रामनगर(सुनील कोठारी)। शहरों की चकाचौंध और तेजी से बदलते सामाजिक व्यवहारों के बीच एक नई प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है, जिसने परंपरागत विवाह संस्कृतियों को लगभग उलट दिया है। कभी मोहल्लों के सामुदायिक विवाह स्थल और सुलभ मैरेज हॉल सामाजिक निकटता का आधार हुआ करते थे, जहां परिवारों के जोड़दृघटाव, अपनापन और सहजता एक साथ नजर आती थी। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। बीते कुछ वर्षों में सम्पन्नता के दिखावे, प्रतिष्ठा की होड़ और सामाजिक स्पर्धा ने विवाहों को शहरों से दूर स्थित महंगे रिसॉर्टों में शिफ्ट कर दिया है। यह बदलाव केवल स्थान परिवर्तन नहीं बल्कि पूरे वैवाहिक तंत्र में आए असामान्य परिवर्तन का संकेत है। दो से तीन दिन के विवाह समारोहों के लिए बेहद महंगे रिसॉर्ट पहले से बुक हो जाते हैं और मेजबान परिवार समय से कई दिन पहले वहां जाकर ठहर जाता है। मेहमान भी अपने वाहनों से सीधे इन्हीं दूरस्थ स्थलों पर पहुंचते हैं, जहां पहुंच पाना आम जनता के लिए आसान नहीं। जिनके पास चार पहिया वाहन है, वही सही मायने में समारोह का हिस्सा बन पाते हैं, जबकि दो पहिया साधनों वाले अनजाने में ही समारोह से बाहर रह जाते हैं। धीरे-धीरे यह नया चलन इस कदर मजबूत हुआ है कि निमंत्रण देने का तरीका तक बदल गया है और उसमें वह सहज मानवीय जुड़ाव लगभग गायब दिखाई देता है।
आज सामाजिक वर्गीकरण विवाह निमंत्रण की प्राथमिक शर्त बन गया है। परंपरागत आमंत्रण की जगह अब अलग-अलग श्रेणियां तैयार होने लगी हैं, जिनमें किसी को केवल लेडीज़ संगीत के लिए बुलाया जाता है, किसी को सिर्फ रिसेप्शन में शामिल होने का आमंत्रण मिलता है, किसी को केवल कॉकटेल पार्टी का हिस्सा बनाया जाता है और चुनिंदा परिवारों को सभी कार्यक्रमों का ‘फुल पैकेज’ निमंत्रित किया जाता है। इस तरह के वर्ग-विभाजन ने रिश्तों की आत्मीयता को बुरी तरह कमजोर कर दिया है। वे लोग जो वर्षों तक एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहे, अब निमंत्रण के स्तर पर ही अपनी ‘ग्रेडिंग’ तय होते देखते हैं। यह व्यवस्था अपनेपन की जगह केवल प्रतिष्ठा और लाभ-हानि के समीकरण पर टिकी दिखाई देने लगी है। विवाह कार्यक्रमों की तैयारी में अपार धन का निवेश अब ‘प्रभाव प्रदर्शन’ का प्रमुख माध्यम बन गया है, जहां मेहंदी, संगीत और अन्य रस्मों को भी एक तरह की प्रतिस्पर्धा में बदल दिया गया है।
महिला संगीत का जो कार्यक्रम कभी परिवार की हंसी-खुशी और सहजता का प्रतीक हुआ करता था, वह अब महंगे कोरियोग्राफरों की ट्रेनिंग का मंच बन चुका है। शादी से कई दिन पहले ही कलाकार बुला लिए जाते हैं, जो बड़े पैमाने पर रिहर्सल करवाते हैं, ताकि समारोह किसी फिल्मी दृश्य जैसा दिखे। मेहंदी की परंपरा, जो बेहद सरल और पारिवारिक माहौल में निभाई जाती थी, अब आर्टिस्टों के हवाले हो गई है, जिनकी फीस ही कई परिवारों के पूरे रस्म-रिवाज के बजट से अधिक होती है। इसके साथ ही निर्धारित ड्रेस कोड लागू कर दिया जाता है। मेहंदी में हरे रंग के परिधान अनिवार्य कर दिए जाते हैं और जो व्यक्ति किसी कारणवश उस रंग में नहीं पहुंच पाता, उसे कमतर समझे जाने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। यह अलगाव सामाजिक ढांचे के भीतर असमानता को बढ़ावा देता है और लोगों में हीनता की भावना भी पैदा करता है।
हल्दी की रस्म भी इसी दिखावटी प्रवृत्ति का नया प्रतीक बन गई है। पीले कुर्ते-पजामे में एक जैसा सजे-धजे लोगों की कतारें अब अधिकांश विवाहों का हिस्सा हैं। इस परंपरा के भीतर भी वही समस्या जन्म ले चुकी हैकृजो ड्रेस कोड में फिट नहीं बैठता, उसकी उपेक्षा होती है। विवाह का केंद्र जहां कभी स्नेह, सादगी और सहयोग की धुरी पर घूमता था, अब वह बाहरी साज-सज्जा और रंग-रूप पर अधिक निर्भर हो गया है। जल्दी ही बारात की तैयारी शुरू होती है, जहां एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिलता है। वही लोग जो किसी पुजारी को दक्षिणा देने में लंबी बहसें करते हैं, बारात के नृत्य-गीत में पांच से दस हजार रुपये बेहिचक खर्च कर देते हैं। यह घटना केवल धन-व्यवहार का अंतर नहीं बल्कि प्राथमिकताओं में आए सामाजिक विकार का संकेत है।

रिसेप्शन के दौरान अब स्टेज की चमक-दमक सिनेमाई सेट की तरह दिखने लगी है। पहले जहां दूल्हा-दुल्हन को परिजनों के बीच हंसी-मजाक, आशीर्वाद और मिलनसारियों के साथ वरमाला पहनाई जाती थी, अब दृश्य बदल गया है। मंच पर कृत्रिम धुएं की परतें छोड़ी जाती हैं, हल्का संगीत बजता है, और दूल्हा-दुल्हन को ‘स्टार मोमेंट’ की तरह अकेले खड़ा कर दिया जाता है। परिवारों को स्टेज से दूर कर दिया जाता है, ताकि फोटो और वीडियो किसी फिल्म के धीमे दृश्य जैसा दिखाई दे। प्रीवेडिंग शूट के वीडियो बड़े पर्दे पर चलते रहते हैं, और वास्तविक मिलन-जुलन की जगह डिजिटल दृश्यों को प्राथमिकता मिल जाती है। दूर-दराज से आए रिश्तेदारों का आपसी मेल-मिलाप, जो कभी विवाह समारोह का सबसे सुंदर हिस्सा हुआ करता था, अब लगभग खत्म हो गया है। अलग-अलग कमरे, अलग-अलग सुविधाएं और अलग-अलग व्यस्तताओं ने वह आत्मीयता छीन ली है, जिसके लिए रिश्तेदारी की धारणा बनी थी।
इस नए चलन में एक और चिंताजनक बात उभरकर सामने आती है-कमरों से बाहर निकलने की आदत खत्म हो रही है। लोग मोबाइल द्वारा बुलाए जाने पर ही रस्मों में हिस्सा लेते हैं, बाकी समय अपने-अपने निजी स्थानों में बिताते हैं। जो विवाह रिश्तों को जोड़ने का माध्यम माना जाता था, वह अब कई बार अहंकार की प्रदर्शनी बनकर रह गया है। कुछ लोग अपने व्यवहार से यह जताने में ही व्यस्त रहते हैं कि वे किस आर्थिक स्तर पर खड़े हैं, और अनायास ही दूसरों को कमतर आंकने की मानसिकता जन्म ले लेती है। इससे रिश्तों की नींव कमजोर होती है और विवाह जैसे सामाजिक अवसरों की मूल आत्मा आहत होती है।
समाज-शास्त्रियों का मानना है कि अत्यधिक सम्पन्न वर्ग ने स्वयं को अलग स्थापित करने की जो निरंतर कोशिश शुरू कर दी है, उसका दुष्प्रभाव मध्यम वर्ग तक पहुँच रहा है। जहां अमीरों के लिए यह केवल कुछ दिनों का तामझाम है, वहीं मध्यम वर्ग इस दिखावे का अनुसरण करते-करते कर्ज के बोझ तले दबने लगता है। चार-पांच घंटे के रिसेप्शन और कुछ घंटों के समारोह के लिए जीवन भर की मेहनत से बचाया गया धन खर्च कर देना सामान्य होता जा रहा है। सामाजिक प्रतिष्ठा की इस दौड़ में कई परिवार अपनी आर्थिक स्थिरता तक दांव पर लगा रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि लोग क्या कहेंगे, कैसी व्यवस्था होगी, किस तरह का रिसॉर्ट चुना गया-इन सब की चिंता में वे अपनी वास्तविक क्षमताओं को नजरअंदाज कर देते हैं।
इसी परिप्रेक्ष्य में श्रेष्ठता के दंभ से भरा यह चलन समाज के भीतर दूरी, प्रतिस्पर्धा और तनाव को जन्म दे रहा है। परंपराएं जो कभी मानवीय संवेदनाओं से भरी रहती थीं, वे अब खर्च और वैभव की अनिवार्य शर्तों में बदल चुकी हैं। ऐसे समय में मध्यम वर्गीय समाज के लिए यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि विवाह सादगी, संवेदना और अपनापन का अवसर होता है। दूसरों की देखा-देखी में कर्ज लेकर वैवाहिक जीवन की शुरुआत करना किसी भी परिवार के लिए विवेकपूर्ण निर्णय नहीं। विवाह के नाम पर अनावश्यक बोझ उठाने से बेहतर है कि अपनी क्षमता, परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुसार सादगी से समारोह संपन्न किए जाएं। समाज के विद्वानों का कहना है कि दिखावे की यह सामाजिक बीमारी यदि अनियंत्रित रूप से बढ़ती रही, तो आने वाले समय में विवाह कार्यक्रम केवल आर्थिक स्तर का संकेत बनकर रह जाएंगे, जबकि सामाजिक सामंजस्य और पारिवारिक रिश्तों की आत्मा कमजोर होती जाएगी। इसलिए यह आवश्यक है कि मध्यम वर्ग अपने विवेक से निर्णय ले, अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए विवाह जैसे पावन अवसर को वास्तविक अर्थों में उत्सव के रूप में मनाए।



