काशीपुर। समाज में बेटियों की भूमिका केवल परिवार तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि आज वे विज्ञान, शिक्षा, सेना, खेल, प्रशासन, न्याय और राजनीति सहित हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। ऐसे समय में यदि शिक्षा के साथ संस्कारों, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारियों पर पर्याप्त ध्यान न दिया जाए तो यह चिंता का विषय बन सकता है। इसी संदर्भ में काशीपुर की प्रथम महिला एवं समाजसेविका उर्वशी दत्त बाली ने हाल ही में सामने आए एक विवाद को आधार बनाते हुए समाज और विशेष रूप से अभिभावकों से गंभीर आत्ममंथन करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि किसी भी बेटी की वास्तविक सफलता केवल उसकी डिग्री, नौकरी या उपलब्धियों से नहीं मापी जा सकती, बल्कि उसके व्यवहार, मर्यादा, सामाजिक सोच और संस्कारों से उसकी वास्तविक पहचान बनती है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि माता-पिता अपनी बेटियों को केवल आधुनिक शिक्षा दिलाने तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें सही और गलत की पहचान, बड़ों का सम्मान, सामाजिक मर्यादा और जिम्मेदार नागरिक बनने की सीख भी दें। उनका मानना है कि यदि परिवार अपने बच्चों के साथ संवाद बनाए रखे और उन्हें समय दे, तो समाज में अनेक प्रकार की वैचारिक और सामाजिक विसंगतियों को रोका जा सकता है।
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति, सम्मान और संस्कारों की प्रतीक माना गया है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध की है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी शक्ति केवल उनका साहस नहीं बल्कि उनका संयम, धैर्य और मर्यादित आचरण भी रहा है। उन्होंने कहा कि कोई भी महिला अपने अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूती से खड़ी हो सकती है, अन्याय का विरोध कर सकती है और अपनी बात पूरी दृढ़ता के साथ रख सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह किसी भी व्यक्ति के लिए अपमानजनक या असंयमित भाषा का प्रयोग करे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि विचारों का विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन भाषा की मर्यादा कभी नहीं टूटनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए सार्वजनिक मंचों पर अभद्र शब्दों का प्रयोग करता है तो यह केवल व्यक्तिगत व्यवहार का विषय नहीं रहता, बल्कि यह समाज में मिल रही शिक्षा और संस्कारों पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माण केवल विद्यालयों में नहीं होता, बल्कि उसकी शुरुआत परिवार से होती है और माता-पिता की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होती है।
अपने विचार रखते हुए उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि आज का समय तकनीक और आधुनिक शिक्षा का युग है, लेकिन इसके साथ-साथ नैतिक मूल्यों का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को श्रेष्ठ विद्यालयों में पढ़ाने, आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने और उज्ज्वल भविष्य देने के लिए अथक प्रयास करते हैं, लेकिन कई बार व्यस्त जीवनशैली के कारण उनके साथ संवाद करने का समय नहीं निकाल पाते। यही दूरी धीरे-धीरे बच्चों के व्यवहार और सोच पर प्रभाव डालती है। उन्होंने कहा कि एक शिक्षित बेटी वही है जो अपने ज्ञान का उपयोग समाज के हित में करे, अपने परिवार का सम्मान बढ़ाए और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझे। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, संवेदनशील और संस्कारी नागरिक तैयार करना भी है। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा के साथ संस्कारों का समावेश नहीं होगा तो समाज में ज्ञान तो बढ़ेगा, लेकिन संवेदनशीलता और नैतिकता कमजोर पड़ सकती है। इसलिए माता-पिता को अपनी बेटियों के साथ समय बिताना चाहिए, उनके विचारों को समझना चाहिए और उन्हें जीवन के मूल्यों से परिचित कराना चाहिए।
उन्होंने देश की उन महान महिलाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की बेटियों के सामने प्रेरणा के असंख्य उदाहरण मौजूद हैं। खेल जगत में पी.टी. उषा, मैरी कॉम, पी.वी. सिंधु, साइना नेहवाल और मिताली राज ने अपने अद्भुत प्रदर्शन से पूरे विश्व में भारत का नाम गौरवान्वित किया। प्रशासनिक सेवा में किरण बेदी ने अपने साहस, ईमानदारी और अनुशासन की मिसाल कायम की। भारतीय वायुसेना में गुंजन सक्सेना ने अपने कर्तव्य और बहादुरी से यह साबित किया कि महिलाएं किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कल्पना चावला ने करोड़ों भारतीय बेटियों को बड़े सपने देखने का साहस दिया, जबकि रक्षा अनुसंधान में टेसी थॉमस ने अपनी प्रतिभा से देश का गौरव बढ़ाया। चिकित्सा के क्षेत्र में डॉ. इंदिरा हिंदुजा ने अपनी उपलब्धियों से भारतीय महिलाओं की क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटियों को इन महान महिलाओं के संघर्ष, अनुशासन और सफलता की कहानियां सुनाएं ताकि वे केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि चरित्र, मेहनत और जिम्मेदारी का महत्व भी समझ सकें।
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि आज समाज में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या हम अपने बच्चों को पर्याप्त समय दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई अभिभावक आर्थिक रूप से मजबूत भविष्य देने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन बच्चों के साथ बैठकर उनके विचार, मित्र मंडली, व्यवहार और मानसिक स्थिति को समझने का समय नहीं निकाल पाते। यही कारण है कि कई बार युवा पीढ़ी सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से ऐसे व्यवहार को सामान्य मानने लगती है जो भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के अनुरूप नहीं होता। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपनी बेटियों से नियमित संवाद करें, उन्हें आत्मविश्वासी बनाएं, लेकिन साथ ही यह भी सिखाएं कि सम्मान देना और सम्मान प्राप्त करना दोनों ही एक मजबूत व्यक्तित्व की पहचान हैं। उन्होंने कहा कि मजबूत महिला वह नहीं होती जो किसी का अपमान करके स्वयं को शक्तिशाली साबित करे, बल्कि वह होती है जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने शब्दों, व्यवहार और मर्यादा पर नियंत्रण बनाए रखे।
लोकतांत्रिक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जहां प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने और सरकार या किसी भी विचारधारा से असहमति जताने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। उन्होंने कहा कि असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन अभिव्यक्ति का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। यदि विचार व्यक्त करते समय भाषा की मर्यादा समाप्त हो जाए तो उसका नकारात्मक प्रभाव समाज और विशेष रूप से युवा पीढ़ी पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति सम्मान बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है, चाहे उसकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन संवाद की भाषा गरिमापूर्ण और जिम्मेदार होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज को ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें तर्क और विचारों से बहस हो, न कि अपमानजनक शब्दों से।
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि उन्हें गर्व है कि वे श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले भारत की महिला हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भारत वैश्विक स्तर पर अपनी नई पहचान स्थापित कर रहा है और देश की महिलाएं भी हर क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रही हैं। सेना, विज्ञान, खेल, चिकित्सा, पुलिस, अंतरिक्ष, शिक्षा और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में भारतीय बेटियां लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलते भारत की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इस प्रगति को स्थायी बनाए रखने के लिए शिक्षा के साथ संस्कारों का संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि बेटियों को आत्मविश्वास, अनुशासन, विनम्रता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ बचपन से ही सिखाया जाए तो वे न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे देश का गौरव बढ़ाएंगी।
अंत में उर्वशी दत्त बाली ने अभिभावकों से भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि बेटियों को केवल अच्छे विद्यालयों में भेज देना या उच्च शिक्षा दिला देना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें अपना समय, स्नेह, मार्गदर्शन और संस्कार भी देना उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि परिवार ही वह पहली पाठशाला है जहां से बच्चों का व्यक्तित्व आकार लेता है। यदि घर में सम्मान, अनुशासन, संवाद और नैतिक मूल्यों का वातावरण होगा तो वही संस्कार आगे चलकर समाज को मजबूत बनाएंगे। उन्होंने कहा कि भारत की बेटियां देश की सबसे बड़ी शक्ति हैं और उन्हें शिक्षा के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ जिम्मेदारी तथा आत्मविश्वास के साथ विनम्रता प्रदान करना प्रत्येक परिवार की जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि जब परिवार, समाज और शिक्षा मिलकर बेटियों के सर्वांगीण विकास की दिशा में कार्य करेंगे, तभी एक सशक्त, संस्कारी, संवेदनशील और विकसित भारत का सपना वास्तविक रूप से साकार हो सकेगा।





