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उत्तराखंड में मतदाता पहचान अभियान तेज हुआ प्री एसआईआर से चुनावी तैयारी में नई रफ्तार

रामनगर(सुनील कोठारी)। आगामी चुनावी तैयारियों की हलचल एक नए मोड़ पर पहुंच चुकी है, क्योंकि पूरे देश में संचालित हो रहे विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम (एसआईआर) की आहट अब उत्तराखंड तक महसूस होने लगी है। राज्य के चुनावी तंत्र ने इस संभावित प्रक्रिया से पहले ही खुद को सक्रिय कर दिया है और प्री–एसआईआर गतिविधियों के जरिए मतदाता सूची को अधिक सटीक, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाने का क्रम शुरू कर दिया है। इस पहल का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रदेश का कोई भी पात्र नागरिक मताधिकार से वंचित न रह जाए और सूची में किसी प्रकार की अशुद्धि या दोहराव न रहे। दिलचस्प यह है कि खास तौर पर ‘प्रत्येक मतदाता तक पहुंच, समन्वय और संवाद’ नामक अभियान को केंद्र में रखकर एक ऐसा ढांचा तैयार किया जा रहा है, जिसके माध्यम से हर घर तक पहुंचना और मतदाताओं की उपस्थिति की पुष्टि करना अब बीएलओ के लिए अनिवार्य जिम्मेदारी बन गई है। बीएलओ प्रतिदिन 30 नागरिकों से मुलाकात कर रहे हैं, जिससे साल 2003 और 2025 की मतदाता सूची के आपसी मिलान की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सके। यह रणनीति न केवल कार्यभार को सुव्यवस्थित करेगी, बल्कि आगामी एसआईआर के दौरान समय और ऊर्जा दोनों की बड़ी बचत भी करेगी।

प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बीवीआरसी पुरुषोत्तम ने बताया कि भारत निर्वाचन आयोग अब तक 11 बार इस विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया को पूरे देश में लागू कर चुका है और उत्तराखंड में इसे आखिरी बार 2003 में अंजाम दिया गया था। इस बार इसे पहले बिहार में और फिर 12 अन्य राज्यों में चरणबद्ध रूप से लागू किया जा रहा है, जिससे आने वाले चुनावों में प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम निर्वाचक नामावली में सही स्वरूप में उपलब्ध हो सके। राज्य में प्री–एसआईआर को लेकर 40 वर्ष तक की आयु वाले उन मतदाताओं की पहचान की जा रही है, जिनके नाम 2003 और वर्तमान सूची दोनों में दर्ज हैं। ऐसे मतदाताओं से किसी भी प्रकार के दस्तावेज की मांग नहीं की जाएगी, जिससे उनकी पहचान पहले से ही सुनिश्चित मानी जाएगी। वहीं जिन व्यक्तियों का नाम किसी कारणवश 2003 की सूची में उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनके माता–पिता या दादा–दादी का नाम दर्ज है, उन्हें ‘प्रोजनी’ के तौर पर मैप किया जा रहा है। यह विशिष्ट प्रक्रिया राज्य में पहली बार इतने व्यापक पैमाने पर अपनाई जा रही है। प्रत्येक जिले में डीएम, ईआरओ और बीएलओ को इस कार्य हेतु स्पष्ट दिशा–निर्देश दिए गए हैं और मतदाताओं के लिए हेल्प डेस्क भी स्थापित की जा रही है, जिससे सहायता लेने में किसी को भी उलझन का सामना न करना पड़े।

प्री–एसआईआर के साथ–साथ एक बड़ी चुनौती राजनीतिक दलों द्वारा अपने बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) की नियुक्ति को लेकर सामने आ रही है। अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी विजय कुमार जोगदंडे ने जानकारी दी कि प्रदेश में कुल 11,733 बूथ हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से राजनीतिक दलों ने मिलकर केवल 4155 बीएलए ही नियुक्त किए हैं, जो अपेक्षित संख्या की तुलना में काफी कम है। एक पार्टी की ओर से 2836, दूसरी द्वारा 1259 और तीसरी पार्टी से केवल 60 बीएलए ही उपलब्ध कराए गए हैं। इससे बूथ स्तर पर किए जाने वाले कार्यों में सामंजस्य और पारदर्शिता को लेकर बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। चुनाव आयोग बार–बार पत्राचार कर दलों से अनुरोध कर रहा है कि वे जल्द से जल्द अपने बीएलए नियुक्त करें, क्योंकि बीएलए–1 को ही बीएलए–2 नामित करने का अधिकार होता है और एसआईआर के दौरान बीएलओ के साथ बीएलए की मौजूदगी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। आयोग दिसंबर में राजनीतिक दलों के साथ विस्तृत चर्चा करने वाला है ताकि इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके और पुनरीक्षण के दौरान किसी प्रकार की शिकायतों का समाधान मौके पर ही किया जा सके।

कार्यक्रम के दौरान सबसे संवेदनशील पहलू मतदाता सत्यापन का है। विशेष गहन पुनरीक्षण के समय बीएलओ को उन परिवारों या व्यक्तियों से किसी भी तरह के दस्तावेज नहीं लेने होंगे, जिनकी जानकारी 2003 की मतदाता सूची में उपलब्ध होगी। उम्मीद जताई जा रही है कि राज्य के 60 से 70 प्रतिशत मतदाता इस श्रेणी में आ सकते हैं, जिससे उनका सत्यापन अत्यंत सरल और त्वरित हो जाएगा। एसआईआर के बाद तैयार होने वाले फाइनल ड्राफ्ट को पब्लिश करने से पहले इसे बूथ लेवल एजेंटों के साथ साझा किया जाएगा, ताकि राजनीतिक दल अपना निरीक्षण कर सकें और यदि कोई संशोधन आवश्यक हो तो उसे समय से पहले चिह्नित कर सकें। ड्राफ्ट सूची पब्लिश होने के बाद भी मतदाता अपने नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने का अधिकार रखेंगे। यही नहीं, नाम, पते या अन्य किसी जानकारी में त्रुटि पाए जाने पर उसे भी सुधारा जा सकेगा। राज्य में नेपाल और भूटान मूल के ऐसे लोग भी रहते हैं, जिनकी शादी भारतीय नागरिकों से हुई है। जिन्हें यदि भारतीय नागरिकता प्राप्त है, तो उनके नाम सूची में आसानी से शामिल किए जा सकेंगे, लेकिन नागरिकता न होने की स्थिति में पहले कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी। यह स्पष्टीकरण चुनाव आयोग की पारदर्शिता और नियमों के प्रति कड़ाई का संकेत है।

बीएलओ फिलहाल केवल मतदाताओं से संपर्क स्थापित कर रहे हैं, और इस चरण में किसी भी मतदाता को दस्तावेज देने की जरूरत नहीं है। उद्देश्य सिर्फ यह पता लगाना है कि मतदाता अभी भी उसी पते पर निवास कर रहा है या किसी अन्य स्थान पर जा चुका है। यह कार्य एसआईआर शुरू होने से पहले डेटा को अधिक संगठित करने हेतु किया जा रहा है, जिससे पुनरीक्षण की वास्तविक चरण में किसी भी तरह की अव्यवस्था न हो। बीएलओ के लिए रोजाना 30 मतदाताओं से संपर्क अनिवार्य किया गया है, और अधिकारियों का कहना है कि एक महीने के भीतर राज्य के लगभग सभी मतदाताओं से बीएलओ की मुलाकात पूरी हो जाएगी। यह एक व्यापक और श्रमसाध्य अभियान है, लेकिन इसकी बदौलत आगामी चुनावी प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय और दुरुस्त होगी।

इन तैयारियों का प्रभाव प्रदेश के हर कोने में देखा जा सकता है। जहां एक ओर प्रशासनिक इकाइयां तकनीकी और दस्तावेजीय स्तर पर मजबूती सुनिश्चित कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर चल रहा घर–घर संपर्क अभियान नागरिकों में जागरूकता भी बढ़ा रहा है। बीएलओ द्वारा की जा रही लगातार दस्तक यह भी सुनिश्चित कर रही है कि युवा मतदाताओं से लेकर वरिष्ठों तक, कोई भी चुनावी सूची से अलग न रह जाए। यह अभियान राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की दिशा में निर्णायक कदम साबित हो रहा है। जैसे–जैसे एसआईआर की औपचारिक शुरुआत निकट आएगी, वैसे–वैसे इन तैयारियों की गति और भी तेज होगी और उत्तराखंड चुनावी पारदर्शिता का एक मिसाल बनकर सामने आएगा।

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