेल भेज दिया जाएगा। ऐसी कथित धमकियों के कारण कई लोग मानसिक दबाव और भ्रम की स्थिति में पहुंच गए। दूसरी ओर, मृत व्यक्तियों और अज्ञात लोगों के नाम का इस्तेमाल करते हुए कथित तौर पर गलत मोबाइल नंबरों से हजारों आपत्तियां दर्ज किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। इन आरोपों ने एसआईआर की प्रक्रिया में आपत्तियों की वास्तविकता और उनके स्रोत की जांच को महत्वपूर्ण बना दिया है। यदि किसी व्यक्ति के नाम पर बिना उसकी जानकारी के आपत्ति दर्ज कर दी जाती है, तो संबंधित मतदाता के लिए यह जानना जरूरी है कि उसके विरुद्ध आपत्ति किसने और किस आधार पर की। इसी वजह से अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि प्रत्येक आपत्ति की पुष्टि निर्धारित नियमों के तहत की जाए और केवल कागजी शिकायत के आधार पर किसी नागरिक के मताधिकार को प्रभावित न किया जाए।
इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस प्रदेश महामंत्री डॉ. गणेश उपाध्याय ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. वी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम से फोन पर विस्तृत बातचीत कर एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ी शिकायतों और कथित अनियमितताओं को सामने रखा। डॉ. गणेश उपाध्याय ने कहा कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तराखंड की वेबसाइट पर उपलब्ध फॉर्म-10 से संबंधित जानकारी के आधार पर कुछ मतदाताओं के नामों के विरुद्ध विधानसभा की मतदाता सूची के संबंधित भाग में गलत अथवा अवैध आपत्तियां दर्ज होने की शिकायतें सामने आई हैं। उन्होंने निर्वाचन आयोग से आग्रह किया कि फॉर्म-7 के माध्यम से जिन मतदाताओं के नामों पर आपत्ति दर्ज कराई गई है, उनसे संबंधित आपत्तिकर्ता की वास्तविक पहचान और आपत्ति किए जाने की पुष्टि कराई जाए। उनका तर्क है कि यदि संबंधित व्यक्ति यह स्वीकार ही नहीं करता कि उसने आपत्ति दर्ज कराई है, तो ऐसी शिकायत को गंभीरता से जांचना आवश्यक होगा। डॉ. गणेश उपाध्याय ने मांग रखी कि यदि आपत्ति की वास्तविक पुष्टि नहीं होती है तो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 के नियम 17 के तहत उस आपत्ति को निरस्त किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया का उद्देश्य वास्तविक गलतियों को दूर करना है, न कि किसी व्यक्ति की राजनीतिक या व्यक्तिगत शिकायत के आधार पर पात्र मतदाता को अनिश्चितता में डालना। इसलिए प्रत्येक शिकायत की प्रामाणिकता की जांच लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी है।
कांग्रेस नेता ने बातचीत के दौरान यह भी मांग उठाई कि यदि जांच के बाद यह प्रमाणित होता है कि किसी आपत्तिकर्ता ने वास्तव में संबंधित मतदाता के नाम के विरुद्ध आपत्ति दर्ज कराई है, तो आगे की प्रक्रिया भी नियमों के अनुरूप पूरी की जानी चाहिए। डॉ. गणेश उपाध्याय के अनुसार निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 के नियम 19 के तहत आपत्तिकर्ता और संबंधित मतदाता दोनों को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए, ताकि दोनों पक्ष अपनी बात प्रमाण और दस्तावेजों के साथ रख सकें। इसके बाद नियम 20 के तहत आवश्यक जांच की प्रक्रिया अपनाते हुए आपत्तिकर्ता को व्यक्तिगत रूप से साक्ष्य सहित उपस्थित होने का अवसर दिया जाना चाहिए और पूरे मामले का नियमानुसार निस्तारण किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि केवल किसी ऑनलाइन प्रविष्टि या कागजी आपत्ति को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं होगा, खासकर तब जब किसी मतदाता ने स्वयं ऐसी आपत्ति दर्ज कराने से इनकार किया हो। उनका कहना है कि चुनावी सूची किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी संरचना का हिस्सा है और इसमें किसी नागरिक का नाम शामिल होना या हटना अत्यंत गंभीर विषय है। इसलिए शिकायतकर्ता की वास्तविकता, आपत्ति का आधार, संबंधित मतदाता का पक्ष और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच के बाद ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता रहने से न केवल मतदाताओं का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि फर्जी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर भी रोक लगाने में मदद मिलेगी।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. वी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम की ओर से बातचीत में दिए गए आश्वासन को इस पूरे विवाद के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने माना कि एसआईआर से जुड़ी प्रक्रिया में कुछ तकनीकी समस्याएं सामने आ रही हैं और उन्हें दूर करने के लिए सॉफ्टवेयर को अपडेट किया जा रहा है। निर्वाचन तंत्र का कहना है कि तकनीकी स्तर पर आने वाली दिक्कतों को सुधारने के बाद प्रक्रिया अधिक सुचारु तरीके से संचालित हो सकेगी। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में बड़ी मात्रा में आंकड़ों का संकलन, सत्यापन और मिलान किया जाता है। किसी तकनीकी त्रुटि के कारण यदि गलत नाम पर आपत्ति चली जाए या सही रिकॉर्ड में विसंगति दिखाई दे, तो उसका सीधा असर मतदाता के अधिकार पर पड़ सकता है। ऐसे में सॉफ्टवेयर की तकनीकी विश्वसनीयता के साथ मानवीय स्तर पर भी जांच की आवश्यकता बनी रहती है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने स्पष्ट किया कि तकनीकी समस्या को दूर करने का काम चल रहा है और जल्द ही संबंधित दिक्कतों का समाधान करने का प्रयास किया जाएगा। इस आश्वासन से उन मतदाताओं को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें ऑनलाइन प्रक्रिया या सूची में दिखाई दे रही विसंगतियों के कारण परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। आयोग के लिए चुनौती यह भी है कि तकनीकी सुधार के साथ जनता तक सही जानकारी पहुंचे और अफवाहों की जगह आधिकारिक सूचना पर भरोसा कायम हो।
सबसे महत्वपूर्ण आश्वासन यह सामने आया है कि केवल किसी आपत्ति या शिकायत के आधार पर किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने साफ किया कि किसी नाम को हटाने से पहले पूरी जांच और आवश्यक परीक्षण किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि मतदाता सूची में दर्ज प्रत्येक नाम के संबंध में यदि कोई आपत्ति आती है तो उसकी वैधता, तथ्य और दस्तावेजों की जांच की जाएगी। संबंधित नागरिक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर भी मिलेगा। यह व्यवस्था इसलिए जरूरी है क्योंकि मतदाता सूची में नाम होना केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बल्कि नागरिक की लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ा अधिकार है। यदि किसी व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हट जाता है तो वह चुनाव के दौरान मतदान से वंचित हो सकता है। दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति की दो जगह मतदाता प्रविष्टियां वास्तव में मौजूद हैं और वह नियमों के अनुसार अपात्र स्थिति में है, तो ऐसी गलत प्रविष्टियों को ठीक करना भी निर्वाचन सूची की शुद्धता के लिए आवश्यक है। आयोग ने इसी अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा है कि कार्रवाई केवल वास्तविक रूप से अपात्र मामलों में की जाएगी। पात्र नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा प्राथमिकता रहेगी। इससे यह संदेश गया है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाताओं को डराना नहीं बल्कि मतदाता सूची को अधिक सटीक, विश्वसनीय और अद्यतन बनाना है।
एसआईआर प्रक्रिया में दोहरी मतदाता प्रविष्टियों का मुद्दा भी लगातार चर्चा में बना हुआ है। सामान्य नागरिकों के बीच इस बात को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम किसी पुराने पते या दूसरे स्थान की सूची में भी दिखाई देता है तो उसे तत्काल अपराधी माना जाएगा। इसी आशंका को लेकर कथित तौर पर कई लोगों को जेल भेजे जाने की धमकियां दिए जाने की शिकायत सामने आई है। निर्वाचन आयोग की ओर से मिले आश्वासन ने इस डर को कम करने की कोशिश की है। स्पष्ट किया गया है कि जो लोग वास्तव में नियमों के अनुरूप अपात्र स्थिति में हैं या दो स्थानों पर मतदाता के रूप में दर्ज हैं, उनकी प्रविष्टियों की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी, लेकिन पात्र नागरिक को केवल अफवाह, गलत शिकायत या बिना सत्यापन के आधार पर सूची से बाहर नहीं किया जाएगा। यही अंतर मतदाता जागरूकता के लिए बेहद जरूरी है। किसी व्यक्ति के नाम की दो जगह उपस्थिति का कारण हमेशा जानबूझकर की गई गलती हो, यह जरूरी नहीं है; स्थान परिवर्तन, रिकॉर्ड अपडेट में देरी या प्रशासनिक स्तर पर डेटा के समन्वय की समस्या भी हो सकती है। इसलिए जांच के बाद तथ्य सामने आना जरूरी है। आयोग के आश्वासन के मुताबिक किसी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना अंतिम निर्णय नहीं लिया जाएगा। इससे मतदाताओं को यह भरोसा मिलना चाहिए कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में उनकी बात सुनी जाएगी।
राजनीतिक आरोपों के बीच इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि मतदाता सूची से जुड़े विषय को लेकर आम नागरिकों में भय का वातावरण न बने। चुनावी प्रक्रिया जितनी तकनीकी है, उतनी ही सामाजिक और लोकतांत्रिक रूप से संवेदनशील भी है। यदि गरीब या कम पढ़े-लिखे मतदाताओं को नियमों की जानकारी के अभाव में यह कहकर डराया जाए कि उनका नाम दो जगह मिला तो उन्हें जेल जाना पड़ेगा, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अनावश्यक अविश्वास पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, यदि किसी वास्तविक दोहरी प्रविष्टि या अपात्र नाम को केवल राजनीतिक आरोपों के कारण नजरअंदाज कर दिया जाए तो मतदाता सूची की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। इसलिए निर्वाचन आयोग के सामने दोनों चुनौतियों के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। एक तरफ वास्तविक रूप से गलत या दोहरी प्रविष्टियों की पहचान और दूसरी तरफ पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा, दोनों को समान गंभीरता से आगे बढ़ाना होगा। इसी संदर्भ में मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. वी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम का यह भरोसा महत्वपूर्ण है कि बिना जांच किसी नागरिक का नाम नहीं हटाया जाएगा। वहीं डॉ. गणेश उपाध्याय की मांग कि फर्जी अथवा गलत आपत्तियों की पुष्टि कर उन्हें नियमों के अनुसार निरस्त किया जाए, इस प्रक्रिया में जवाबदेही का मुद्दा भी सामने रखती है।
मतदाता पुनरीक्षण के दौरान कथित तौर पर मृत व्यक्तियों और अज्ञात लोगों के नाम से फर्जी फोन नंबरों के माध्यम से बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज किए जाने के आरोपों ने प्रशासनिक तंत्र के सामने एक अलग चुनौती खड़ी कर दी है। यदि किसी मृत व्यक्ति के नाम पर कोई शिकायत दर्ज की जाती है या ऐसे व्यक्ति का नाम इस्तेमाल किया जाता है जो संबंधित क्षेत्र में मौजूद ही नहीं है, तो यह पता लगाना जरूरी होगा कि आपत्ति वास्तव में किसने दर्ज की और उसका उद्देश्य क्या था। इसी तरह किसी जीवित और पात्र मतदाता के खिलाफ ऐसी शिकायत दर्ज हो, जिसके बारे में स्वयं उस व्यक्ति को जानकारी न हो, तो उसे अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य हो जाता है। यही वजह है कि आपत्तियों की संख्या से अधिक उनकी गुणवत्ता और सत्यता महत्वपूर्ण हो जाती है। हजारों शिकायतें दर्ज होना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि हजारों मतदाता अपात्र हैं। प्रत्येक मामले का तथ्यात्मक परीक्षण ही वास्तविक स्थिति सामने ला सकता है। निर्वाचन आयोग के सामने अब यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था का दुरुपयोग न हो और किसी भी नागरिक को अनावश्यक जांच या भय की स्थिति से न गुजरना पड़े। साथ ही वास्तविक शिकायतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इस संतुलित प्रक्रिया से ही एसआईआर की विश्वसनीयता कायम रह सकती है और राजनीतिक दलों तथा आम मतदाताओं के बीच भरोसे का वातावरण मजबूत किया जा सकता है।
पूरे विवाद के बीच अब उत्तराखंड के मतदाताओं के सामने सबसे अहम संदेश यही है कि उन्हें अफवाहों के बजाय निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करना चाहिए और यदि उनके नाम को लेकर कोई आपत्ति या नोटिस सामने आता है तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखना चाहिए। निर्वाचन आयोग के आश्वासन से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि पात्र नागरिकों के अधिकारों की रक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही वास्तविक रूप से अपात्र या नियमों के विपरीत दर्ज प्रविष्टियों को जांच के बाद हटाने की प्रक्रिया भी जारी रहेगी। डॉ. गणेश उपाध्याय द्वारा उठाए गए सवालों ने इस पूरी प्रक्रिया में आपत्तियों की प्रामाणिकता, सुनवाई और नियमों के पालन की आवश्यकता को रेखांकित किया है। दूसरी तरफ मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. वी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम की ओर से सॉफ्टवेयर सुधार, जांच के बाद ही नाम हटाने और प्रभावित मतदाता को पक्ष रखने का अवसर देने का भरोसा विवाद को शांत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आने वाले चरणों में तकनीकी समस्याओं का समाधान कितनी तेजी से होता है, आपत्तियों की जांच किस स्तर की पारदर्शिता के साथ होती है और पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने के लिए प्रशासनिक स्तर पर क्या कदम उठाए जाते हैं। लोकतंत्र की असली मजबूती इसी में है कि मतदाता सूची साफ भी हो और हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित भी रहे।





