spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडगदरपुर से दिल्ली तक गूंजा शक्ति संघर्ष, भाजपा में टला टकराव पर...

गदरपुर से दिल्ली तक गूंजा शक्ति संघर्ष, भाजपा में टला टकराव पर सियासी आग बरकरार

अरविंद पांडे के समर्थन में जुटने वाले दिग्गजों की तैयारी, केंद्रीय हस्तक्षेप से आख़िरी वक्त पर बदला सियासी समीकरण, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की चुनौती और पार्टी के भीतर उभरती अंदरूनी खींचतान ने बढ़ाई राजनीतिक बेचैनी।

काशीपुर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड की राजनीति में अचानक पैदा हुई हलचल ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के भीतर चल रही गुटबाज़ी को एक बार फिर सार्वजनिक मंच पर ला खड़ा किया है। जिस शक्ति प्रदर्शन की चर्चा बीते कई दिनों से राजनीतिक गलियारों में थी, वह ऐन वक्त पर टल गया, लेकिन उसके पीछे छिपी सियासी पटकथा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। गदरपुर में होने वाला यह प्रदर्शन केवल एक स्थानीय आयोजन नहीं था, बल्कि इसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कार्यशैली और निर्णयों के विरुद्ध एक संगठित संदेश के रूप में देखा जा रहा था। पार्टी के भीतर मौजूद असंतोष, नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका, इन सभी पहलुओं ने इस घटनाक्रम को साधारण से कहीं अधिक गंभीर बना दिया। यही कारण है कि शक्ति प्रदर्शन भले ही टल गया हो, लेकिन इसके असर और संकेत अभी दूर तक महसूस किए जा रहे हैं।

दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम की धुरी गदरपुर के विधायक अरविंद पांडे थे, जिन्होंने बीते कुछ समय से राज्य सरकार और खास तौर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के खिलाफ खुला रुख अपनाया हुआ था। काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह की हत्या के मामले में सीबीआई जांच की मांग को लेकर अरविंद पांडे लगातार मुखर थे। यह मुद्दा केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक टकराव का कारण बन गया। सरकार द्वारा अतिक्रमण के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के दौरान अरविंद पांडे के कैंप कार्यालय पर नोटिस चस्पा होना इसी टकराव का परिणाम माना गया। इसके बाद यह चर्चा तेज हो गई कि मुख्यमंत्री धामी का बुलडोजर कभी भी वहां पहुंच सकता है, जिससे सियासी तनाव और बढ़ गया।

इसी पृष्ठभूमि में गदरपुर में एक बड़े शक्ति प्रदर्शन की तैयारी शुरू हुई, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के कई दिग्गज नेताओं के शामिल होने की चर्चा ने राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, गढ़वाल के सांसद अनिल बलूनी, हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक, डीडीहाट के विधायक बिशन सिंह चुफाल, पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी के नाम इस आयोजन से जोड़े जा रहे थे। बताया जा रहा था कि ये सभी नेता गदरपुर पहुंचकर अरविंद पांडे के समर्थन में खुलकर खड़े होने वाले थे। यह दृश्य न केवल पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन को प्रभावित करता, बल्कि सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की राजनीतिक स्थिति को चुनौती देता।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इस प्रस्तावित शक्ति प्रदर्शन का समय भी बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि उसी दौरान देश के गृहमंत्री अमित शाह उत्तराखंड दौरे पर थे। माना जा रहा है कि गदरपुर में एकजुटता दिखाकर यह संदेश दिया जाना था कि पार्टी के भीतर एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री धामी की नीतियों से असहमत है। खास बात यह भी थी कि वर्ष 2017 से 2021 के बीच, जब त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री थे और अरविंद पांडे मंत्री पद पर थे, तब दोनों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहे थे। बावजूद इसके, पुराने मतभेदों को भुलाकर इन नेताओं का एक मंच पर आना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा था।

हालांकि, यह शक्ति प्रदर्शन अंतिम समय पर टल गया, और इसके पीछे राष्ट्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप को मुख्य कारण बताया जा रहा है। स्वयं अरविंद पांडे ने यह स्वीकार किया कि उन्हें पार्टी के शीर्ष नेताओं का फोन आया था, जिसके बाद उन्होंने कोई ऐसा कदम न उठाने का निर्णय लिया, जिससे पार्टी की छवि पर सवाल खड़े हों। अरविंद पांडे का दावा है कि उनके पास तीस से अधिक विधायकों का समर्थन था, लेकिन पार्टी अनुशासन और संगठनात्मक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया। यही नहीं, उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से भी गदरपुर न आने का आग्रह किया।

इसी बीच, यह चर्चा भी तेज रही कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस पूरे घटनाक्रम को भांपते हुए अपने पत्ते अंत तक संभालकर रखे। कहा जा रहा है कि उन्होंने सीधे आलाकमान तक स्थिति की जानकारी पहुंचाई, जिसके बाद ऊपर से स्पष्ट निर्देश जारी हुए और सभी नेताओं को अपने-अपने कार्यक्रम रद्द करने पड़े। सोशल मीडिया पर इस तरह की चर्चाएं आम रहीं कि किस तरह केंद्रीय नेतृत्व के एक संकेत मात्र से संभावित शक्ति प्रदर्शन हवा में ही ठंडा पड़ गया। इससे यह संदेश भी गया कि पार्टी के भीतर अंतिम निर्णय का अधिकार अब भी शीर्ष नेतृत्व के हाथ में ही है।

इसके बावजूद, यह कहना गलत होगा कि मामला पूरी तरह शांत हो गया है। शक्ति प्रदर्शन भले ही बड़े नेताओं की मौजूदगी में नहीं हो सका, लेकिन अरविंद पांडे ने गदरपुर में अपने दम पर ताकत दिखाने की कोशिश जरूर की। उनके समर्थक, पार्टी कार्यकर्ता और कई किसान वहां एकत्र हुए, जहां उन्होंने एक बार फिर सुखवंत सिंह के मामले में सीबीआई जांच की मांग दोहराई। इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि अरविंद पांडे के पास जमीनी स्तर पर समर्थन मौजूद है और वे पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। यह प्रदर्शन भले ही सीमित था, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ बड़े माने जा रहे हैं।

अब इस पूरे घटनाक्रम ने एक और गंभीर सवाल को जन्म दे दिया है, जो सीधे सरकार की कार्रवाई से जुड़ा है। क्या अरविंद पांडे का कथित अवैध अतिक्रमण बचाने के लिए पार्टी के बड़े नेता एकजुट हो रहे थे, या यह केवल राजनीतिक समर्थन का मामला था? यदि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बुलडोजर अरविंद पांडे के कैंप कार्यालय पर नहीं चलता है, तो इसका संदेश प्रदेश की जनता में क्या जाएगा, यह सवाल लगातार उठ रहा है। सरकार पहले ही नोटिस जारी कर चुकी है और निर्माण को अतिक्रमण की जद में बताया गया है, ऐसे में कार्रवाई से पीछे हटना आसान नहीं होगा।

दूसरी ओर, यदि यह निर्माण तोड़ा जाता है, तो इसके भी राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे। इसे यह कहकर पेश किया जा सकता है कि सरकार ने बिना भेदभाव के कार्रवाई की और पार्टी के अपने नेता को भी नहीं बख्शा। लेकिन साथ ही यह भी तय है कि इससे पार्टी के भीतर असंतोष और गहराएगा। अरविंद पांडे जिस तरह खुलकर सामने आए हैं, उससे उन्हें यह भरोसा जरूर मिला है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के खिलाफ भीतर ही भीतर विरोध करने वाला एक वर्ग उनके साथ खड़ा है, भले ही वह अभी खुलकर सामने न आ रहा हो।

अंततः, इस पूरे प्रकरण ने उत्तराखंड भाजपा की आंतरिक राजनीति को एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। आने वाले समय में यह देखना बेहद अहम होगा कि पार्टी नेतृत्व इस संतुलन को कैसे साधता है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी स्थिति को कितनी मजबूती से कायम रख पाते हैं। गदरपुर का टला हुआ शक्ति प्रदर्शन भले ही फिलहाल शांत दिखाई दे, लेकिन इसके नीचे दबा असंतोष किसी भी समय फिर उभर सकता है। सवाल अब यही है कि भविष्य में उत्तराखंड भाजपा की राजनीति में किसका पलड़ा भारी रहेगा और कौन वास्तव में बड़ा शक्ति प्रदर्शन कर पाएगा।

संबंधित ख़बरें
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!