काशीपुर। ऐतिहासिक चैती मेले की पवित्रता और उल्लास उस वक्त गहरे विवादों के घेरे में आ गया, जब वहां तैनात सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली महिला बाउंसरों ने एक गरीब दुकानदार महिला के साथ बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। धर्म और मनोरंजन के इस संगम में सरेबाजार हुई इस हिंसा ने न केवल प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल उठाए, बल्कि सुरक्षा के नाम पर तैनात इन महिला बाउंसरों के असली चेहरे को भी बेनकाब कर दिया। उत्तर प्रदेश के जनपद रामपुर के ग्राम धरमपुरा, टांडा से रोजी-रोटी की उम्मीद लेकर आई सुषमा, जो मेले में पकोड़ी की एक छोटी सी अस्थायी ठेली लगाकर अपने परिवार का पेट पाल रही थी, उसे अंदाजा भी नहीं था कि 2 अप्रैल 2026 की शाम उसके लिए किसी खौफनाक सपने जैसी साबित होगी। जब दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद सुषमा अपना सामान समेटकर घर लौटने की तैयारी कर रही थी, तभी झूले के पास सुरक्षा में तैनात महिला बाउंसरों का एक झुंड वहां आ धमका और बिना किसी वाजिब वजह के उस बेबस महिला से उलझने लगा।
हैरत की बात यह रही कि जब सुषमा ने उन आक्रोशित बाउंसरों को शांत करने और विवाद को सुलझाने का विनम्र प्रयास किया, तो वे और अधिक हिंसक हो उठीं और देखते ही देखते 8 से 10 महिला बाउंसरों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वह मंजर रूह कंपा देने वाला था क्योंकि रक्षक ही अब भक्षक बन चुके थे; इन बाउंसरों ने सरेआम सुषमा के बाल पकड़कर उसे झकझोरा और उसके चेहरे पर अंधाधुंध थप्पड़ बरसाने शुरू कर दिए। गालियों की बौछार और शारीरिक प्रहार के बीच सुषमा की चीखें मेले के शोर में दबकर रह गईं, लेकिन उन जालिमों का दिल नहीं पसीजा। इस हिंसक झड़प और खींचतान के दौरान सुषमा की मेहनत की कमाई से खरीदी गई कान की बाली भी कहीं गिरकर खो गई, जो उसके लिए एक बड़ा आर्थिक आघात था। इतना ही नहीं, जब वहां मौजूद जागरूक नागरिकों ने इस जुल्म का वीडियो बनाने की कोशिश की, तो उन बाउंसरों ने उनके साथ भी बदतमीजी की और पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी देकर दहशत का माहौल पैदा कर दिया।
इस सनसनीखेज वारदात के बाद पीड़ित महिला सुषमा ने साहस जुटाकर आईटीआई कोतवाली में तहरीर दी, जिसके बाद पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्काल प्रभाव से अज्ञात 8-10 महिला बाउंसरों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 115, 352 और 351(2) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। प्रभारी निरीक्षक के नेतृत्व में गठित पुलिस टीम ने बिना समय गंवाए छापेमारी की और मेले में आतंक का पर्याय बनीं सात आरोपी महिला बाउंसरों को दबोच लिया। खाकी का शिकंजा कसते ही इन बाउंसरों की सारी हेकड़ी हवा हो गई और पुलिस ने उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच माननीय न्यायालय सिविल जज (जू.डि.) पूनम टोडी के समक्ष पेश किया। न्यायालय परिसर में उस वक्त भारी गहमागहमी देखने को मिली, जब पुलिस ने अपनी जांच रिपोर्ट और गिरफ्तारी का ब्यौरा पेश किया, वहीं दूसरी ओर बचाव पक्ष के वकील भी इन आरोपियों को बचाने के लिए कानूनी दलीलों के साथ पूरी तरह तैयार खड़े थे।
अदालत की दहलीज पर शुरू हुई इस कानूनी जंग में आरोपित महिला बाउंसरों की तरफ से पैरवी करने के लिए वरिष्ठ अधिवक्तागण अमरीश अग्रवाल, मुनिदेव विश्नोई एवं भारत भूषण ने कमान संभाली और पुलिसिया कार्यवाही पर तीखे प्रहार किए। इन दिग्गज अधिवक्ताओं ने न्यायालय के समक्ष यह तर्क दिया कि पुलिस द्वारा बताई गई मारपीट की ऐसी कोई भी घटना असल में घटित ही नहीं हुई है और उनके मुवक्किलों को गलत तरीके से फंसाया गया है। बचाव पक्ष के मुख्य अधिवक्ता अमरीश अग्रवाल ने विशेष रूप से माननीय उच्चतम न्यायालय के ‘अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए पुलिस को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने पुरजोर तरीके से कहा कि पुलिस ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया में तय नियमों का पालन नहीं किया और बिना किसी अनिवार्य आधार के इन महिलाओं को हिरासत में लिया, जो सीधे तौर पर कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन और मानवाधिकारों की अनदेखी है।
न्यायालय कक्ष के भीतर चली लंबी बहस और कानूनी दांव-पेंच के बीच सबकी निगाहें न्यायाधीश पूनम टोडी के फैसले पर टिकी थीं, जहां एक तरफ न्याय की पुकार करती सुषमा थी और दूसरी तरफ कानूनी प्रक्रिया की तकनीकी खामियां। अधिवक्ता अमरीश अग्रवाल के तर्कों और सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग को गहराई से सुनने और केस डायरी का सूक्ष्म अवलोकन करने के बाद, न्यायालय सिविल जज (जू.डि.) पूनम टोडी ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। माननीय अदालत ने पाया कि पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी में अर्नेश कुमार जजमेंट के प्रोटोकॉल का पूरी तरह अनुपालन नहीं दिखाई दे रहा था, जिसके आधार पर न्यायालय ने सातों आरोपी महिला बाउंसरों को तुरंत जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया। जेल की सलाखों तक पहुंचने से ठीक पहले मिली इस बड़ी राहत ने जहां बचाव पक्ष में खुशी की लहर दौड़ाई, वहीं इस फैसले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि अदालतें केवल भावनाओं पर नहीं बल्कि ठोस कानूनी साक्ष्यों और प्रक्रियाओं पर आधारित निर्णय लेती हैं।
इस पूरे प्रकरण ने काशीपुर के चैती मेले की सुरक्षा व्यवस्था और बाउंसर संस्कृति पर एक गहरा सवालिया निशान लगा दिया है, जो भविष्य में मेलों के आयोजन और वहां तैनात निजी सुरक्षाकर्मियों के व्यवहार पर कड़ी निगरानी की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यद्यपि आरोपी महिलाएं फिलहाल जमानत पर बाहर आ गई हैं, लेकिन सुषमा के साथ हुई वह बदसलूकी और उसके आत्मसम्मान को पहुंची ठेस आज भी क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। पुलिस प्रशासन के लिए यह मामला एक सबक की तरह सामने आया है कि त्वरित कार्यवाही के जोश में कानूनी बारीकियों और उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों का पालन करना कितना अनिवार्य है। अब देखना यह होगा कि आगे की जांच में क्या नए तथ्य सामने आते हैं और क्या उस गरीब दुकानदार महिला सुषमा को उसकी खोई हुई कान की बाली और वह इंसाफ मिल पाएगा जिसकी उम्मीद लेकर उसने थाने की चौखट पर कदम रखा था।





