काशीपुर। सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक चैती मेले की चकाचौंध के बीच इस बार एक ऐसी खामोश सिसकी सुनाई दे रही है, जिसने उत्सव के उल्लास को फीका कर दिया है। माता बाल सुंदरी के पावन आंगन में सजने वाले इस मेले में जहाँ एक ओर आस्था का सैलाब उमड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक गलियारों में पसरी मायूसी प्रशासन और बदलती अर्थव्यवस्था की कड़वी हकीकत बयां कर रही है। इस वर्ष मेले की रौनक तो सतही तौर पर दिखाई दे रही है, लेकिन दुकानदारों के चेहरों पर अंकित चिंता की लकीरें यह बताने के लिए काफी हैं कि बढ़ती महंगाई और घटती क्रय शक्ति ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। मेले के मैदान में सजी रंग-बिरंगी दुकानों के पीछे छिपी यह आर्थिक त्रासदी इस बात का गवाह है कि पारंपरिक मेलों का स्वरूप अब केवल मनोरंजन तक सीमित रह गया है, जबकि व्यापारिक दृष्टिकोण से यह दम तोड़ रहा है। दुकानदारों का स्पष्ट मत है कि इस बार की स्थिति उनकी कल्पनाओं के बिल्कुल विपरीत है, जहाँ भारी निवेश के बावजूद ग्राहकों की बेरुखी ने उनके जीवन की जमा-पूंजी को दांव पर लगा दिया है।
मुरादाबाद की पीतल नगरी से अपनी आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने संजोकर काशीपुर पहुँचे अनुभवी व्यापारी जितेंद्र कुमार की आपबीती इस मेले के वर्तमान हालातों का सबसे जीवंत और मार्मिक दस्तावेज पेश करती है। उन्होंने अत्यंत भारी मन से बताया कि इस साल की बिक्री का ग्राफ इतना नीचे गिर चुका है कि दिनभर की कड़ी मशक्कत के बाद मिलने वाला मुनाफा उनके दैनिक भोजन, ठहरने और माल के परिवहन खर्च को भी पूरा करने में असमर्थ साबित हो रहा है। जितेंद्र कुमार के अनुसार, बीते दशकों में मेले के शुरुआती दो-तीन दिनों के भीतर ही उनका आधा से अधिक स्टॉक हाथों-हाथ बिक जाया करता था, लेकिन इस बार उनकी दुकान पर ग्राहकों की प्रतीक्षा में केवल सन्नाटा ही पसरा रहता है। उन्होंने आधुनिकता की क्रूर मार का उल्लेख करते हुए कहा कि मिक्सी, ग्राइंडर और फूड प्रोसेसर जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते वर्चस्व ने सिलबट्टे जैसे पारंपरिक और स्वदेशी शिल्प उत्पादों की मांग को पूरी तरह से निगल लिया है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग हाथ से पीसे मसालों की शुद्धता और स्वाद के बजाय मशीनी पिसाई की गति को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसका सीधा और प्राणघातक प्रहार उन शिल्पकारों पर पड़ रहा है जो सदियों से इस व्यवसाय के माध्यम से अपनी आजीविका चला रहे थे।
व्यापारियों की इस दयनीय और शोचनीय स्थिति के पीछे केवल वैश्विक मंदी या बाजार की सुस्ती ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि मेला प्रशासन और बिचौलिये ठेकेदारों द्वारा वसूला जा रहा अनियंत्रित और अत्यधिक किराया भी एक कैंसर की तरह उभर कर सामने आया है। मेले के मैदान में अपनी छोटी-बड़ी बिसात सजाने वाले दुकानदारों ने कड़ा आक्रोश व्यक्त करते हुए साझा किया कि इस बार दुकानों के आवंटन की दरें किसी बड़े मॉल के शोरूम से कम नहीं हैं, जहाँ कुछ महत्वपूर्ण और प्राइम लोकेशन की दुकानों का किराया एक लाख रुपये की भारी-भरकम सीमा को भी पार कर गया है। इतने बड़े निवेश के पश्चात छोटे और मंझले व्यापारियों के लिए मुनाफा कमाना तो दूर की बात है, अपनी मूल लागत को सुरक्षित वापस ले जाना भी एक असंभव चुनौती जैसा प्रतीत हो रहा है। व्यापारियों का तर्क है कि वे मेले में बिकने वाली प्रत्येक वस्तु पर मात्र 10 से 20 रुपये की बहुत ही मामूली बचत कर पाते हैं, जबकि ग्राहक महंगाई के इस दौर में हर छोटी चीज पर भी इतना अधिक मोलभाव कर रहे हैं कि सौदा घाटे का सौदा साबित हो रहा है। लागत, भारी किराया और नगण्य कमाई के बीच का यह असंतुलन व्यापारियों को भारी कर्ज के दलदल में धकेल रहा है।
अमरोहा के विश्वविख्यात ढोलक उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाले और पीढ़ियों से इस वाद्ययंत्र की थाप पर दुनिया को नचाने वाले भूरे खान ने कच्चे माल की आसमान छूती कीमतों और बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने तकनीकी बारीकियों के साथ समझाया कि जिस ढोलक को वे पहले मात्र 200 से 300 रुपये की किफ़ायती और सुलभ दर पर बेच लिया करते थे, आज उसकी निर्माण प्रक्रिया में प्रयुक्त होने वाली लकड़ी, अच्छी गुणवत्ता वाला चमड़ा और फिटिंग सामग्री की महंगाई के कारण उसकी न्यूनतम कीमत ही 2500 से 3000 रुपये तक पहुँच चुकी है। भूरे खान के मुताबिक, इन सामग्रियों के दाम पिछले कुछ वर्षों में चार गुना से अधिक बढ़ गए हैं, लेकिन मेले में आने वाला सामान्य ग्राहक आज भी उन पुराने दशकों वाले दामों की उम्मीद लगाए रहता है, जिससे व्यापारिक बातचीत अक्सर विफल हो जाती है। उन्होंने बड़े ही भावुक अंदाज में कहा कि एक दौर वह था जब ढोलक हर भारतीय परिवार की सांस्कृतिक पहचान और मांगलिक उत्सवों की रूह हुआ करती थी, लेकिन अब डीजे, ब्लूटूथ स्पीकर और डिजिटल संगीत के शोर ने इन पारंपरिक ध्वनियों को हाशिए पर धकेल दिया है, जिससे ढोलक बनाने वाले हजारों फनकारों के चूल्हे ठंडे पड़ने की नौबत आ गई है।
मेले के प्रबंधन और संचालन की बदलती व्यवस्थाओं को लेकर भी व्यापारियों के भीतर भारी असंतोष और विरोध की लहर देखने को मिल रही है, जहाँ उन्होंने सीधे तौर पर सरकारी हस्तक्षेप और निजी ठेकेदारी प्रथा को अपनी आर्थिक बर्बादी का मुख्य सूत्रधार बताया है। व्यापारियों का गंभीर और संगीन आरोप है कि जब से मेले का नियंत्रण पूर्ण रूप से स्थानीय प्रशासन और फिर आगे निजी ठेकेदारों के हाथों में हस्तांतरित हुआ है, तब से सुविधाओं के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है, जबकि करों और शुल्कों में बेतहाशा वृद्धि कर दी गई है। उनका दावा है कि ठेकेदारों द्वारा वसूला जा रहा अनियंत्रित प्रवेश शुल्क, सफाई शुल्क और अन्य गुप्त खर्चे छोटे व्यापारियों के शोषण का एक सुनियोजित जरिया बन गए हैं। बुनियादी सुविधाओं जैसे पेयजल, सुरक्षा और रोशनी के अभाव के बावजूद अत्यधिक करों की वसूली ने व्यापारियों की कमर तोड़ दी है और इसका सीधा प्रभाव ग्राहकों पर पड़ रहा है, क्योंकि दुकानदार अपनी लागत निकालने के लिए मजबूरन कीमतें बढ़ा देते हैं, जिससे आम ग्राहक खरीदारी से हाथ पीछे खींच लेता है। दुकानदारों का यह कड़ा रुख प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि यदि इन बिचौलियों की मनमानी पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो चैती मेले का ऐतिहासिक गौरव धूल में मिल जाएगा।
बदलती जीवनशैली और पश्चिमीकरण के बढ़ते प्रभाव ने न केवल स्थानीय कारोबार के स्वरूप को बदला है, बल्कि उन सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक ताने-बाने को भी गहरी चोट पहुँचाई है जो इन पारंपरिक मेलों की असली आत्मा हुआ करते थे। दुकानदारों का कहना है कि साल-दर-साल उनके व्यापारिक लेन-देन का ग्राफ जिस तेजी से नीचे गिर रहा है, वह समाज की बदलती प्राथमिकताओं और स्वदेशी के प्रति उदासीनता का एक अलार्म है। पारंपरिक हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन और घरेलू उपयोग की पारंपरिक कलाकृतियों के प्रति युवा पीढ़ी की घटती रुचि और ऑनलाइन शॉपिंग के प्रति बढ़ते आकर्षण ने इन मेलों को मात्र चाट-पकौड़ी और बड़े झूलों के मनोरंजन केंद्रों तक सीमित कर दिया है। व्यापारियों के अनुसार, महंगाई की दोहरी मार ने मध्यमवर्गीय जनता की बचत को सोख लिया है, जिसके परिणामस्वरूप लोग मेले में घूमने और सेल्फी लेने तो भारी संख्या में आ रहे हैं, लेकिन वास्तविक खरीदारी की प्रवृत्ति में भारी गिरावट आई है। यह संकट न केवल वर्तमान पीढ़ी के व्यापारियों के लिए जानलेवा है, बल्कि उन भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी एक बंद दरवाजा है जो अपनी पैतृक विरासत और कला को व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहती थीं।
वर्तमान के इस निराशाजनक परिदृश्य को देखते हुए मेले के समस्त व्यापारियों ने प्रदेश सरकार और स्थानीय जिला प्रशासन से एक स्वर में अत्यंत मार्मिक गुहार लगाई है कि चैती मेले के अस्तित्व और इसकी ऐतिहासिकता को बचाने के लिए अब कठोर और सुधारात्मक कदम उठाना अनिवार्य हो गया है। उनकी प्रमुख मांग है कि मेले के दुकानों के किराए का एक न्यायसंगत निर्धारण किया जाए और ठेकेदारों की खुली लूट पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए ताकि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े छोटे व्यापारियों को कुछ राहत की सांस मिल सके। व्यापारियों का यह स्पष्ट और दृढ़ मानना है कि यदि प्रशासन ने अपनी नीतियों में लचीलापन नहीं दिखाया और केवल राजस्व बढ़ाने के लक्ष्य पर केंद्रित रहा, तो आने वाले समय में यहाँ की महान परंपराएं और उनसे जुड़े हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का दीपक हमेशा के लिए बुझ जाएगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि सरकार को पारंपरिक हस्तशिल्प और संगीत वाद्ययंत्रों के संरक्षण के लिए मेलों में विशेष सब्सिडी या कर-मुक्त स्थान उपलब्ध कराने चाहिए, ताकि लुप्त होती इन कलाओं को पुनर्जीवन मिल सके और मेले की वह पुरानी जीवंत रौनक फिर से गलियों में लौट सके।
निष्कर्ष के तौर पर, इस वर्ष के चैती मेले से प्राप्त यह कड़वा अनुभव शासन-प्रशासन के लिए एक बड़ा सबक है कि बिना सरकारी संरक्षण, व्यापारिक अनुकूलता और मानवीय संवेदना के किसी भी पारंपरिक आयोजन को लंबे समय तक जीवित नहीं रखा जा सकता। व्यापारियों की यह सामूहिक सिसकी केवल उनके निजी मुनाफे के कम होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस गौरवशाली लोक संस्कृति का अंतिम रुदन है जो सदियों से हमारे समाज की पहचान रही है। प्रशासन को अब केवल राजस्व संग्रहण के यंत्र के रूप में कार्य न करके, व्यापारियों की इन बुनियादी और वाजिब समस्याओं का सहानुभूतिपूर्वक समाधान तलाशना होगा। यदि समय रहते अनियंत्रित किराए, बिचौलियों के हस्तक्षेप और गिरती सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया, तो काशीपुर का यह ऐतिहासिक चैती मेला भविष्य के पन्नों में केवल एक रस्म अदायगी बनकर रह जाएगा। आज समय की मांग है कि हम अपने स्थानीय व्यापारियों, दस्तकारों और फनकारों का सम्मान करें और उन्हें एक ऐसा सुरक्षित और लाभकारी मंच प्रदान करें जहाँ वे अपनी कला का प्रदर्शन कर सकें और हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकें, वरना महंगाई का यह दानव हमारी परंपराओं को पूरी तरह निगल जाएगा।





