spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडक्या उत्तराखंड कांग्रेस की जड़ों में हरीश रावत का सियासी तेजाब पार्टी...

क्या उत्तराखंड कांग्रेस की जड़ों में हरीश रावत का सियासी तेजाब पार्टी के भविष्य को कर रहा है पूरी तरह स्वाहा?

लगातार चुनावी हार और विवादित फैसलों के बोझ तले दबे हरीश रावत की जिद क्या अब देवभूमि में कांग्रेस की लुटिया डुबोने वाली है या फिर आलाकमान इस 'सियासी तेजाब' से संगठन को बचाने का साहस दिखाएगा?

उत्तराखंड। प्रदेश की राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक ही यक्ष प्रश्न गूंज रहा है कि क्या ‘हरदा’ के नाम से विख्यात हरीश रावत अब कांग्रेस के लिए केवल एक बोझ बनकर रह गए हैं? देवभूमि के राजनैतिक फलक पर पांच दशकों तक अपनी चमक बिखेरने वाले इस दिग्गज नेता की प्रासंगिकता आज उस मोड़ पर खड़ी है, जहां उनके अपने ही साथी उन्हें ‘सियासी तेजाब’ की संज्ञा देने लगे हैं। कांग्रेस की जड़ों को मजबूत करने के बजाय, रावत की हालिया कार्यप्रणाली और उनके नेतृत्व में मिली लगातार शर्मनाक हार ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उनका मोह अब संगठन को गर्त में धकेल रहा है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जो दुर्गति हुई, उसका सीधा सेहरा उनके रणनीतिक कौशल की विफलता पर बांधा जा रहा है। जिस नेता ने खुद को उत्तराखंडियत का प्रतीक बनाया, वह आज अपनी ही पार्टी के भीतर हाशिए पर जाने की कगार पर है, फिर भी उनकी सत्ता की भूख शांत होने का नाम नहीं ले रही है।

राज्य की सियासत के पन्नों को पलटें तो हरीश रावत का चुनावी ग्राफ उनकी गिरती हुई साख की गवाही खुद देता है। 2017 में जब पूरा चुनाव ‘रावत के नाम’ पर लड़ा गया, तब कांग्रेस को इतिहास की सबसे बड़ी शिकस्त झेलनी पड़ी और भारतीय जनता पार्टी ने 57 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया। इसके बाद भी जब 2022 में उन्हें चुनाव अभियान समिति का सर्वेसर्वा बनाया गया, तो नतीजे फिर वही ढाक के तीन पात रहे और भाजपा दोबारा सत्ता में लौट आई। यह विडंबना ही है कि जो नेता खुद को प्रदेश का सबसे बड़ा चेहरा मानता है, वह किच्छा, हरिद्वार ग्रामीण और लालकुआं जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों से चुनाव हार गया। लालकुआं में तो एक जिला पंचायत सदस्य मोहन सिंह ने उन्हें साढ़े सत्रह हजार से अधिक वोटों के अंतर से धूल चटा दी, जो उनके कद पर एक गहरा सवालिया निशान है।

धार्मिक तुष्टीकरण और विवादित फैसलों ने भी हरीश रावत की छवि को खासा नुकसान पहुँचाया है, जिसे भाजपा ने बखूबी लपका है। जुमे की नमाज की छुट्टी का मुद्दा हो या टोपी पहने हुए उनकी वायरल तस्वीरें, इन विवादों ने हिंदू बहुल उत्तराखंड में कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं पर मानों तुषारापात कर दिया। हालांकि हरीश रावत आज भी चौराहों पर खड़े होकर सजा भुगतने की चुनौती देते हैं, लेकिन जनता की अदालत में उनकी ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ वाली छवि उनके साथ स्थायी रूप से चिपक गई है। केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि असम और पंजाब जैसे राज्यों के प्रभारी के रूप में भी उनका कार्यकाल बेहद निराशाजनक रहा, जहां कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने पार्टी का पूरी तरह से सफाया कर दिया। देहरादून में पंजाब के नेताओं का आकर धरना देना और गुटबाजी का चरम पर पहुंचना, उनकी प्रबंधन क्षमता की कलई खोलने के लिए पर्याप्त है।

हरीश रावत की कार्यशैली ने न केवल बाहर बल्कि पार्टी के भीतर भी उनके लिए कई दुश्मन खड़े कर दिए हैं। विजय बहुगुणा से लेकर हरक सिंह रावत और सुबोध उनियाल तक, जितने भी कद्दावर नेताओं ने कांग्रेस का दामन छोड़ा, उन सभी ने अपनी विदाई का मुख्य कारण हरीश रावत की तानाशाही और उपेक्षा को ही बताया। आज जब हरक सिंह रावत वापस पार्टी में आ चुके हैं और चुनाव प्रबंधन समिति की कमान संभाल रहे हैं, तब भी हरीश रावत उन्हें ‘प्रायश्चित’ का पाठ पढ़ाकर नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। उनके पुराने बेहद खास सहयोगी रहे रंजीत रावत भी आज उनके सबसे कट्टर विरोधियों में शुमार हैं। रामनगर सीट को लेकर पिता-पुत्र और सहयोगियों के बीच जो खींचतान चली, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि हरीश रावत अब अपनी विरासत को बचाने के लिए अपनों को ही राजनीति की बलि चढ़ाने से पीछे नहीं हटेंगे।

कांग्रेस आलाकमान के लिए अब यह तय करने का समय आ गया है कि क्या 75 वर्ष की आयु पार कर चुके हरीश रावत अब मार्गदर्शक मंडल के योग्य हैं या उन्हें अभी भी मैदान में रखा जाना चाहिए। दिल्ली के गलियारों में अब उन्हें वह तवज्जो नहीं मिल रही है जो कभी मिली करती थी, और शायद यही वजह है कि उनकी नाराजगी सोशल मीडिया पर पोस्ट्स के जरिए बाहर आती रहती है। क्या यह सही नहीं होगा कि वह अब अगली पंक्ति के नेताओं जैसे प्रीतम सिंह, यशपाल आर्य, गणेश गोदियाल और करण महारा के लिए रास्ता साफ करें? अगर हरीश रावत ने 2027 के चुनावों से पहले अपनी भूमिका को स्पष्ट नहीं किया, तो कांग्रेस की एकजुटता का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा। उनकी यह हठधर्मिता कि ‘मैं नहीं तो कोई नहीं’, कांग्रेस की लुटिया डुबोने के लिए काफी है और अब हाईकमान को कड़े फैसले लेकर संगठन को इस सियासी ‘तेजाब’ से बचाना ही होगा।

हरीश रावत के राजनीतिक भविष्य को लेकर उठ रहे ये सवाल आज उत्तराखंड की फिजाओं में तैर रहे हैं, जिनका उत्तर देना अब उनके लिए अनिवार्य हो गया है। सबसे पहला और तीखा सवाल उनकी नैतिकता पर है कि जब 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उनके नेतृत्व और चेहरे पर दांव लगाने के बाद कांग्रेस को शर्मनाक पराजय झेलनी पड़ी, तो वह किस आधार पर आज भी पार्टी के भीतर नेतृत्व की दावेदारी पेश कर रहे हैं? क्या यह सच नहीं है कि उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और ‘एकला चलो’ की हठधर्मी नीति ने ही विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत जैसे कद्दावर नेताओं को पार्टी छोड़ने पर मजबूर किया, जिससे कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा पूरी तरह चरमरा गया?

यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि खुद को प्रदेश का सबसे बड़ा जननेता बताने वाले रावत पिछले कई चुनावों से अपनी व्यक्तिगत सीट तक नहीं बचा पा रहे हैं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या उनकी कथित लोकप्रियता अब केवल सोशल मीडिया की पोस्ट्स और वर्चुअल सुर्खियों तक ही सीमित रह गई है? इसके अलावा, नमाज की छुट्टी और मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे संवेदनशील विवादों पर उनकी ढुलमुल नीति और अस्पष्टता ने भारतीय जनता पार्टी को ध्रुवीकरण का खुला मैदान दे दिया, जिसके लिए उन्हें अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। अंततः, जनता यह जानना चाहती है कि क्या वह अपनी राजनीति के ढलते सूरज को स्वीकार कर नई पीढ़ी के नेताओं जैसे प्रीतम सिंह या गणेश गोदियाल को मार्ग देंगे, या फिर सत्ता की अंतहीन चाह में वह इसी तरह कांग्रेस की जड़ों में अपने फैसलों का ‘तेजाब’ डालकर उसे कमजोर करते रहेंगे?

उत्तराखंड की राजनीति में अब वह समय आ चुका है जब हरीश रावत को आत्ममंथन करना होगा कि क्या उनका ‘गढ़वाली-कुमाऊंनी’ कार्ड और ‘मंडवे की रोटी’ वाला इमोशनल एजेंडा अब एक्सपायरी डेट के करीब पहुँच चुका है? कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी अब इस कदर सार्वजनिक हो चुकी है कि यशपाल आर्य, प्रीतम सिंह और करण महारा जैसे नेता दबी जुबान में यह स्वीकार करने लगे हैं कि रावत का हस्तक्षेप पार्टी के नए खून को फलने-फूलने नहीं दे रहा है। 2027 की चुनावी बिसात बिछने से पहले ही जिस तरह से टिकटों के वितरण और सांगठनिक पदों पर हरदा अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहे हैं, उसने पार्टी आलाकमान को भी धर्मसंकट में डाल दिया है। राज्य की जनता अब केवल पुराने अनुभवों की दुहाई नहीं, बल्कि एक भविष्योन्मुखी दृष्टि चाहती है, जिसे देने में हरीश रावत का पुराना ढर्रा पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। यदि उन्होंने समय रहते अपनी भूमिका को एक मार्गदर्शक के रूप में सीमित नहीं किया, तो इतिहास उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज करेगा जिसने अपनी व्यक्तिगत सत्ता की हठ में एक सशक्त विपक्ष की संभावनाओं का ही गला घोंट दिया। अब गेंद हरीश रावत के पाले में है—वे सम्मानजनक विदाई चुनते हैं या फिर पार्टी के पतन का कारण बनने वाली अपनी चिर-परिचित जिद पर अड़े रहते हैं, यही उत्तराखंड कांग्रेस का भविष्य तय करेगा।

संबंधित ख़बरें
शहर की भीड़भाड़ और बढ़ती बीमारियों के दौर में जब चिकित्सा जगत को नए और भरोसेमंद विकल्पों की तलाश थी, उसी समय काशीपुर से उभरती एक संस्था ने अपनी गुणवत्ता, विशेषज्ञता और इंसानी सेहत के प्रति समर्पण की मिसाल कायम कर दी। एन.एच.-74, मुरादाबाद रोड पर स्थित “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” आज उस भरोसे का नाम बन चुका है, जिसने अपनी प्रतिबद्धता, सेवा और उन्नत चिकित्सा व्यवस्था के साथ लोगों के दिलों में एक अलग स्थान स्थापित किया है। इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ इलाज का आधार केवल दवा नहीं, बल्कि रोगी की पूरी जीवनशैली, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार तक को समझकर उपचार उपलब्ध कराया जाता है। संस्था के केंद्र में वर्षों से सेवा कर रहे डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा का अनुभव, उनकी अंतरराष्ट्रीय योग्यता और कार्य के प्रति उनका गहरा समर्पण उन्हें चिकित्सा जगत में एक विशिष्ट पहचान देता है। अपनी अलग सोच और उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था के कारण यह संस्थान न केवल स्थानीय लोगों का विश्वास जीत रहा है, बल्कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले मरीज भी यहाँ भरोसे के साथ उपचार लेने पहुँचते हैं। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि “होम्योपैथिक चिकित्सा एवं अनुसंधान संस्थान” ने NABH Accreditation और ISO 9001:2008 व 9001:2015 प्रमाणपत्र हासिल कर यह साबित कर दिया है कि यहाँ इलाज पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया, गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के साथ किया जाता है। संस्थान की दीवारों पर सजे सैकड़ों प्रमाणपत्र, सम्मान और पुरस्कार इस बात के गवाह हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा ने उपचार को केवल पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा की जिम्मेदारी माना है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय चिकित्सा रत्न जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। रोगियों के प्रति संवेदनशीलता और आधुनिक तकनीकी समझ को मिलाकर जो उपचार मॉडल यहाँ तैयार हुआ है, वह लोगों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। संस्थान के भीतर मौजूद विस्तृत कंसल्टेशन रूम, मेडिकल फाइलों की सुव्यवस्थित व्यवस्था और अत्याधुनिक निरीक्षण प्रणाली इस बात को स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ मरीज को पूर्ण सम्मान और ध्यान के साथ सुना जाता है। पोस्टर में दर्शाए गए दृश्य—जहाँ डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मानित होते दिखाई देते हैं—उनकी निष्ठा और चिकित्सा जगत में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा को और मजबूत बनाते हैं। उनकी विदेशों में प्राप्त डिग्रियाँ—बीएचएमएस, एमडी (होम.), डी.आई.एच. होम (लंदन), एम.ए.एच.पी (यूके), डी.एच.एच.एल (यूके), पीएच.डी—स्पष्ट करती हैं कि वे केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिकित्सा अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। काशीपुर जैसे शहर में आधुनिक विचारों और उच्च गुणवत्ता वाले उपचार का ऐसा संयोजन मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। संस्था की ऊँची इमारत, सुगम पहुँच और प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित परिसर मरीजों को एक शांत, सकारात्मक और उपचार के अनुकूल माहौल प्रदान करता है। इसी माहौल में रोगियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली वैज्ञानिक होम्योपैथिक औषधियाँ उनके लंबे समय से चले आ रहे दर्द और समस्याओं को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखती हैं। उपचार के दौरान रोगी को केवल दवा देना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य पुनर्स्थापन पर यहाँ विशेष ध्यान दिया जाता है। यही वह कारण है कि मरीज वर्षों बाद भी इस संस्थान को याद रखते हुए अपने परिवार और परिचितों को यहाँ भेजना पसंद करते हैं। समाज के विभिन्न समूहों से सम्मान प्राप्त करना, राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों द्वारा सराहना मिलना, और बड़े मंचों पर चिकित्सा सेवाओं के लिए सम्मानित होना—ये सभी तस्वीरें इस संस्था की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को और अधिक उजागर करती हैं। पोस्टर में दिखाई देने वाले पुरस्कार न केवल उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि डॉ0 रजनीश कुमार शर्मा लगातार लोगों की सेहत सुधारने और चिकित्सा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने में जुटे हुए हैं। उनका सरल स्वभाव, रोगियों के प्रति समर्पण और ईमानदारी के साथ सेवा का भाव उन्हें चिकित्सा जगत में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व बनाता है। संपर्क के लिए उपलब्ध नंबर 9897618594, ईमेल drrajneeshhom@hotmail.com और आधिकारिक वेबसाइट www.cureme.org.in संस्थान की पारदर्शिता और सुविधा की नीति को मजबूत बनाते हैं। काशीपुर व आसपास के क्षेत्रों के लिए यह संस्थान विकसित और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन चुका है जहाँ लोग बिना किसी डर, संदेह या हिचकिचाहट के पहुँचते हैं। बढ़ते रोगों और बदलती जीवनशैली के समय में इस प्रकार की संस्था का होना पूरा क्षेत्र के लिए बड़ी राहत और उपलब्धि है। आने वाले समय में भी यह संस्था चिकित्सा सेवा के नए आयाम स्थापित करती रहेगी, यही उम्मीद लोगों की जुबान पर साफ झलकती है।
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!