काशीपुर। रोडवेज बस अड्डा इन दिनों अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाता हुआ नजर आता है। कभी कुमाऊं क्षेत्र का सबसे बड़ा डिपो कहलाने वाला यह बस अड्डा आज जर्जर हालत में तब्दील हो चुका है। बारिश में खुले मैदान में हर तरफ पानी भरा हुआ होता है, छत से टपकती बूंदें पैसेंजर्स की परेशानी बढ़ा देती हैं और लंबे समय से बंद पड़ी कैंटीन लोगों के लिए असुविधा का कारण बनी हुई है। यात्रियों को सबसे ज्यादा दिक्कत तब होती है जब उन्हें यह तक पता नहीं चल पाता कि कौन सी बस कहां से मिलेगी। भीड़भाड़ के बीच लोगों को नगर में इधर-उधर भटकना पड़ता है और इस पूरे परिदृश्य में किसी जिम्मेदार की आंखें बंद दिखाई देती हैं। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि कभी गौरव का प्रतीक रहा यह अड्डा अब काशीपुर और कुमाऊं वासियों के लिए शर्म का कारण बन गया है।
इतिहास पर नजर डालें तो यह वही बस अड्डा है जिसका उदघाटन वर्ष 1982 में भारत के तत्कालीन उद्योग मंत्री पंडित नारायण दत्त तिवारी ने किया था। उस समय उनके साथ काशीपुर के तत्कालीन विधायक श्री सत्येंद्र चंद्र गुड़िया और परिवहन मंत्री वीर बहादुर सिंह भी मौजूद थे। उस दौर में इस रोडवेज को एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना गया था और पूरे कुमाऊं क्षेत्र के लिए इसे परिवहन का धड़कता हुआ केंद्र कहा जाता था। यात्रियों की सुविधा, वाहनों की संख्या और व्यवस्थाओं की मजबूती ने इसे पहचान दिलाई थी। लेकिन आज की स्थिति बिल्कुल उलट है। जिसकी शुरुआत कभी सुनहरे सपनों और मजबूत व्यवस्थाओं के साथ हुई थी, वही अड्डा अब उपेक्षा और लापरवाही का प्रतीक बन गया है।

कभी जिस रोडवेज बस अड्डे पर हजारों यात्री रोजाना विश्वास के साथ आया-जाया करते थे, वहीं आज लोग परेशानियों के कारण यहां कदम रखने से भी कतराने लगे हैं। भीगते हुए प्लेटफार्म, गंदगी से सना परिसर और अनिश्चित बस संचालन ने यात्रियों के धैर्य को तोड़ दिया है। कैंटीन के ताले लंबे समय से जमे हुए हैं, जिससे यात्रियों को खाने-पीने के लिए बाहर भटकना पड़ता है। छत से लगातार रिसता पानी हर बरसात में हॉल को तालाब जैसा बना देता है। वहीं कोई व्यवस्था न होने के कारण पैसेंजर यह तक नहीं जान पाते कि उनकी मंजिल तक पहुंचाने वाली बस किस कोने में खड़ी है। यह अफरातफरी और लापरवाही न केवल आम जनता की मुश्किलें बढ़ा रही है बल्कि पूरे काशीपुर की छवि को भी धूमिल कर रही है।
लोगों का कहना है कि यह अड्डा अब अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। यात्रियों की लगातार घटती संख्या और निजी परिवहन के बढ़ते विकल्पों ने यहां की बदहाली को और ज्यादा उजागर कर दिया है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस दुर्दशा के बावजूद किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या विभाग ने अब तक सुधार की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए। यह वही अड्डा है जिसे कभी कुमाऊं का गौरव कहा जाता था और जिस पर यहां के लोग नाज करते थे, लेकिन अब यह अपनी दुर्गति के कारण चर्चा में रहता है। पैसेंजर मजबूरी में यहां आते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर उम्मीद के बजाय बेबसी झलकती है।

काशीपुर का रोडवेज बस अड्डा महज परिवहन की सुविधा नहीं था, बल्कि यह शहर की पहचान और विकास की गवाही भी देता था। यहां से चलने वाली बसें न केवल कुमाऊं बल्कि तराई और अन्य हिस्सों को भी जोड़ती थीं। व्यापार, शिक्षा और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हजारों लोग इस डिपो पर निर्भर थे। लेकिन वर्षों से अनदेखी और रखरखाव के अभाव ने इस जगह को खंडहर बना दिया है। अगर जल्द ही सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो यह गौरवमयी धरोहर इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी। जनता आज सवाल पूछ रही है कि आखिर वह अड्डा, जिसे पंडित नारायण दत्त तिवारी जैसे नेता ने उद्घाटित किया और सत्येंद्र चंद्र गुड़िया व वीर बहादुर सिंह जैसे दिग्गजों ने अपनी मौजूदगी से गौरवान्वित किया, उसकी यह हालत क्यों होने दी गई।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस बस अड्डे को पुनर्जीवित करने के लिए ईमानदार प्रयास किए जाएं। यात्रियों की असुविधाओं को दूर करने के लिए आधुनिक तकनीक और व्यवस्थित प्रबंधन की जरूरत है। छत की मरम्मत, जल निकासी की व्यवस्था, कैंटीन का संचालन और बसों की जानकारी देने के लिए डिजिटल डिस्प्ले जैसी बुनियादी सुविधाएं तत्काल बहाल करनी होंगी। केवल खोखले वादों से अब काम नहीं चलेगा। अगर आज भी इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में यह बस अड्डा पूरी तरह उपयोगहीन साबित होगा और लोग मजबूरी में निजी वाहनों पर निर्भर हो जाएंगे। यह समय है जब जनता अपनी आवाज बुलंद करे और जिम्मेदारों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाए। क्योंकि अगर यह अड्डा अपनी अंतिम सांसें लेता रहा, तो इसका बोझ न केवल यात्रियों पर पड़ेगा बल्कि पूरे कुमाऊं की परिवहन व्यवस्था पर गहरा असर डालेगा।



