काशीपुर। क्षेत्र में एक बार फिर से धान प्रजाति पीआरआई 126 को लेकर किसानों और मिल संचालकों के बीच टकराव की स्थिति बन गई। गुरूवार को जब मंडी परिसर में इस किस्म के धान की खरीद नहीं हुई तो आक्रोशित किसान भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले मंडी समिति पहुंचे और जमकर विरोध-प्रदर्शन किया। नाराज किसानों ने मंडी गेट पर ताला जड़ते हुए प्रशासन और मिल मालिकों के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। किसानों की मांग थी कि उनकी मेहनत से तैयार की गई पीआरआई 126 किस्म की फसल को हर हाल में सरकारी कांटों पर खरीदा जाए। इस पर मंडी अधिकारियों ने उच्च स्तर पर बातचीत करने का आश्वासन तो दिया, लेकिन जब तक स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया तब तक किसानों का गुस्सा शांत नहीं हुआ। अगले दिन भी दर्जनों किसान मंडी गेस्ट हाउस के बाहर एकत्रित हुए और सरकार तथा मिल संचालकों के खिलाफ जमकर आवाज बुलंद की।
इस पूरे घटनाक्रम में जब मामला गंभीर होता दिखा तो एसडीएम काशीपुर अभय प्रताप सिंह स्वयं मंडी पहुंचे और किसानों व राइस मिल संचालकों के बीच मध्यस्थता कराई। लंबी बातचीत के बाद एक अस्थायी समाधान निकला, जिसमें किसानों और राइस मिल संचालकों दोनों की सहमति बनी। मिल मालिकों ने साफ किया कि पीआरआई 126 की रिकवरी मात्र 62 प्रतिशत आती है जबकि सरकार उनसे 67 प्रतिशत रिकवरी की अपेक्षा करती है, ऐसे में उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ता है। इसी वजह से वे इस धान को खरीदने से बचते हैं। एसडीएम की मौजूदगी में तय हुआ कि नमी की कटौती के अलावा किसानों को अतिरिक्त 3 प्रतिशत की कटौती और सहनी होगी तभी इस किस्म के धान की तुलाई संभव होगी। किसानों ने मजबूरी में इसे स्वीकार किया। साथ ही मिल संचालकों ने स्पष्ट कहा कि यदि किसान अगली बार यह प्रजाति बोते हैं तो इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह किसान की होगी क्योंकि भविष्य में वे इसे कतई नहीं खरीदेंगे।
राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सचिन गोयल ने बैठक में कहा कि इस किस्म की सबसे बड़ी कमी कम रिकवरी के साथ-साथ डैमेज दाने की अधिकता है। जब चावल की गुणवत्ता घटती है तो उसे सरकार तक पहुंचाना संभव नहीं रह जाता। गोयल ने दोहराया कि पूर्व में हुए समझौते भी इन्हीं कारणों पर आधारित रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि धान की क्वालिटी और रिकवरी संतोषजनक होगी तभी उसका चावल सरकार तक पहुंच सकता है, वरना उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ता है। किसानों को भरोसा दिलाया गया कि यदि समस्या आती है तो मंडी कार्यालय में अधिकारियों से संपर्क कर समाधान कराया जाएगा। इसके साथ ही साफ कहा गया कि यदि डैमेज ज्यादा पाया गया तो वे इस फसल को स्वीकार नहीं कर पाएंगे।
दूसरी ओर भारतीय किसान यूनियन (युवा) उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र सिंह जीतू ने इसे किसानों की बड़ी जीत और संघर्ष का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि पीआरआई 126 बोने वाले किसानों की चिंता दूर करने के लिए प्रशासन की मौजूदगी में समझौता कराया गया। जीतू ने कहा कि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई यह किस्म कम दिनों में तैयार होती है और इसमें पानी की भी अपेक्षाकृत कम आवश्यकता होती है, इसलिए पंजाब और हरियाणा सरकार इसे बढ़ावा दे रही हैं। उनका कहना था कि उत्तराखंड सरकार को भी इस दिशा में हस्तक्षेप करना चाहिए और रिकवरी के मानकों में संशोधन करना चाहिए क्योंकि चावल की रिकवरी किसानों के हाथ में नहीं होती। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से अपील की कि इस किस्म को बंद करने के बजाय बढ़ावा दिया जाए और किसानों पर अतिरिक्त कटौती का बोझ न डाला जाए।
किसानों का दर्द यह भी रहा कि सरकार और मिल मालिक तब विरोध करते हैं जब उनकी फसल पूरी तरह पककर मंडी पहुंच जाती है। यदि समय रहते चेताया जाता तो वे अन्य विकल्प चुन सकते थे। कई किसानों ने आरोप लगाया कि जब वे मंडी पहुंचते हैं तो उन्हें प्राथमिकता नहीं दी जाती और उनसे भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है। लेकिन इस बार किसानों ने सख्ती से आवाज उठाई, जिस पर एसडीएम ने निर्देश दिए कि अब किसान की फसल सबसे पहले खरीदी जाएगी। साथ ही मंडी अधिकारियों और तहसील प्रशासन के नंबर सार्वजनिक किए जाएंगे ताकि यदि किसी किसान को परेशानी हो तो तुरंत शिकायत दर्ज की जा सके।
एसडीएम अभय प्रताप सिंह ने कहा कि किसानों और मिल संचालकों के बीच हुए इस समझौते से तत्काल समस्या का समाधान हो गया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भविष्य में किसी भी किसान को उपेक्षित नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए अलग से टीम बनाई जाएगी, जो मंडी परिसर में समस्याओं का निस्तारण करेगी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पीआरआई 126 की खरीद स्थायी समाधान नहीं है क्योंकि इसकी गुणवत्ता और रिकवरी लगातार विवाद का कारण बनी हुई है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे भविष्य में प्रजाति चयन करते समय पूरी जानकारी के आधार पर निर्णय लें।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर सरकार, किसानों और मिल संचालकों के बीच संतुलन साधने की चुनौती को सामने ला दिया है। किसान अपनी मेहनत से तैयार की गई फसल को किसी भी कीमत पर बेचना चाहते हैं, जबकि मिल मालिक नुकसान से बचना चाहते हैं। ऐसे में प्रशासन की भूमिका और भी अहम हो जाती है। किसानों ने जहां मजबूरी में समझौता स्वीकार किया, वहीं सरकार से उम्मीद जताई कि वह आगे बढ़कर रिकवरी के मानक पर पुनर्विचार करेगी। किसान मानते हैं कि यह किस्म खेती के लिए लाभकारी है और इसे बंद करना न तो किसानों के हित में है और न ही प्रदेश की कृषि व्यवस्था के लिए।



