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कॉलेज में वित्तीय गड़बड़ी की जांच रिपोर्ट छह महीने से दबाए जाने पर एबीवीपी आगबबूला

मुख्यमंत्री की कड़ाई के बाद तीन प्राचार्यों की समिति ने खंगाले थे दस्तावेज मगर सूचना के अधिकार में विसंगतियां सामने आने के बाद भी निष्कर्ष सार्वजनिक न होने से छात्रों में भारी आक्रोश।

काशीपुर। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय काशीपुर के भीतर बड़े पैमाने पर हुई कथित आर्थिक गड़बड़ियों और बजटीय धांधलियों को लेकर अब छात्र राजनीति का पारा पूरी तरह से गरमा चुका है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने इस गंभीर मुद्दे को लेकर एक बार फिर शासन और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। परिषद के छात्र नेताओं और पदाधिकारियों का सीधा आरोप है कि महाविद्यालय के भीतर छात्रों के विकास के लिए आने वाले फंड का जमकर दुरुपयोग किया गया है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच होने के बावजूद आज तक उसके नतीजों को ठंडे बस्ते में डाल कर रखा गया है। छात्र संगठन का कहना है कि वे इस मामले में अब किसी भी प्रकार की ढील बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं और जब तक सच्चाई सबके सामने नहीं आ जाती, उनका यह तीखा विरोध प्रदर्शन लगातार जारी रहेगा।

छात्रों के हितों की रक्षा करने वाले इस सबसे बड़े संगठन ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता का आयोजन करके इस पूरे मामले के पीछे की कड़ियों को परत-दर-परत मीडिया के सामने उजागर किया। परिषद के मुख्य पदाधिकारियों ने संवाददाताओं को संबोधित करते हुए बेहद सनसनीखेज खुलासे किए और बताया कि यह लड़ाई आज की नहीं है बल्कि इसके पीछे एक लंबा घटनाक्रम छुपा हुआ है। छात्र नेताओं ने पूरी तफ्सील से जानकारी देते हुए बताया कि 16 अक्टूबर 2025 को राज्य के मुखिया यानी मुख्यमंत्री को एक विस्तृत शिकायती पत्र भेजा गया था, जिसमें महाविद्यालय के भीतर चल रहे कथित वित्तीय घपलों की सूची संलग्न की गई थी। सूबे के मुखिया को भेजी गई इस अत्यंत गंभीर और गोपनीय शिकायत के बाद ही शासन के शीर्ष स्तर पर खलबली मची और अधिकारियों को इस मामले में तुरंत संज्ञान लेने के लिए विवश होना पड़ा था। मुख्यमंत्री कार्यालय से निर्देश जारी होने के बाद ही इस पूरे प्रकरण की परतों को टटोलने के लिए एक विशेष जांच टीम का गठन करने का फैसला लिया गया था, जिससे हड़कंप मच गया था।

शासन से हरी झंडी मिलने के तुरंत बाद ही इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच समिति का गठन अमलीजामा पहनने लगा था। इसी क्रम में 29 दिसंबर2 025 को तीन वरिष्ठ प्राचार्यों की एक विशेष और संयुक्त जांच समिति ने इस प्रतिष्ठित महाविद्यालय के परिसर में अपनी धमक दी थी और विभिन्न वित्तीय दस्तावेजों को खंगालना शुरू किया था। इस बेहद महत्वपूर्ण और हाई-प्रोफाइल समिति में लोहाघाट, रामनगर और किच्छा जैसे प्रतिष्ठित राजकीय महाविद्यालयों के प्राचार्यों को शामिल किया गया था ताकि जांच पूरी तरह से निष्पक्ष और प्रभावहीन रहे। इन तीनों अनुभवी शिक्षाविदों और प्रशासनिक अधिकारियों ने महाविद्यालय पहुंचकर कई दिनों तक विभिन्न विभागों के खातों, खरीद-फरोख्त के रजिस्टरों और बजटीय आवंटन से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों का बहुत ही बारीकी से निरीक्षण किया था। इस जांच के दौरान परिसर के भीतर भारी तनाव का माहौल देखा गया था और ऐसा लग रहा था कि जल्द ही इस संस्थान के भीतर छिपे सफेदपोश चेहरों का बेनकाब होना पूरी तरह से तय है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब छात्र संगठन ने अपनी खोजी रणनीति के तहत कानूनी हथियारों का इस्तेमाल करने का फैसला किया, जिससे प्रशासन की नींद उड़ गई। परिषद के पदाधिकारियों ने बेहद आक्रामक लहजे में आरोप लगाया कि जब उन्होंने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जरूरी जानकारियां मांगीं, तो मिले दस्तावेजों ने उनके होश उड़ा दिए। सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त सरकारी कागजातों और विभिन्न खरीद बिलों का जब गहराई से मिलान किया गया, तो उनमें भारी विसंगतियां, हेरफेर और विधिक त्रुटियां साफ तौर पर उजागर हुईं। छात्र नेताओं का दावा है कि बिलों में दिखाई गई सामग्री और वास्तव में धरातल पर मौजूद सामान की कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर पाया गया है। इन दस्तावेजों को देखने के बाद यह पूरी तरह से साफ हो गया कि संस्थान के भीतर वित्तीय नियमों को ताक पर रखकर मनमाने ढंग से काम किया जा रहा था, जिसके पुख्ता सबूत अब उनके पास मौजूद हैं।

विद्यार्थी परिषद के मुख्य रणनीतिकारों और वक्ताओं ने वित्तीय गड़बड़ियों के तौर-तरीकों पर सीधे सवाल दागते हुए कहा कि सरकारी खजाने से मिलने वाले बजट का घोर उल्लंघन किया गया है। उनका सबसे गंभीर और सीधा आरोप यह है कि विभिन्न मदों के लिए सरकार द्वारा आवंटित किए गए बजट का उपयोग उन निर्धारित जनहित और छात्रहित के कार्यों में न करके, अपनी मर्जी से अन्य अनुत्पादक कार्यों में ठिकाने लगा दिया गया। इतना ही नहीं, महाविद्यालय के लिए की गई विभिन्न प्रकार की बड़ी खरीदों और निर्माण कार्यों में आने वाली लागत को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। बाजार भाव से कई गुना अधिक कीमतों पर सामान की खरीदारी दिखाने और कागजों पर ही बजट को खपा देने की इस कथित कलाबाजी पर छात्र नेताओं ने गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। उनका कहना है कि छात्रों की सुविधाओं के नाम पर आने वाले पैसे का इस प्रकार बंदरबांट करना न केवल एक प्रशासनिक अपराध है बल्कि यह हजारों छात्रों के भविष्य के साथ किया गया एक बहुत बड़ा विश्वासघात भी है।

प्रेस वार्ता के दौरान अपनी मांगों को और अधिक धार देते हुए एबीवीपी के पदाधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा कि अब इस मामले में आर-पार का समय आ चुका है और वे किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेंगे। छात्र नेताओं का साफ तौर पर कहना है कि यदि शासन स्तर से कराई गई इस उच्च स्तरीय जांच में किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितताएं या भ्रष्टाचार पाया गया है, तो इसके लिए जिम्मेदार सभी बड़े और रसूखदार लोगों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कठोर दंडात्मक कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने एक निष्पक्ष रुख अपनाते हुए यह भी कहा कि यदि जांच समिति को सभी आरोप पूरी तरह से निराधार, मनगढ़ंत और झूठे मिले हैं, तो इस बात को भी पूरी प्रामाणिकता के साथ जनता के बीच सार्वजनिक किया जाना चाहिए। छात्र संगठन का मानना है कि सच चाहे जो भी हो, उसे सामने आना ही चाहिए ताकि संस्थान की साख पर लगा यह दाग हमेशा के लिए साफ हो सके और छात्रों का भ्रम दूर हो।

सच्चाई को छुपाने की कोशिशों और प्रशासनिक लेती-देती पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए छात्र नेताओं ने सरकार और जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली को पूरी तरह से कठघरे में खड़ा कर दिया है। उनका साफ तौर पर कहना है कि जांच समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद भी करीब छह महीने की एक लंबी अवधि बीत चुकी है, लेकिन इसके बावजूद जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक न किया जाना अपने आप में कई बड़े और गंभीर सवाल खड़े करता है। छह महीने बीत जाने के बाद भी आख़िर ऐसी क्या मजबूरी है कि उस रिपोर्ट को आम जनता और छात्रों की नजरों से दूर एक बंद आलमारी में छिपाकर रखा गया है। परिषद के नेताओं ने अंदेशा जताया है कि कहीं इस लंबी देरी के पीछे दोषियों को बचाने या मामले को पूरी तरह से रफा-दफा करने की कोई बड़ी प्रशासनिक साजिश तो काम नहीं कर रही है, क्योंकि इतनी लंबी खामोशी किसी बड़े तूफान का संकेत देती है।

इस पूरे गतिरोध और अनिश्चितता के माहौल को समाप्त करने के लिए छात्र संगठन ने अब सीधे राज्य के सर्वोच्च स्तर पर अपनी आवाज बुलंद करने का फैसला किया है। परिषद ने एक बार फिर सूबे के मुख्यमंत्री से इस संवेदनशील मामले में तुरंत व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने की पुरजोर गुहार लगाई है ताकि न्याय की उम्मीद जिंदा रह सके। उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि वे अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए संबंधित अधिकारियों को इस रहस्यमयी जांच रिपोर्ट को तत्काल प्रभाव से सार्वजनिक करने के आदेश जारी करें और दोषियों के खिलाफ आवश्यक कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कराएं। दूसरी ओर, छात्र संगठन के इस भारी हंगामे, तीखे बयानों और चौतरफा दबाव के बावजूद महाविद्यालय प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी टूटने का नाम नहीं ले रही है। संस्थान के शीर्ष अधिकारियों की ओर से अभी तक इस पूरे विवाद, आरोपों और जांच रिपोर्ट के संबंध में कोई भी आधिकारिक प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है, जिससे आम जनता और छात्रों के बीच असमंजस और संदेह का बाजार और ज्यादा गर्म हो गया है।

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