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जीएसटी कटौती में आईटीसी की रोक से उपभोक्ताओं पर बढ़ेगा दबाव और राहत बनेगी बोझ

विशेषज्ञों का मानना है कि जीएसटी की दरें घटने के बावजूद आईटीसी न मिलने से उद्योग जगत की लागत बढ़ेगी और उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत नहीं मिल पाएगी

नई दिल्ली। जीएसटी काउंसिल की अहम बैठक ने देश की आर्थिक दिशा पर नई बहस छेड़ दी है। काउंसिल ने लंबे समय से चली आ रही चार स्लैब की व्यवस्था को खत्म कर अब दो दरों की प्रणाली लागू कर दी है, जिसमें 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत दरों को बरकरार रखते हुए 12 और 28 प्रतिशत स्लैब को हटा दिया गया है। सरकार का मानना है कि यह कदम आम उपभोक्ताओं को राहत देने वाला साबित होगा, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह दिखने में भले ही उपभोक्ता हितैषी लगे, वास्तविकता में कई क्षेत्रों में इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) की अनुपलब्धता व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है, जिसका सीधा असर अंततः जनता की जेब पर पड़ेगा। दरअसल, आईटीसी को जीएसटी व्यवस्था का मूल आधार माना गया था, क्योंकि यही प्रावधान सुनिश्चित करता है कि किसी उत्पाद या सेवा पर एक से अधिक बार कर न लगे और अंतिम मूल्य पर दोहरी मार से उपभोक्ता को बचाया जा सके।

व्यवसाय जगत के लिए आईटीसी का महत्व केवल कागजी नहीं बल्कि व्यावहारिक भी है। जब कोई कंपनी कच्चे माल पर जीएसटी चुकाती है, तो वह उस राशि को अपनी बिक्री पर वसूले गए कर में समायोजित कर लेती है, जिससे उसे बार-बार कर चुकाने की मजबूरी से छुटकारा मिलता है। यही वजह है कि कीमतें स्थिर रहती हैं और उपभोक्ता पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यापारी एक हजार रुपये का माल खरीदता है और उस पर 180 रुपये जीएसटी देता है, फिर तैयार माल को 2500 रुपये में बेचकर ग्राहक से 450 रुपये जीएसटी वसूलता है, तो आईटीसी के बिना उसे पूरा 450 रुपये सरकार को जमा करना होगा। लेकिन आईटीसी की उपलब्धता में 180 रुपये का समायोजन कर केवल 270 रुपये ही सरकार को जाएगा। इस प्रकार की व्यवस्था न केवल निष्पक्ष कराधान सुनिश्चित करती है, बल्कि समानांतर रूप से अवैध लेन-देन को भी हतोत्साहित करती है, क्योंकि कंपनियां जीएसटी अनुपालन वाले आपूर्तिकर्ताओं से ही सामान खरीदना पसंद करती हैं।

काउंसिल के नए निर्णय के बाद भी कई स्थितियों में आईटीसी जारी रहेगा। 22 सितंबर 2025 से पहले किए गए लेन-देन पर भले ही पुरानी दरें लागू रही हों, फिर भी कंपनियां उनका समायोजन वर्तमान देयताओं से कर सकती हैं। फार्मा और लेदर जैसे क्षेत्रों में जॉब वर्क सेवाओं पर 5 प्रतिशत की रियायती दर रखी गई है और स्पष्ट किया गया है कि आईटीसी वहां उपलब्ध रहेगा। इसके अलावा उल्टे शुल्क संरचना की स्थिति में, यानी जब इनपुट पर ज्यादा कर लगे और आउटपुट पर कम, तो आईटीसी का रिफंड भी जारी रहेगा, कुछ सीमित वस्तुओं को छोड़कर। इस प्रकार, कई व्यापारिक वर्ग अब भी इस लाभ का इस्तेमाल करने की स्थिति में हैं।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू चिंताजनक है। जिन वस्तुओं और सेवाओं को छूट श्रेणी में डाल दिया गया है, उन पर अब आईटीसी का लाभ नहीं मिलेगा। जैसे अल्ट्रा हाई टेम्परेचर (यूएचटी) दूध, पैकेज्ड इंडियन ब्रेड और कुछ स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों पर अब कोई इनपुट क्रेडिट उपलब्ध नहीं है। इसी तरह यात्री परिवहन क्षेत्र में भी नया नियम लागू होगा। इकोनॉमी क्लास हवाई यात्रा, रेल और बस टिकटों पर 5 प्रतिशत जीएसटी लगेगा, लेकिन आईटीसी का लाभ नहीं मिलेगा। हां, अगर एयरलाइंस 18 प्रतिशत दर चुनें तो आईटीसी मिलेगा। गुड्स ट्रांसपोर्ट एजेंसियों के लिए भी यही स्थिति है, जहां 5 प्रतिशत दर पर आईटीसी नहीं मिलेगा, लेकिन 18 प्रतिशत दर चुनने पर क्रेडिट मिल सकता है। बीमा क्षेत्र को तो सीधी छूट दी गई है, जहां दर 18 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दी गई है, लेकिन इनपुट क्रेडिट पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। इस पर दिनीश जोत्वानी, को-मैनेजिंग पार्टनर, जोतवानी एसोसिएट्स का कहना है कि बिना आईटीसी उपलब्ध कराए बीमा कंपनियों पर परिचालन लागत का बोझ बढ़ेगा, और यदि इसका बोझ ग्राहकों पर डाला गया तो उपभोक्ताओं को लाभ नहीं बल्कि नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सरकार और नियामकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बीमा कंपनियां वास्तविक लागत बचत को पारदर्शी तरीके से ग्राहकों तक पहुंचाएं, वरना यह राहत केवल दिखावे तक ही सीमित रह जाएगी।

अन्य उपभोक्ता केंद्रित सेवाओं पर भी कर दरों में कटौती के साथ आईटीसी पर रोक लगा दी गई है। ब्यूटी और वेलनेस सेक्टर जैसे सैलून, जिम और स्पा अब 5 प्रतिशत दर पर आएंगे, लेकिन इनपुट क्रेडिट नहीं मिलेगा। होटल में 7500 रुपये प्रतिरात्रि से कम किराए वाले कमरों पर भी यही प्रावधान लागू किया गया है। मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट को 5 प्रतिशत दर में रखा गया है, जहां आईटीसी सीमित मिलेगा, लेकिन अगर एयर ट्रांसपोर्ट इसमें शामिल हो तो दर 18 प्रतिशत होगी और पूरा क्रेडिट मिलेगा। इस पर सोनम चांदवानी, मैनेजिंग पार्टनर, केएस लीगल एंड एसोसिएट्स का कहना है कि यह व्यवस्था दिखने में उपभोक्ता हित में लगती है, लेकिन जीएसटी की मूल अवधारणा को तोड़ती है। उनके अनुसार, जब कंपनियां अपने इनपुट खर्च को समायोजित नहीं कर पाएंगी, तो उनकी वास्तविक कर देनदारी बढ़ जाएगी और इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर बढ़ी हुई कीमतों या सेवाओं की गुणवत्ता में कमी के रूप में सामने आएगा। उन्होंने इसे एक तरह का छिपा हुआ मुद्रास्फीति दबाव बताया, जो जीएसटी की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

स्पष्ट है कि जीएसटी दरों में इस नए बदलाव ने कर प्रणाली को सरल बनाने की दिशा में कदम जरूर बढ़ाया है, लेकिन आईटीसी पर लगाई गई पाबंदियों ने कई क्षेत्रों में असमंजस और संशय की स्थिति पैदा कर दी है। व्यापारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में उपभोक्ताओं को राहत देना चाहती है, तो उसे आईटीसी की श्रृंखला को टूटने से बचाना होगा, क्योंकि यही प्रावधान ‘वन नेशन, वन टैक्स’ की मूल भावना को मजबूत बनाता है। अन्यथा यह बदलाव केवल कागज पर राहत साबित होगा, जबकि जमीन पर उपभोक्ता और उद्योग दोनों को अतिरिक्त बोझ झेलना पड़ेगा।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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