रामनगर। मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र में गरजती मिसाइलों और गूंजते धमाकों की तपिश अब सात समंदर पार भारत के आम आदमी की चौखट तक आ पहुंची है, जिससे सपनों के आशियाने की बुनियाद दरकने लगी है। वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में निर्माण जगत के बाजार में ऐसी आग लगी है कि मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए घर बनाना अब किसी हिमालय चढ़ने जैसी चुनौती बन गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल की किल्लत, ईंधन की आसमान छूती कीमतें और आपूर्ति श्रृंखला में आए बड़े गतिरोध ने मिलकर सीमेंट, सरिया, ईंट और बजरी जैसी बुनियादी चीजों के दाम इस कदर बढ़ा दिए हैं कि आम आदमी की जेब खाली होने लगी है। बाजार की इस उथल-पुथल ने न केवल रसोई के बजट को बिगाड़ा है, बल्कि उन लाखों लोगों की रातों की नींद उड़ा दी है जो अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी से एक अदद मकान खड़ा करने की हसरत पाले हुए थे। हालात यह हैं कि निर्माण सामग्री की कीमतों में आई इस अप्रत्याशित तेजी ने भविष्य की योजनाओं पर ग्रहण लगा दिया है।
मकान की मजबूती के दो सबसे मुख्य स्तंभ, सरिया और सीमेंट, इस वक्त महंगाई के सबसे बड़े शिकार बनकर उभरे हैं, जिसने निर्माण लागत के गणित को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। युद्ध की विभीषिका से पहले जहां सरिया के दाम औसतन 50,000 से 52,000 प्रति टन के आसपास स्थिर थे, वहीं अब यह उछलकर 60,000 से 65,000 प्रति टन के खतरनाक स्तर को छू रहे हैं। उत्तराखंड के रामनगर जैसे शहरों में भी सरिया की कीमतें 63,000 प्रति टन तक पहुंच गई हैं, जो स्थानीय निवासियों के लिए एक बड़ा झटका है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोहे और कोयले के आयात पर बढ़ते खर्च और परिवहन के महंगे होने से कंपनियों ने अपना बोझ सीधा ग्राहकों के कंधों पर डाल दिया है। इस बदलाव के कारण किसी भी सामान्य घर को बनाने की कुल लागत में 15 से 25 प्रतिशत तक का सीधा इजाफा दर्ज किया जा रहा है, जिससे बजट का संतुलन पूरी तरह डगमगा गया है और लोग अपना काम बीच में रोकने को मजबूर हैं।
निर्माण कार्य में जान फूंकने वाली ईंट, रेत और बजरी जैसी बुनियादी सामग्रियों की कीमतों में आया उछाल छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के लिए और भी ज्यादा घातक साबित हो रहा है। पहले जो ईंट 6 से 7 रुपये प्रति पीस की दर से आसानी से उपलब्ध हो जाती थी, उसकी कीमत अब कई बाजारों में 8 रुपये से लेकर 8 रुपये 50 पैसे तक पहुंच चुकी है, जबकि बेहतरीन गुणवत्ता वाली ईंटों के लिए तो ग्राहकों को 10 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। रेत के बाजार का हाल भी कुछ ऐसा ही है, जहां कीमतें 90 से 95 रुपये प्रति क्विंटल के पार निकल गई हैं। इस व्यवसाय से जुड़े गोविन्द सिंह का कहना है कि स्थानीय स्तर पर पैदावार होने के बावजूद बाहरी राज्यों में बढ़ती मांग और परिवहन की दिक्कतों ने कीमतों को हवा दी है। उनका मानना है कि आने वाले दिनों में यह संकट और गहरा सकता है क्योंकि महंगाई का सीधा प्रहार अब उस आम आदमी पर हो रहा है जो एक-एक पैसा जोड़कर ईंटें जमा कर रहा था।

घर को खूबसूरती देने वाली टाइल्स, मार्बल और इंटीरियर फिटिंग्स पर भी मिडिल ईस्ट के तनाव का गहरा साया साफ नजर आने लगा है, क्योंकि गैस और ईंधन की कीमतों ने इनके उत्पादन को महंगा कर दिया है। टाइल्स उद्योग में प्राकृतिक गैस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है और युद्ध के चलते गैस की वैश्विक कीमतों में आए उछाल ने टाइल्स के दाम 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ा दिए हैं। बाजार में जो सामान्य टाइल्स पहले 35 से 40 रुपये प्रति वर्ग फुट में उपलब्ध थीं, अब उनकी कीमत 45 से 50 रुपये के पार जा चुकी है। हालांकि कुछ दुकानदार पुराने स्टॉक के कारण पुराने रेट लगा रहे हैं, लेकिन नए माल की आवक के साथ ही कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी तय मानी जा रही है। इसके साथ ही बाथरूम फिटिंग्स, वायरिंग, पाइप और पेंट जैसी सजावटी सामग्रियों में भी 4 से 7 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जिससे घर को अंतिम रूप देना अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा खर्चीला सौदा साबित हो रहा है।
बाजार की नब्ज पर बारीक नजर रखने वाले विशेषज्ञ साहिब सिंह का कहना है कि निर्माण सामग्री के महंगे होने के पीछे सबसे बड़ा विलेन बढ़ता परिवहन शुल्क और डीजल की कीमतें हैं। डीजल के दाम में अस्थिरता के कारण ट्रकों और मालवाहक वाहनों की ढुलाई दरें काफी बढ़ गई हैं, जिसका सीधा असर हरिद्वार, देहरादून और रामनगर जैसे शहरों में देखा जा रहा है। साहिब सिंह के अनुसार, परिवहन लागत में प्रति यूनिट 30 से 50 रुपये तक का इजाफा हुआ है, जिसे अंततः ठेकेदार और दुकानदार आम ग्राहकों से ही वसूल रहे हैं। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट के संघर्ष ने ग्लोबल सप्लाई चेन को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है, जिससे कोयला और पेट्रोलियम उत्पादों जैसे कच्चे माल की कमी हो गई है। फैक्ट्रियां अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं, जिससे बाजार में सामान की किल्लत पैदा हो रही है और मांग बढ़ने के साथ ही कीमतें बेतहाशा ऊपर जा रही हैं, जो आम उपभोक्ता के लिए दोहरी मार जैसा है।
रामनगर जैसे इलाकों में मकान बनाने का सपना संजोए बैठे लोगों की हिम्मत अब जवाब देने लगी है, और वे वर्तमान परिस्थितियों को देखकर अपने कदम पीछे खींच रहे हैं। रामनगर के निवासी सुभाष सिंह जो पहले अपने घर का निर्माण शुरू करने वाले थे, अब बढ़ती महंगाई को देखकर शांत बैठ गए हैं और हालात सामान्य होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। सुभाष सिंह का कहना है कि जो मकान पहले 15 से 18 लाख रुपये के बजट में 1000 वर्ग फुट में बनकर तैयार हो जाता था, आज उसी के लिए 22 से 25 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। अपनी जीवन भर की बचत और बैंक लोन के भरोसे घर बनाने की सोच रहे मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह 7 से 8 लाख का अतिरिक्त बोझ किसी त्रासदी से कम नहीं है। युद्ध की इस तपिश ने हजारों सपनों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिससे न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक स्तर पर भी लोगों के बीच गहरी हताशा और अनिश्चितता का माहौल पैदा हो गया है।





