काशीपुर। शहर गुरुवार को शिक्षा जगत की गंभीर चिंता और आक्रोश का केंद्र बना रहा जब कुंडेश्वरी रोड स्थित विद्यालय में शिक्षक पर छात्र द्वारा गोली चलाए जाने की सनसनीखेज वारदात के बाद विभिन्न शिक्षण संस्थानों ने प्रशासन से संवाद करने के लिए कदम उठाया। घटना के अगले ही दिन इलाके के एक रिसॉर्ट में तराई इंडिपेंडेंट स्कूल्स वेलफेयर सोसाइटी की पहल पर एक आपात बैठक बुलाई गई जिसमें अन्य संगठनों ने भी एकजुटता दिखाई। इस संवाद गोष्ठी के दौरान शिक्षकों और प्रबंधकों ने संयुक्त रूप से एक ज्ञापन प्रशासन को सौंपा और स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब समय आ गया है जब निजी विद्यालयों के शिक्षकों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। बैठक में उपस्थित सभी प्रतिनिधियों ने माना कि शिक्षा के मंदिर में हुई इस अप्रत्याशित हिंसा ने पूरे समाज की आत्मा को झकझोर दिया है और अब यह केवल प्रशासन नहीं बल्कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बन गई है।
गंभीर माहौल के बीच नगर निगम महापौर दीपक बाली ने अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त किया और कहा कि एक छात्र द्वारा शिक्षक पर हमला करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि समाज को केवल घटना की आलोचना करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि इसके गहरे कारणों पर विचार करना जरूरी है। उनके अनुसार सोशल मीडिया और आधुनिक तकनीक की अंधी दौड़ ने बच्चों को हिंसक प्रवृत्तियों और आपराधिक सामग्री की ओर धकेल दिया है, जिसके कारण नई पीढ़ी असामाजिक मार्ग पर भटक रही है। दीपक बाली ने जोर देकर कहा कि ऐसे समय में अभिभावकों को अपने बच्चों की संगति, गतिविधियों और रोजमर्रा के व्यवहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। साथ ही विद्यालयों को भी शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों पर अधिक फोकस करना होगा ताकि आने वाली पीढ़ी केवल पढ़ी-लिखी ही नहीं बल्कि संस्कारवान नागरिक भी बने। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चे देश का भविष्य हैं और उनमें बढ़ती आपराधिक मानसिकता से लड़ने के लिए पूरे समाज को जागरूक होकर सामूहिक प्रयास करने होंगे।
सभा में मौजूद शिक्षकों की पीड़ा उस समय और गहरी हो गई जब यह मुद्दा उठाया गया कि शांतिपूर्ण मार्च निकालने पर भी प्रशासन ने आपत्ति जताई थी। इस पर मध्यस्था करते हुँये दीपक बाली ने कहा कि शिक्षा जगत की आवाज को दबाया नहीं जा सकता और यदि शिक्षक शुक्रवार को शांतिपूर्ण मार्च निकालना चाहते हैं तो वे स्वयं और पूरा प्रशासन उनके साथ खड़ा होगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी तरह की आपत्ति का कोई औचित्य नहीं है और शिक्षकों का यह अधिकार है कि वे अपनी सुरक्षा और गरिमा के लिए आवाज उठाएं। उनका कहना था कि समाज को यह समझना होगा कि जब अध्यापक असुरक्षित महसूस करेंगे तो वे बच्चों को खुले मन से कैसे शिक्षा दे पाएंगे। यह केवल शिक्षक का नहीं बल्कि पूरे तंत्र का सवाल है जिसे नजरअंदाज करना असंभव है।
उपजिलाधिकारी अभय प्रताप सिंह ने संवाद के दौरान बताया कि इस गंभीर घटना की जानकारी प्रशासन को देर शाम मिली थी और तत्पश्चात त्वरित कदम उठाए गए। उन्होंने भी इस बात को स्वीकार किया कि बच्चों की परवरिश में अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है और यदि परिवार स्तर पर निगरानी की कमी होगी तो ऐसे नतीजे सामने आना तय है। उन्होंने शिक्षकों को भरोसा दिलाया कि प्रशासन पूरी मजबूती से उनके साथ खड़ा है और भविष्य में इस तरह की वारदात को रोकने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएंगे। अभय प्रताप सिंह ने यह भी कहा कि माता-पिता को अपने बच्चों पर सतर्क निगरानी रखनी चाहिए और उनकी संगति पर ध्यान देना ही समस्याओं का सबसे बड़ा समाधान है।
बैठक के दौरान शिक्षकों और समाजसेवियों की ओर से व्यक्त की गई चिंताओं ने वातावरण को और अधिक संवेदनशील बना दिया। सभी ने माना कि अब स्थिति केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रही बल्कि यह पूरे समाज का सवाल है। अभिभावकों और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी है कि आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित और सकारात्मक दिशा दी जाए। महापौर दीपक बाली और उपजिलाधिकारी अभय प्रताप सिंह द्वारा दिए गए भरोसे ने उपस्थित लोगों में कुछ हद तक विश्वास जगाया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि शिक्षा जगत अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होगा बल्कि ठोस और प्रभावी कार्रवाई की मांग करेगा।
इस पूरी घटना और संवाद गोष्ठी ने साफ कर दिया है कि शिक्षा के मंदिरों में बढ़ रही हिंसा केवल अध्यापकों की ही चिंता नहीं बल्कि पूरे समाज की चेतावनी है। काशीपुर से उठी यह आवाज अब बड़े स्तर पर गूंज सकती है, क्योंकि जिस तरह से शिक्षकों, प्रबंधकों और प्रशासन ने संयुक्त रूप से इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाई है, उससे स्पष्ट है कि अब बच्चों की सुरक्षा, अध्यापकों की गरिमा और विद्यालयों की मर्यादा पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। समाज, अभिभावक और प्रशासन यदि एकजुट होकर काम करें तो ही भविष्य की पीढ़ी को उस राह पर ले जाया जा सकता है, जहां शिक्षा का अर्थ केवल किताबों तक सीमित न रहकर संस्कार और सुरक्षा का प्रतीक भी बने।



