- राजेंद्र शर्मा बोले पुलिस के जुल्म और जेल की दीवारें भी न झुका सकीं हिम्मत
- मेयर दीपक बाली बोले संघर्ष सड़कों से अब विकास की दिशा में आगे बढ़ा
- दीपक बाली ने युवाओं को प्रेरित किया कहा संघर्ष रुकेगा तो विकास ठहर जाएगा
- रजत जयंती समारोह में याद आया उत्तराखंड आंदोलन का वो जज्बा जो आज भी जिंदा है
- राज्य आंदोलन के नायकों ने कहा शहादतों से बना उत्तराखंड अब बदलाव की राह पर
काशीपुर। उत्तराखंड राज्य की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में ऊधम सिंह नगर जिले में आज पूरे उत्साह और सांस्कृतिक रंगों के बीच रजत जयंती मनाई गई। जिले भर में आयोजित कार्यक्रमों में लोगों ने राज्य के गौरवशाली इतिहास और आंदोलनकारियों के बलिदान को याद किया। विकास खंड सभागार में आयोजित मुख्य समारोह में मां बाल सुंदरी देवी मंदिर परिसर के पास सुबह से ही भीड़ जुटने लगी थी। सभागार बच्चों के स्वागत गीतों, पारंपरिक झोड़ा-छपेली की धुनों और उत्तराखंडी संस्कृति के रंगों से सराबोर हो गया। कार्यक्रम की शुरुआत बच्चों द्वारा राज्य निर्माण के गीत “उत्तराखंड देवभूमि, वीरों की कर्मभूमि” से हुई, जिसने पूरे माहौल को भावनात्मक बना दिया। समारोह में मेयर दीपक बाली, सीओ दीपक सिंह, एसडीएम अभय प्रताप सिंह, तहसीलदार पंकज चंदोला सहित कई प्रशासनिक अधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि मौजूद रहे।
इस अवसर पर राज्य आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ आंदोलनकारियों को सम्मानित किया गया। मंच पर जब नरपत सिंह राजपूत, राजेंद्र शर्मा, संजय आर्य, शोभित शर्मा, भारत भूषण, शगुन बत्रा और संजय शर्मा जैसे नाम पुकारे गए, तो सभागार तालियों से गूंज उठा। समारोह में राजेंद्र शर्मा ने उस दौर की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि 1994 का वह दौर उनके जीवन का सबसे कठिन लेकिन सबसे गर्वित अध्याय था। उन्होंने कहा कि “जब हमें और हमारे साथियों नरपत सिंह राजपूत, जयंत वशिष्ठ और दिवंगत आशुतोष तिवारी को पता चला कि पुलिस रात में गिरफ्तारी करने आएगी, तब भी हमने अनशन स्थल नहीं छोड़ा।”

उन्होंने बताया कि रात के करीब दो बजे पुलिस ने नगर पालिका गेट को दोनों ओर से घेर लिया और उन्हें गिरफ्तार कर भगतपुर थाने ले जाया गया। वहाँ से उन्हें सीधे फतेहगढ़ जेल भेज दिया गया, जहाँ उन्हें कीड़ों भरी कोठरियों में बंद किया गया। “मुलायम सिंह यादव की सरकार के इशारे पर हुआ यह उत्पीड़न शायद आज की पीढ़ी कल्पना भी नहीं कर सकती। लेकिन हमने हार नहीं मानी, और उसी हिम्मत का नतीजा है आज का उत्तराखंड।” उन्होंने कहा कि राज्य निर्माण के जो सपने उस आंदोलन ने देखे थे-जनहित, पारदर्शिता, भ्रष्टाचार मुक्त शासन-वो आज भी अधूरे हैं।
कार्यक्रम में उपस्थित आंदोलनकारी नरपत सिंह राजपूत ने अपने जोशपूर्ण वक्तव्य से माहौल को भावनाओं से भर दिया। उन्होंने कहा कि “उत्तराखंड राज्य का आंदोलन कोई साधारण संघर्ष नहीं था, यह आत्मसम्मान की पुकार थी, यह उत्तराखंड की आत्मा की आवाज़ थी।” उन्होंने बताया कि 1994 में जिस तरह की बर्बरता आंदोलनकारियों पर की गई, वह इतिहास के किसी भी कालखंड में नहीं देखी गई। “मुलायम सिंह यादव की सरकार ने जिस निर्दयता से आंदोलन को कुचलने की कोशिश की, उसने अंग्रेजी शासन की क्रूरता को भी पीछे छोड़ दिया।” उन्होंने मुस्कराते हुए याद किया कि उस समय दीपक बाली बेहद युवा थे और जोश से लबरेज। “उनकी उर्जा और जिद्द ने आंदोलन को दिशा दी। ऐसे ही जुझारू युवाओं के कारण आंदोलन ने संगठित स्वरूप लिया और विजय पाई।” नरपत सिंह ने कहा कि “आज जब हम राज्य स्थापना की 25वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो यह सिर्फ एक उत्सव नहीं बल्कि उन शहीदों की तपस्या का प्रतिफल है जिन्होंने सब कुछ कुर्बान कर दिया।”
उन्होंने 1994 के दमन की भयावहता को याद करते हुए कहा कि पुलिस ने रातों-रात छात्रों को घरों से खींचकर ले जाया। “कई लड़के सिर्फ बनियान में सो रहे थे, पुलिस ने दरवाज़े तोड़े और उन्हें घसीट लिया। उन्हें कपड़े तक नहीं पहनने दिए गए। यह सब सरकार के आदेश पर हुआ। लेकिन हमारे हौसले को कोई झुका नहीं सका।” उन्होंने कहा कि वह दौर इतना कठोर था कि हर आंदोलनकारी को या तो जेल मिली या लाठीचार्ज। “हमारे पास खाने को नहीं था, पर हिम्मत और उम्मीद कभी खत्म नहीं हुई।”
राजपूत ने मुज़फ्फरनगर कांड और खटीमा गोलीकांड का ज़िक्र करते हुए कहा कि ये हादसे केवल घटनाएँ नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा पर दर्ज ज़ख्म हैं। उन्होंने कहा, “अगर हम उन शहीदों को नमन नहीं करते, तो यह उत्सव अधूरा रह जाएगा। उन्हीं के बलिदान की नींव पर यह राज्य खड़ा है।” उन्होंने बताया कि “गढ़वाल में आंदोलन के दौरान कार्यकर्ताओं को इतना अभाव झेलना पड़ा कि लोग नदी के पत्थरों पर नमक डालकर भूख मिटाते थे। यह कोई दो दिन की लड़ाई नहीं, बल्कि महीनों की तपस्या थी।”
राजपूत ने कहा कि “आज की पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि यह राज्य किसी दान से नहीं, बल्कि हजारों युवाओं के लहू और माताओं के आंसुओं से बना है।” उन्होंने कहा कि जब तक हम उस संघर्ष की सच्ची कहानियों को जिंदा नहीं रखेंगे, तब तक उत्तराखंड की आत्मा अधूरी रहेगी। “मौका मिला तो मैं उस पूरे आंदोलन की कहानी लोगों तक पहुँचाऊंगा ताकि नई पीढ़ी समझ सके कि त्याग और बलिदान से गढ़ा यह राज्य हमारी जिम्मेदारी भी है।”

इस अवसर पर दीपक बाली, जो स्वयं एक राज्य आंदोलनकारी रहे हैं और वर्तमान में काशीपुर के मेयर हैं, ने अपने संबोधन में कहा कि यह दिन केवल जश्न का नहीं बल्कि उन वीरों की याद का है जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगाकर उत्तराखंड को जन्म दिया। उन्होंने कहा कि “आज जब हम उत्तराखंड के 25 वर्ष पूरे कर रहे हैं, तो सबसे पहले उन शहीदों को नमन करना होगा, जिनकी कुर्बानियों ने हमें पहचान दी।” उन्होंने कहा कि “काशीपुर की इस भूमि ने हमेशा संघर्ष को जन्म दिया है। यहाँ के लोगों ने आंदोलन के कठिन दिनों में न नींद देखी, न भय। बस एक ही सपना था-उत्तराखंड बनेगा। ठंडी रातों और लाठीचार्ज के बीच भी हौसला नहीं टूटा।” उन्होंने कहा कि “आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि वह जज्बा आज भी ज़िंदा है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब संघर्ष राज्य के लिए था, अब संघर्ष विकास के लिए है।”



