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अरावली के टूटते पहाड़, बढ़ता रेगिस्तान और खतरे में उत्तर भारत का भविष्य पर्यावरणीय संतुलन

धूल, जल संकट, वन्यजीवों के विस्थापन और अनियंत्रित विकास के दबाव में अरावली पर्वतमाला लगातार कमजोर हो रही है, जिससे दिल्ली से राजस्थान तक जलवायु, खेती, इतिहास और मानव जीवन पर गहरा संकट खड़ा होता दिख रहा है ।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। उत्तर भारत के भूगोल में फैली एक ऐसी पर्वत शृंखला है जो दिखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन अपने भीतर समय, इतिहास और पर्यावरण की असंख्य परतें समेटे हुए है। यह वह भूमि है जहां कोई तीखी हिमरेखा नहीं दिखती, न ही पर्यटकों को लुभाने वाले नाटकीय शिखर। यहां मौजूद पहाड़ियां समय की मार झेलती हुई घिसी, टूटी, छिली और बिखरती हुई प्रतीत होती हैं। ऐसा लगता है मानो पृथ्वी ने अपनी सबसे पुरानी स्मृतियां इन्हीं चट्टानों पर उकेर दी हों और फिर उन्हें समय के हवाले कर दिया हो। अरावली पर्वतमाला की यही विशेषता उसे अन्य पर्वत प्रणालियों से अलग करती है। इसकी ऊंचाइयां भले ही आंखों को चौंकाती न हों, लेकिन इसका अस्तित्व उत्तर पश्चिम भारत के जीवन चक्र के लिए अनिवार्य है। पर्यावरणीय दृष्टि से यह पर्वत शृंखला धूल को थामने, जल को संचित करने, जैव विविधता को संरक्षित रखने और वन्यजीवों के लिए आश्रय देने का मौन लेकिन सशक्त कार्य करती आई है। यही कारण है कि अरावली केवल एक भू-आकृति नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिक संरचना है।

वैज्ञानिक साहित्य और लोकप्रिय भूगोल दोनों ही अरावली पर्वतमाला को भारत की सबसे प्राचीन फोल्ड माउंटेन बेल्ट के रूप में स्वीकार करते हैं। उत्तर पश्चिम भारत में फैली यह पर्वत शृंखला लगभग छह सौ सत्तर किलोमीटर लंबी मानी जाती है और चार राज्यों से होकर गुजरती है। दिल्ली के समीप से आरंभ होकर यह दक्षिण हरियाणा और राजस्थान के भीतर गहराई तक प्रवेश करती है और अंततः गुजरात में अहमदाबाद के आसपास के मैदानी क्षेत्रों तक पहुंचती है। इतिहासकार श्री कृष्ण जुगनू बताते हैं कि यही वह पर्वतमाला है जिसके गर्भ से लूनी, बनास, साबरमती, साहिबी, बेड़च, खारी, सुकड़ी, कोठारी, सोम, जाखमी और कमला जैसी नदियां निकलती हैं, साथ ही निकी पुष्कर और जयसमंद जैसी झीलों का अस्तित्व भी इसी से जुड़ा है। राजस्थान के माउंट आबू में स्थित गुरु शिखर इसका सर्वाेच्च बिंदु है, जिसकी ऊंचाई लगभग एक हजार सात सौ बाइस मीटर है। यहां खड़े होकर जब बादल शरीर के समीप से गुजरते हैं, तब यह एहसास होता है कि यह पर्वत शृंखला भले ही बूढ़ी हो, लेकिन इसकी उपस्थिति आज भी उतनी ही प्रभावशाली है।

संस्कृत भाषा के ‘अरब दाबली’ शब्द से निकला ‘अरावली’ नाम राजस्थान के इतिहास में ‘अड़ावल’ के रूप में भी जाना जाता रहा है। यह पर्वत रेखा केवल प्राकृतिक संरचना नहीं, बल्कि एक तरह की रक्षा पंक्ति भी रही है, जिसने सदियों तक रेगिस्तान, धूल और जल संकट के विरुद्ध उत्तर भारत को सुरक्षा प्रदान की। भूगोलविदों के अनुसार हिमालय की तुलना में अरावली कहीं अधिक प्राचीन है। हिमालय आज भी युवा अवस्था में है और निरंतर बढ़ रहा है, जबकि अरावली अपनी दीर्घायु के अंतिम चरणों से गुजर रही है। भूविज्ञान की भाषा में यह पर्वत प्रणाली प्रोटेरोज़ोइक युग और उससे जुड़े लंबे भूगर्भीय घटनाक्रमों के दौरान बनी, जब भारतीय प्लेट ने प्राचीन क्रस्टखंडों से टकराव, रिफ्टिंग और रूपांतरण के कई चरण झेले। अरावली की चट्टानों में मौजूद दरारें उस जटिल भू-इतिहास की साक्षी हैं। लेकिन यही दरारें इसे नाजुक भी बनाती हैं, क्योंकि इसे नष्ट करने के लिए किसी विस्फोट की आवश्यकता नहीं, बल्कि निरंतर खनन, अंधाधुंध कटाई, सड़क निर्माण और कंक्रीट का विस्तार ही पर्याप्त है।

उत्तर भारत की ‘ग्रीन वॉल’ कहे जाने वाली अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल के पूर्व की ओर विस्तार को रोकने वाली एक प्राकृतिक दीवार है। यह दीवार केवल पत्थरों से नहीं बनी, बल्कि वनस्पति, मिट्टी की ढलानों और जल धारण क्षमता के संयुक्त तंत्र से खड़ी है। नागरिक संगठनों और तकनीकी आकलनों में अरावली के भीतर कई ‘गैप’ या रिक्त क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है, जहां पर्वतों की निरंतरता टूट चुकी है। इन टूटनों ने धूल और रेत के लिए रास्ते खोल दिए हैं, जिसका प्रभाव दिल्ली-एनसीआर में उठने वाली धूल भरी आंधियों के रूप में देखा जा सकता है। ये आंधियां अब केवल मौसमी घटना नहीं रहीं, बल्कि भूगोल में आई गड़बड़ी का संकेत बन चुकी हैं। अरावली में बढ़ते ये छेद एक गंभीर चेतावनी हैं कि यदि इस पर्वतमाला की संरचना और अधिक कमजोर हुई, तो उसका प्रभाव केवल स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत पर पड़ेगा। यह कहानी किसी एक कारण से नहीं जुड़ी, बल्कि अवैध खनन, वैध खनन के विस्तार, अनियोजित शहरीकरण और सड़क-रेल परियोजनाओं के संयुक्त दबाव का परिणाम है।

दिल्ली के भीतर स्थित रिज, जिसे अरावली की उत्तरी कड़ी के रूप में देखा जाता है, शहरी पारिस्थितिकी तंत्र का एक अहम हिस्सा है। आमतौर पर इसे एक पार्क या हरित क्षेत्र की तरह देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता में यह एक भू-रक्षात्मक संरचना है, जो धूल को रोकने, सूक्ष्म जलवायु बनाए रखने और जैव विविधता को संरक्षित रखने का कार्य करती है। दूर से देखने पर अरावली बंजर और शुष्क लग सकती है, लेकिन इसके भीतर जीवन की विविध परतें मौजूद हैं। तेंदुआ, धारीदार लकड़बग्घा, सियार, नीलगाय और अनेक पक्षी प्रजातियां इस पर्वतमाला को अपना घर मानती हैं। हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में तेंदुए की मौजूदगी की खबरें लगातार सामने आती रही हैं, जिससे वन्यजीव कॉरिडोर की आवश्यकता पर बहस तेज हुई है। यह मुद्दा केवल जानवरों के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की अखंडता से जुड़ा हुआ है। जब बड़े शिकारी छोटे और बिखरे हुए द्वीपों में सिमट जाते हैं, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है और अंततः विकास के नाम पर विनाश को正 ठहराने का रास्ता खुल जाता है।

अरावली के दक्षिणी हिस्से, विशेषकर उदयपुर और मेवाड़ क्षेत्र में, इस पर्वतमाला का इतिहास केवल प्राकृतिक नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक भी रहा है। पारिस्थितिक इतिहासकार डॉक्टर भानु कपिल का मानना है कि यदि अरावली पर्वतमाला न होती, तो महाराणा प्रताप छोटी सेना के सहारे उस समय के मुगल बादशाह अकबर की विशाल सेना का सामना नहीं कर पाते। महाराणा कुंभा द्वारा बनवाए गए बत्तीस दुर्ग, जिन्हें ‘ग्रीनफोल्ड’ के रूप में जाना जाता है, इसी पर्वत श्रृंखला की सामरिक शक्ति को दर्शाते हैं। आज विश्व के सबसे सुंदर शहरों में गिने जाने वाला उदयपुर भी अरावली के बिना सुरक्षित नहीं रह पाता। यह शहर अपने समय में एक ‘रिंगफेंस सिटी’ था, जो चारों ओर से प्राकृतिक और भौगोलिक सुरक्षा से घिरा हुआ था। अरावली ही वह मूल तत्व रही जिसने जल, जंगल और जमीन के संतुलन का दर्शन दिया। बिजोलिया किसान आंदोलन हो या भील आंदोलन, इन सभी संघर्षों के मूल में भी अरावली के जंगलों और संसाधनों का प्रश्न जुड़ा रहा, विशेषकर उस दौर में जब ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा जंगलों में शिकार को बढ़ावा दिया गया।

इस क्षेत्र में कभी केवड़े की नाल, चंदन और अन्य वनस्पतियों की घनी कतारें हुआ करती थीं। अरावली के कारण ही यहां जैव विविधता फलती-फूलती रही। एक समय था जब चंदन और सागवान के वृक्ष बड़ी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन बीसवीं सदी के मध्य में यह परिदृश्य तेजी से बदलने लगा। उन्नीस सौ उनचास से उन्नीस सौ चौवन के बीच केवल पांच वर्षों में मेवाड़ ने अरावली के लगभग एक सौ चालीस बाग खो दिए, यानी औसतन हर वर्ष अट्ठाईस बाग समाप्त हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्नीस सौ साठ के दशक तक आते-आते मेवाड़ में बाग लगभग विलुप्त हो गए। जंगलों के साथ-साथ शाकाहारी वन्यजीव भी तेजी से खत्म होते चले गए। ये आंकड़े अरावली की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए इतिहास के फॉरेंसिक सबूत की तरह हैं। पारिस्थितिक तंत्र का विघटन अक्सर धीरे-धीरे होता है, लेकिन जब इसके प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं, तब तक सुधार की गुंजाइश बहुत कम बचती है। बाघ का गायब होना केवल एक प्रजाति का अंत नहीं था, बल्कि पूरे जंगल के पिरामिड के ढहने की शुरुआत थी, जिसका असर पानी, मिट्टी, खेती और समाज तक फैला।

आज अरावली का भविष्य सरकारी तंत्र और अदालती आदेशों के बीच उलझा हुआ है, जहां विकास की भाषा अक्सर भूगोल को मौन कर देती है। इस पर्वतमाला के निरंतर क्षरण की मानवीय लागत अकल्पनीय है। चरवाहे, किसान और शहरों की सीमाओं पर रहने वाले समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। अरावली क्षेत्र के पुराने चरवाहे साफ महसूस कर रहे हैं कि हरियाली घटने के साथ गर्मी बढ़ी है। बारिश का पानी अब ढलानों पर रुकने के बजाय तेजी से बह जाता है, जिससे भूजल पुनर्भरण प्रभावित हुआ है। पशुओं के चरने के क्षेत्र सिकुड़ गए हैं और कई स्थानों पर जंगल अब सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि टकराव का कारण बन गया है। जब घर टूटते हैं, तो वन्यजीव और मनुष्य एक ही सीमित भूभाग में सिमट जाते हैं। यह कहानी केवल पर्यावरण बनाम विकास की नहीं है, बल्कि इस प्रश्न की है कि विकास की कीमत कौन चुका रहा है और कितनी भारी कीमत पर यह प्रगति हासिल की जा रही है।

फिर भी अरावली के संदर्भ में आशा की कुछ किरणें भी दिखाई देती हैं। गुरुग्राम का अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क इस बात का उदाहरण है कि गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त भूभाग को भी नागरिक पहल, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और लंबे धैर्य से फिर से जीवित किया जा सकता है। ऐसी परियोजनाएं यह संकेत देती हैं कि बहस केवल बचाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि बहाली को भी केंद्र में लाना होगा। हालांकि बहाली का अर्थ केवल पार्क बनाना नहीं है, बल्कि वन्यजीव कॉरिडोर को जोड़ना, खनन प्रबंधन को पारदर्शी बनाना और शहरी योजना में अरावली को ‘लैंड बैंक’ के बजाय ‘लाइफ सपोर्ट सिस्टम’ के रूप में देखना आवश्यक है। पर्यावरणविद टी एन साईसन के अनुसार, अस्सी के दशक में अरावली में केवल बारह गैप थे, जो अब कई गुना बढ़ चुके हैं। उस समय भी यह चिंता जताई गई थी कि दिल्ली की ओर रेगिस्तान का विस्तार हो सकता है। यह चेतावनी आज और भी प्रासंगिक हो चुकी है, क्योंकि जंगल का पतन केवल जंगल का पतन नहीं होता, बल्कि शासन, समाज और भविष्य के संतुलन को भी डगमगा देता है।

उत्तर भारत के भूगोल में अरावली पर्वतमाला केवल एक प्राकृतिक संरचना नहीं, बल्कि एक ऐसी ढाल है जो सदियों से हवा की दिशा को नियंत्रित करती, धूल और रेत को आगे बढ़ने से रोकती और वर्षा के जल को धरती में उतारकर जीवन की निरंतरता बनाए रखती रही है। यह पर्वत शृंखला थार मरुस्थल के विस्तार के विरुद्ध एक मौन प्रहरी की तरह खड़ी है, जो अपनी वनस्पति, मिट्टी की परतों और चट्टानी ढलानों के माध्यम से जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण का कार्य करती है। अरावली के जंगल और घाटियां न केवल नदियों और झीलों को जीवन देती हैं, बल्कि मानव बस्तियों, खेती और पशुपालन के लिए भी आधार तैयार करती हैं। इसके बावजूद आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में इस पर्वतमाला को लगातार काटा, खोदा और कमजोर किया जा रहा है, जिससे इसका प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। आज सवाल यह नहीं रह गया है कि अरावली कितनी प्राचीन है या उसका ऐतिहासिक महत्व कितना बड़ा है, बल्कि असली चिंता यह है कि क्या हम अपनी नीतियों, योजनाओं और लालच के बीच इसे जीवित रहने का अवसर दे पाएंगे। यह भी तय करना होगा कि जिस विकास की कीमत अरावली चुका रही है, वह कीमत आखिर किसके हिस्से में जा रही है और क्या आने वाली पीढ़ियां इसके लिए हमें माफ कर पाएंगी।

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