spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडभाई दूज पर रिश्तों की रौशनी से जगमगाए घर-आंगन, प्रेम और आस्था...

भाई दूज पर रिश्तों की रौशनी से जगमगाए घर-आंगन, प्रेम और आस्था का उत्सव

यमराज और यमुना की पावन कथा से जुड़ा यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक प्रेम, करुणा और मानवीय संबंधों की अमर ज्योति का संदेश देता है

रामनगर। देशभर में इन दिनों दीपोत्सव की रौनक के साथ भाई-बहन के अटूट प्रेम का पावन पर्व भाई दूज भी पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। यह त्योहार जिसे अलग-अलग प्रांतों में भाई बीज, भाऊ बीज, भाई टीका और भ्रातृ द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है, कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व रक्षाबंधन से कम नहीं माना जाता, क्योंकि यह भी भाई-बहन के स्नेह, अपनापन और आत्मीय बंधन की अमर निशानी है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु, समृद्धि और मंगलकामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहन की सुरक्षा, सम्मान और खुशहाली का वचन देते हैं। देश के हर हिस्से में इस दिन का उल्लास देखने लायक होता है, जब आंगन में सजे थाल, जलते दीपक और मुस्कुराते चेहरों से रिश्तों की गरमाहट झलकती है। परंपराओं के साथ यह पर्व भावनाओं की उस गहराई को दर्शाता है, जो समाज में प्रेम, सौहार्द और एकता की ज्योति जलाए रखता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस पावन अवसर को यम द्वितीया और चित्रगुप्त जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। कथा है कि मृत्यु के देवता यमराज अपनी बहन यमुना के आग्रह पर इसी दिन उनके घर भोजन ग्रहण करने पहुंचे थे। यमुना ने अपने भाई का स्नेहपूर्ण स्वागत करते हुए उनके माथे पर तिलक लगाया और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे। भाई के प्रति इस निस्वार्थ प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि इस तिथि पर जो भी भाई अपनी बहन के घर जाकर तिलक ग्रहण करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं सताएगा। इसी दिन यमराज ने अपने मंत्री चित्रगुप्त को आदेश दिया कि नर्क में पीड़ा भोग रही आत्माओं को मुक्ति प्रदान की जाए। इसलिए इस तिथि पर यमदेव के साथ चित्रगुप्त की भी पूजा का विधान है। लोकमान्यताओं में यह विश्वास गहराई से जुड़ा है कि यमराज और यमुना का यह भावपूर्ण मिलन भाई-बहन के अटूट बंधन की उस परंपरा का आरंभ था, जो आज भी भारतीय संस्कृति की पहचान बना हुआ है।

पौराणिक कथा का एक और रूप श्रीकृष्ण और उनकी बहन सुभद्रा से जुड़ा है। कहा जाता है कि जब नरकासुर का अंत करने के बाद श्रीकृष्ण द्वारका लौटे, तो सुभद्रा ने अपने भाई का हर्षोल्लास से स्वागत किया। उन्होंने श्रीकृष्ण के माथे पर तिलक लगाकर उनकी विजय की मंगल कामना की। उसी क्षण से भाई दूज का यह पवित्र संस्कार आत्मिक स्नेह का प्रतीक बन गया। इस कथा का सार केवल धार्मिकता तक सीमित नहीं, बल्कि यह समाज के लिए एक गहरा संदेश भी समेटे है — यदि हम अपने भीतर की नकारात्मकता, स्वार्थ और ईर्ष्या जैसे नरकासुरों का अंत करें, तो जीवन में शांति, प्रेम और सहयोग के प्रकाश फैल सकते हैं। इस पर्व की वास्तविक भावना हमें यह सिखाती है कि हर रिश्ते की जड़ में पवित्रता और करुणा होनी चाहिए, क्योंकि वही मनुष्य को मानवता के असली अर्थ से जोड़ती है।

भाई दूज के इस रूहानी पर्व का सार केवल परंपराओं में नहीं, बल्कि उसकी आत्मिक व्याख्या में भी निहित है। जब बहन अपने भाई के माथे पर तिलक करती है, तो यह केवल एक रस्म नहीं होती, बल्कि उस क्षण वह अपने भाई को यह स्मरण दिला रही होती है कि हम सब आत्माएं एक ही परमात्मा की संतान हैं। वह परमात्मा, जो निराकार, ज्योति स्वरूप और शिव कहलाता है। इस आध्यात्मिक दृष्टिकोण को जीवन में अपनाने से व्यक्ति का मन निर्मल होता है, विचारों में सकारात्मकता आती है और हृदय करुणा से भर जाता है। भाई दूज का असली अर्थ यही है कि हम अपने रिश्तों में केवल सांसारिक नहीं, बल्कि आत्मिक बंधन को भी जीवित रखें। यह पर्व इस बात की याद दिलाता है कि प्रेम, विश्वास और आशीर्वाद से बढ़कर कोई उपहार नहीं होता। जब मनुष्य इन मूल्यों को अपने जीवन में उतारता है, तो समाज से द्वेष, हिंसा और कलह जैसी बुराइयाँ मिट सकती हैं, और वही दिव्यता पूरे वातावरण में फैल सकती है जो दीपावली के दीयों की तरह उजाला बिखेरती है।

संबंधित ख़बरें
शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!