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भारतीय ज्ञान परम्परा की आत्मा है दर्शन पीएनजी पीजी कॉलेज में विद्वानों ने फूंकी नई जान

उच्च शिक्षा निदेशक ने गुरुदिवस व्याख्यानमाला में प्राचीन सनातन मूल्यों को विश्व शांति का आधार बताते हुए छात्र-छात्राओं को भारतीय ज्ञान परम्परा के वैज्ञानिक रहस्यों और संस्कृत की अमूल्य निधि से जुड़कर उज्ज्वल भविष्य गढ़ने हेतु ललकारा।

रामनगर। पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रांगण में आज भारतीय संस्कृति और मनीषा का एक अनूठा संगम देखने को मिला, जहाँ गुरुदिवस व्याख्यानमाला के माध्यम से प्राचीन ज्ञान के रहस्यों की परतें खोली गईं। इस बौद्धिक विमर्श में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे उत्तराखण्ड उच्च शिक्षा के निदेशक प्रोफेसर वी.एन. खाली ने अपने सारगर्भित उद्बोधन से यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय दर्शन केवल शुष्क सिद्धांत नहीं, बल्कि हमारी ज्ञान परम्परा की वह धड़कती हुई आत्मा है जो सदियों से विश्व का मार्गदर्शन कर रही है। उन्होंने अत्यंत ओजस्वी स्वर में इस बात पर बल दिया कि जब पूरी दुनिया अंधकार में थी, तब भारत के ऋषियों ने ‘ॐ शान्तिः’ के मंत्र से मानवता को शांति और सद्भाव का मार्ग दिखाया था। प्रोफेसर वी.एन. खाली ने अंग्रेजी साहित्य के दिग्गज टी.एस. इलियट का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे पश्चिमी जगत के महान विचारक भी भारतीय दर्शन की गहराइयों से प्रभावित होकर अपनी रचनाओं में यहाँ के शांति पाठ को उद्धृत करने पर विवश हुए। उनके वक्तव्य ने विद्यार्थियों के भीतर अपनी गौरवशाली विरासत के प्रति एक नई चेतना और जिज्ञासा का संचार किया, जिससे पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

कैरियर काउंसलिंग प्रकोष्ठ के तत्वावधान में आयोजित इस पंचम शृंखला के दसवें व्याख्यान की भव्यता देखते ही बनती थी, जहाँ संस्कृत विभाग के कुशल संयोजन ने इसे अकादमिक गरिमा के उच्चतम शिखर पर पहुँचा दिया। “भारतीय दर्शन की परम्परा, वैशिष्ट्य एवं स्वरूप” जैसे गूढ़ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय से आए संस्कृत के प्रखर विद्वान असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष कुमार त्रिपाठी ने अपने ज्ञान की अमृत वर्षा से श्रोताओं को सराबोर कर दिया। उन्होंने संस्कृत को मात्र एक भाषा नहीं, बल्कि समस्त आधुनिक विज्ञान और तकनीक की जननी करार देते हुए कहा कि इसमें नैतिक मूल्यों और वैज्ञानिक रहस्यों का वह खजाना छिपा है जिसे अभी पूरी तरह खोजा जाना बाकी है। डॉ. आशीष कुमार त्रिपाठी ने अपने सम्बोधन में स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परम्परा की नींव इतनी सशक्त है कि वह आज के दौर की हर वैश्विक समस्या का समाधान देने में सक्षम है। उन्होंने दर्शन की परिभाषा को सरल शब्दों में “दृश्यते अनेन इति दर्शनम्” के माध्यम से समझाते हुए बताया कि यह वह दिव्य दृष्टि है जिसके द्वारा मनुष्य ब्रह्म की प्राप्ति और मोक्ष के मार्ग को सुगम बना सकता है।

व्याख्यान के दौरान डॉ. आशीष कुमार त्रिपाठी ने भारतीय दर्शन के आस्तिक और नास्तिक भेदों की अत्यंत तार्किक व्याख्या प्रस्तुत की, जिससे जटिल दार्शनिक अवधारणाएं भी सहजता से समझ में आने लगीं। उन्होंने विशेष रूप से आस्तिक दर्शन की छह शाखाओं—सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा और वेदान्त—के सूक्ष्म अंतरों, उनकी विशेषताओं और उनके अद्वितीय स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे ये छह दर्शन मनुष्य के जीवन, प्रकृति और ईश्वर के मध्य के संबंधों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिभाषित करते हैं। आस्तिक दर्शनों की इस परम्परा ने न केवल भारत बल्कि वैश्विक चिंतन को एक नई दिशा प्रदान की है, जहाँ तर्क और विश्वास का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। वक्ता ने प्राचीन ग्रंथों के सूत्रों को आधुनिक जीवन पद्धति से जोड़ते हुए विद्यार्थियों को प्रेरित किया कि वे केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि इन दार्शनिक मूल्यों को अपने चरित्र में उतारें। प्रश्नकाल के दौरान विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए उन्होंने जिस धैर्य और विद्वत्ता का परिचय दिया, उसने इस सत्र को एक संवादमूलक पाठशाला में तब्दील कर दिया।

इस गौरवशाली शैक्षणिक महाकुंभ का शुभारंभ महाविद्यालय के निदेशक एवं प्राचार्य प्रोफेसर एम. सी.पाण्डे द्वारा अतिथियों के आत्मीय अभिनंदन के साथ हुआ, जिन्होंने गुरुदिवस की महान परम्परा की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि शिक्षक और शिष्य के बीच का संबंध केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान का नहीं, बल्कि संस्कारों के हस्तांतरण का है, जो भारतीय दर्शन की मूल भावना है। प्रोफेसर एम. सी.पाण्डे ने इस बात पर जोर दिया कि समाज के सर्वांगीण विकास और सही दिशा निर्देशन के लिए दार्शनिक चिंतन का होना अनिवार्य है, क्योंकि बिना विजन के समाज पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। उन्होंने कैरियर काउंसलिंग प्रकोष्ठ के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से छात्रों का मानसिक क्षितिज विस्तृत होता है और वे एक उत्तरदायी नागरिक बनने की ओर अग्रसर होते हैं। उनकी ओजपूर्ण वाणी ने उपस्थित जनसमूह को यह अहसास कराया कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल आजीविका कमाना नहीं, बल्कि सत्य की खोज और मानवता की सेवा करना है।

कार्यक्रम के सफल आयोजन में आयोजक सचिव एवं संस्कृत विभाग के प्रभारी डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही, जिन्होंने विषयवस्तु की प्रस्ताविकी को इतने प्रभावी ढंग से रखा कि पूरा विषय परिवेश में जीवंत हो उठा। उन्होंने न केवल व्याख्यान की रूपरेखा स्पष्ट की, बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा के विविध आयामों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य भी किया। कार्यक्रम के समापन पर उन्होंने मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता और दूर-दराज से आए विद्वानों का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए इस बौद्धिक यज्ञ की पूर्णाहुति की। वहीं प्रबंधन की कमान कैरियर काउंसलिंग के संयोजक डॉ. अनुराग श्रीवास्तव, सहसंयोजक डॉ. लोतिका अमित और प्रकाश सिंह बिष्ट ने संभाली, जिनकी सक्रियता और निष्ठा के कारण कार्यक्रम का स्वरूप अत्यंत व्यवस्थित और भव्य रहा। इन सभी के सामूहिक प्रयासों ने रामनगर के इस महाविद्यालय को एक दिन के लिए ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया, जहाँ प्राचीन भारत की गौरव गाथा और भविष्य के भारत के संकल्प एक साथ सुनाई दे रहे थे।

सभागार की शोभा बढ़ाने के लिए न केवल महाविद्यालय के शिक्षक और छात्र मौजूद थे, बल्कि अन्य शिक्षण संस्थाओं के प्रतिष्ठित विद्वान और गणमान्य नागरिक भी इस ज्ञान गंगा में डुबकी लगाने पहुँचे थे। उपस्थित विद्वानों में प्रो. विनय विद्यालंकार, प्रो. जया तिवारी, प्रो. गीता शुक्ला, प्रो. गिरीश पन्त और चीफ प्रॉक्टर प्रो. एस.एस. मौर्य जैसी विभूतियों ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा को चार चाँद लगा दिए। इसके अलावा प्रो. पुनीता कुशवाहा, डॉ. सिराज अहमद, डॉ. रंजनलता, डॉ. उमाकांत शुक्ल और डॉ. कृपाशंकर मिश्र जैसे शिक्षाविदों ने भी चर्चाओं में सक्रियता दिखाई। साथ ही डॉ. डी.एन. जोशी, डॉ. शारदा पाठक, डॉ. सुमन कुमार, डॉ. राघव झा, डॉ. मुदित शुक्ल के साथ-साथ भूप सिंह धामी, दीनदयाल और राधेकृष्ण जैसे समाजसेवियों की उपस्थिति ने यह दर्शाया कि भारतीय दर्शन के प्रति समाज के हर वर्ग में गहरी रुचि और श्रद्धा है। यह आयोजन मात्र एक व्याख्यान न होकर भारतीय संस्कृति के पुनरुद्धार का एक सामूहिक उत्सव बन गया, जिसने यह संदेश दिया कि हमारी जड़ें जितनी गहरी होंगी, हमारी सफलता का वृक्ष उतना ही विशाल और फलदायी होगा।

इस व्याख्यानमाला ने यह स्पष्ट कर दिया कि वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के दौर में भारतीय दर्शन और ज्ञान परम्परा ही वह मशाल है जो दुनिया को सही राह दिखा सकती है। प्रोफेसर वी.एन. खाली के नेतृत्व में उच्च शिक्षा विभाग उत्तराखण्ड जिस तरह से इन विषयों को युवाओं के बीच ले जा रहा है, वह भविष्य में एक बौद्धिक क्रांति का आधार बनेगा। व्याख्यान की समाप्ति के बाद भी विद्यार्थियों और प्राध्यापकों के बीच दार्शनिक विषयों पर चर्चाओं का दौर चलता रहा, जो इस कार्यक्रम की वास्तविक सफलता का प्रमाण है। रामनगर की शांत वादियों में गूँजे ये दार्शनिक विचार अब उन युवाओं के मन मस्तिष्क में एक बीज के रूप में रोपित हो चुके हैं, जो कल के समर्थ भारत का निर्माण करेंगे। यह रिपोर्ट केवल एक समाचार नहीं है, बल्कि उस चेतना का दस्तावेजीकरण है जो हमें याद दिलाती है कि हमारी आत्मा भारतीय ज्ञान की उस महान परम्परा में बसती है, जो अनादि है, अनंत है और शाश्वत है। इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर यह प्रमाणित कर दिया कि ज्ञान ही वह शक्ति है जो मनुष्य को अज्ञान के बंधनों से मुक्त कर परम सुख की प्राप्ति कराती है।

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