देहरादून। उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद से लेकर अब तक की राजनीतिक यात्रा को यदि व्यापक और गहराई से समझा जाए तो यह साफ तौर पर एक ऐसे दौर की कहानी सामने लाती है, जहां सत्ता की स्थिरता से ज्यादा नेतृत्व परिवर्तन की प्रवृत्ति हावी रही है। 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने इस पर्वतीय राज्य ने बीते 25 वर्षों में कई मुख्यमंत्री देखे, लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री अपना पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। यह स्थिति न केवल राजनीतिक अस्थिरता को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि उत्तराखंड की सत्ता में टिके रहना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं रहा। हालांकि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह संकेत स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आ रहे हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस परंपरा को तोड़ सकते हैं और पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले दूसरे नेता बन सकते हैं। राज्य की वर्तमान सियासी दिशा, संगठनात्मक संतुलन और नेतृत्व पर भरोसे की जो तस्वीर बन रही है, वह उत्तराखंड की राजनीति में एक नए स्थिर युग की शुरुआत की ओर इशारा करती दिखाई दे रही है।
अगर राज्य के राजनीतिक इतिहास को क्रमवार तरीके से देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अधिकतर मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल को पूरा करने से पहले ही पद से हटाए गए या उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। नारायण दत्त तिवारी का कार्यकाल इस लिहाज से एक मिसाल के रूप में सामने आता है, जिन्होंने 2 मार्च 2002 से 7 मार्च 2007 तक लगातार 5 साल 5 दिन तक सत्ता संभाली। उनका यह कार्यकाल न केवल सबसे लंबा रहा, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अनुभव, संगठन पर मजबूत पकड़ और राजनीतिक संतुलन के जरिए स्थिर शासन संभव है। इसके बाद से अब तक कोई भी मुख्यमंत्री इस तरह की निरंतरता हासिल नहीं कर पाया। वर्तमान में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कुल कार्यकाल, दोनों चरणों को मिलाकर, 4 साल 8 महीने 17 दिन का हो चुका है, जो उन्हें तिवारी के बाद सबसे लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले नेताओं की सूची में खड़ा करता है और यह संकेत देता है कि वह इस रिकॉर्ड को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच चुके हैं।

राज्य गठन के शुरुआती दौर में ही नेतृत्व परिवर्तन का सिलसिला शुरू हो गया था। पहली अंतरिम सरकार में बीजेपी ने नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन उनका कार्यकाल मात्र 11 महीने 20 दिन का ही रहा। इसके बाद भगत सिंह कोश्यारी को जिम्मेदारी दी गई, जिनका कार्यकाल भी बेहद छोटा, लगभग चार महीने का रहा। यह शुरुआती दौर इस बात का प्रमाण था कि पार्टी के अंदरूनी समीकरण और राजनीतिक खींचतान किस तरह नेतृत्व को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बाद वर्ष 2002 में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस सत्ता में आई। कांग्रेस ने नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया, जिन्होंने अपने अनुभव और संतुलित नेतृत्व के दम पर न केवल सरकार को स्थिर रखा, बल्कि पूरे पांच साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा किया। यह उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।
वर्ष 2007 में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन हुआ और बीजेपी ने सरकार बनाई। भुवन चंद्र खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन उनका कार्यकाल भी अपेक्षाकृत छोटा रहा और वे लगभग दो साल 108 दिन बाद ही पद से हटा दिए गए। इसके बाद रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन वे भी करीब 2 साल 75 दिन के भीतर ही पद से हट गए। इसके बाद बीजेपी ने फिर से भुवन चंद्र खंडूड़ी को मौका दिया, लेकिन उनका दूसरा कार्यकाल भी मात्र छह महीने तक ही सीमित रहा। यह पूरा घटनाक्रम इस बात को दर्शाता है कि उस समय पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर अस्थिरता और प्रयोग की प्रवृत्ति काफी ज्यादा थी, जिसने सरकार की निरंतरता को प्रभावित किया और जनता के बीच भी एक अस्थिर राजनीतिक छवि बनाई।

साल 2012 में सत्ता फिर कांग्रेस के हाथ में आई, लेकिन इस बार भी स्थिरता कायम नहीं रह सकी। विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन 2013 की केदारनाथ आपदा ने राज्य की राजनीति को झकझोर कर रख दिया। आपदा प्रबंधन को लेकर उठे सवालों और पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष के चलते विजय बहुगुणा को पद छोड़ना पड़ा और हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया। हरीश रावत ने करीब 3 साल 45 दिन तक शासन किया, लेकिन उन्हें भी बगावत, विधायकों के दल बदल और राष्ट्रपति शासन जैसी जटिल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपनी सरकार को बचाने में सफलता हासिल की, जो उनकी राजनीतिक क्षमता को दर्शाता है, लेकिन यह भी स्पष्ट करता है कि उत्तराखंड में स्थिर शासन बनाए रखना कितना कठिन रहा है।
2017 में एक बार फिर बीजेपी सत्ता में आई और त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया। उनका शुरुआती कार्यकाल स्थिर और संतुलित माना गया, जिससे यह उम्मीद जगी कि वे पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सकते हैं। लेकिन चार साल पूरे होने से कुछ दिन पहले ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन उनका कार्यकाल मात्र 115 दिनों तक ही सीमित रहा। यह घटनाक्रम फिर इस बात को पुष्ट करता है कि उत्तराखंड की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी थी और हाईकमान की भूमिका इसमें निर्णायक रही।
इसी बीच बीजेपी ने एक नया और अपेक्षाकृत साहसिक फैसला लेते हुए पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया, जो उस समय केवल खटीमा से विधायक थे। उनका पहला कार्यकाल 262 दिनों का रहा, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की। हालांकि धामी खुद चुनाव हार गए थे, लेकिन पार्टी ने उन पर भरोसा जताते हुए उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया और उपचुनाव में चंपावत से जीत के बाद उन्होंने अपनी स्थिति को और मजबूत कर लिया। यह निर्णय बीजेपी की रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत था, जिसमें बार-बार नेतृत्व परिवर्तन की बजाय स्थिरता और निरंतरता को प्राथमिकता दी गई।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक गहरी रणनीतिक सोच का हिस्सा है। राजनीतिक जानकार राजीव नयन बहुगुणा का कहना है कि पहले बीजेपी ने कई बार नेतृत्व परिवर्तन को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन अब पार्टी ने धामी के नेतृत्व को स्थिर बनाए रखने का फैसला किया है। इसके पीछे संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति और जनता के बीच स्थिर शासन का संदेश देने की मंशा शामिल है। उनका यह भी कहना है कि वर्तमान सरकार में अब तक किसी बड़े स्तर की नाराजगी या बगावत सामने नहीं आई है, जो इस बात का संकेत है कि राजनीतिक प्रबंधन पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुआ है।
मौजूदा सियासी परिदृश्य में यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए तो यह भी स्पष्ट होता है कि बीजेपी अब उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति तैयार कर रही है। बार-बार मुख्यमंत्री बदलने से जो अस्थिरता की छवि बनती थी, उससे पार्टी अब बाहर निकलना चाहती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लगातार बनाए रखना इस दिशा में एक बड़ा संकेत है, जिससे जनता के बीच भरोसा कायम किया जा सके। स्थिर नेतृत्व के जरिए विकास कार्यों को गति देना और योजनाओं का निरंतर क्रियान्वयन सुनिश्चित करना भी इस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिससे चुनावों में सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
जनता के नजरिए से भी यह बदलाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पहले बार-बार मुख्यमंत्री बदलने से विकास कार्यों की गति प्रभावित होती थी और नीतियों में निरंतरता नहीं बन पाती थी। लेकिन अब यदि एक ही नेतृत्व लंबे समय तक बना रहता है तो योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन संभव हो पाता है। यही कारण है कि वर्तमान में धामी सरकार को स्थिरता के रूप में देखा जा रहा है, जो राज्य के दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी है। यह धारणा भी मजबूत हो रही है कि यदि यह स्थिरता बनी रहती है, तो उत्तराखंड की राजनीति में एक नया ट्रेंड स्थापित हो सकता है।
केंद्र नेतृत्व की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में बेहद महत्वपूर्ण रही है। पहले जहां हाईकमान समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन करता रहा, वहीं अब धामी के मामले में उसने स्थिरता बनाए रखने का निर्णय लिया है। यह बदलाव दर्शाता है कि पार्टी अब राज्य में एक मजबूत और स्थिर नेतृत्व स्थापित करना चाहती है। इससे संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी होती है। यह रणनीति भविष्य के चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अपनाई गई प्रतीत होती है।
बीजेपी और कांग्रेस के बीच इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी जारी है। महेंद्र भट्ट का कहना है कि राज्य सरकार बेहतर काम कर रही है और किसी भी प्रकार के बदलाव की जरूरत नहीं है, जबकि हरक सिंह रावत ने धामी के कार्यकाल की तुलना तिवारी से करना उचित नहीं बताया और सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। इन बयानों से यह साफ है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अभी भी पूरी तरह सक्रिय है और आने वाले समय में यह और तेज हो सकती है।
कुल मिलाकर वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अब उस मुकाम के बेहद करीब हैं, जहां वे पांच साल का कार्यकाल पूरा कर उत्तराखंड की राजनीति में एक नई मिसाल कायम कर सकते हैं। हालांकि उनके सामने चुनौतियां भी मौजूद हैं, जिनमें कानून व्यवस्था, विवादित मुद्दे और जन अपेक्षाएं शामिल हैं, लेकिन यदि वे इन सभी को संतुलित तरीके से संभालते हैं, तो उनका कार्यकाल न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि होगा, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीतिक संस्कृति में स्थिरता और निरंतरता का एक नया अध्याय भी लिख सकता है।





